नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की कानून व्यवस्था और जेल प्रशासन की कार्यशैली पर एक बार फिर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। मामला राजस्थान के अजमेर से जुड़ा है, जहां कानून की रखवाली करने वाली एक महिला जेल अधिकारी खुद कानून के शिकंजे में फंस गई है। अजमेर सेंट्रल जेल की प्रभारी रहीं महिला जेलर दिव्या चौधरी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग का यह मामला सामने आने के बाद प्रशासनिक गलियारों में सनसनी फैल गई है। जिस कुर्सी पर बैठकर वह कैदियों के मामलों की सुनवाई करती थीं और जेल की व्यवस्था संभालती थीं, आज हालात ऐसे बदल गए हैं कि वह खुद उसी जेल की चारदीवारी के भीतर एक कैदी के रूप में बंद हैं।
इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब जेल के भीतर और बाहर प्रशासनिक स्तर पर गंभीर अनियमितताओं की शिकायतें मिलने लगीं। शुरुआती जांच में यह बात सामने आई कि जेलर दिव्या चौधरी नियमों को ताक पर रखकर अपनी निजी जिंदगी और सुविधाओं के लिए कैदियों का इस्तेमाल कर रही थीं। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, महिला जेलर ने जेल के नियमों का खुला उल्लंघन करते हुए दो सजायाफ्ता या विचाराधीन कैदियों को अपने सरकारी आवास पर बुलवाया था। इन कैदियों से उनके घर पर घरेलू काम करवाए जाते थे और झाड़ू-पोछा जैसी सफाई का काम कराया जाता था। एक जिम्मेदार पद पर बैठे अधिकारी द्वारा इस तरह कैदियों का दुरुपयोग किया जाना सीधे तौर पर कानून और जेल मैन्युअल का गंभीर उल्लंघन है।
नियमों को ताक पर रखकर कैदियों से घर का काम करवाना
जेल प्रशासन के नियमों के मुताबिक, किसी भी कैदी को जेल परिसर से बाहर निजी आवास पर ले जाना या उससे घरेलू काम करवाना पूरी तरह से अवैध और अपराध की श्रेणी में आता है। लेकिन दिव्या चौधरी पर आरोप है कि उन्होंने अपनी ताकत और रुतबे का गलत इस्तेमाल करते हुए इन नियमों को पूरी तरह से नजरअंदाज किया। जब इस बात की भनक उच्चाधिकारियों को लगी, तो मामले की गोपनीय जांच बैठाई गई। जांच में जब यह आरोप सही पाए गए, तो विभाग ने तुरंत कड़ी कार्रवाई करने का फैसला किया। पुलिस और प्रशासनिक टीम ने पुख्ता सबूत जुटाने के बाद महिला जेलर के खिलाफ कानूनी शिकंजा कस दिया और उन्हें हिरासत में ले लिया। पूछताछ के बाद उन्हें औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया गया, जिसके बाद उन्हें अदालत में पेश किया गया।
अदालत के आदेश के बाद जब उन्हें जेल भेजने की बारी आई, तो उनके सामने सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि उन्हें उसी अजमेर सेंट्रल जेल में दाखिल करना पड़ा जिसकी वह कुछ समय पहले तक सर्वसर्वा थीं। कभी जिस जेल के मुख्य गेट से वह रौब के साथ अंदर दाखिल होती थीं और मातहत उन्हें सैल्यूट करते थे, आज उसी गेट से एक मु मुजरिम के रूप में उनका प्रवेश हुआ। जेल के कर्मचारियों और अन्य कैदियों के लिए भी यह दृश्य बेहद चौंकाने वाला था। जो अधिकारी कभी दूसरों को जेल के कायदे-कानून सिखाती थीं, आज वह खुद उन्हीं कैदियों के साथ जेल की बैरक में रात गुजारने को मजबूर हैं। यह घटना इस बात का जीता-जाता उदाहरण है कि कानून के हाथ कितने लंबे होते हैं और पद का घमंड किस तरह इंसान को मिट्टी में मिला सकता है.
भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग पर प्रशासन की कड़ी नजर
इस हाई-प्रोफाइल गिरफ्तारी के बाद अजमेर सेंट्रल जेल में सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्थाओं की नए सिरे से समीक्षा की जा रही है। राज्य सरकार और पुलिस मुख्यालय इस बात की भी जांच कर रहे हैं कि क्या इस खेल में जेल के कुछ अन्य कर्मचारी भी शामिल थे। क्या महिला जेलर अकेले ही इस तरह के नियमों की धज्जियां उड़ा रही थीं या फिर उन्हें ऊपर से भी किसी प्रकार का संरक्षण मिल रहा था? इन सभी सवालों के जवाब तलाशने के लिए भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो और स्थानीय पुलिस मिलकर काम कर रही है। जेल के अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों से भी पूछताछ की जा रही है ताकि इस बात का पता लगाया जा सके कि जेल के भीतर और क्या-क्या अवैध गतिविधियां चल रही थीं।
आम जनता और सामाजिक संगठनों ने इस कार्रवाई का स्वागत किया है लेकिन साथ ही यह भी सवाल उठाया है कि आखिर कैसे कोई अधिकारी इतने लंबे समय तक बिना किसी डर के इस तरह की मनमानी कर सकता था। लोगों का मानना है कि इस तरह के मामलों में केवल एक अधिकारी पर कार्रवाई काफी नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था में सुधार की जरूरत है ताकि भविष्य में कोई भी जेल अधिकारी अपनी ताकत का इस तरह दुरुपयोग करने की हिम्मत न जुटा सके। द फ्रीलान्स की टीम इस मामले पर लगातार नजर बनाए हुए है और जैसे-जैसे जांच के नए पहलू सामने आएंगे, हम अपने पाठकों तक सबसे पहले और सटीक जानकारी पहुंचाते रहेंगे।






