नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के अलग-अलग हिस्सों में इन दिनों खेती-किसानी से जुड़ी एक बड़ी बहस यूरिया खाद को लेकर छिड़ी हुई है। एक तरफ सरकार किसानों को राहत देने की बात कह रही है, तो दूसरी तरफ ग्रामीण इलाकों में खाद की कालाबाजारी और ठगी के मामले भी लगातार सामने आ रहे हैं। द फ्रीलान्स की टीम ने जब इस पूरे मामले की जमीनी पड़ताल की, तो कई चौंकाने वाले पहलू सामने आए। किसानों के लिए खाद की उपलब्धता और उसके सही दाम इस समय सबसे बड़ा मुद्दा बने हुए हैं, जिस पर प्रशासन की नजर भी पैनी हो गई है।
राजस्थान के झालावाड़ जिले से हाल ही में राहत भरी खबर आई है कि वहां पर्याप्त मात्रा में यूरिया और एसएसपी उपलब्ध है। प्रशासन ने खाद की कालाबाजारी रोकने के लिए डिजिटल निगरानी का सख्त तरीका अपनाया है। इसके तहत अब हर बोरी का हिसाब ऑनलाइन रखा जा रहा है ताकि कोई भी दुकानदार तय कीमत से ज्यादा दाम न वसूल सके। इसके बावजूद, उत्तर प्रदेश के बरेली जैसे इलाकों से ऐसी खबरें भी आई हैं जहां ठगों ने किसानों को आसानी से खाद दिलाने के नाम पर हजारों रुपये ठग लिए। इससे साफ होता है कि कागजी उपलब्धता और जमीनी हकीकत के बीच अभी भी कई तरह की अड़चनें बनी हुई हैं।
दीवाली से पहले दाम घटने की खबर का सच
त्योहारी सीजन यानी दीवाली से ठीक पहले बाजार में यह चर्चा जोरों पर रही कि यूरिया के दाम में 10 प्रतिशत तक की कमी आई है। इससे किसानों के चेहरे पर हल्की मुस्कान जरूर आई, क्योंकि खेती की लागत लगातार बढ़ती जा रही है। खाद सस्ती होने से छोटे और मझोले किसानों को बुवाई के इस सीजन में थोड़ी आर्थिक राहत मिलने की उम्मीद बंधी है। हालांकि, कई ग्रामीण इलाकों के किसानों का कहना है कि उन्हें अभी भी तय कीमतों पर खाद पाने के लिए लंबी कतारों में लगना पड़ता है। बाजार में दाम घटने के सरकारी दावों और स्थानीय दुकानों पर मिलने वाली हकीकत के बीच तालमेल बिठाना आम किसान के लिए अब भी एक चुनौती बना हुआ है।
दूसरी तरफ, कृषि विभाग के अधिकारियों ने किसानों को यूरिया और एसएसपी के सही इस्तेमाल की सलाह दी है। कई जगहों पर डीएपी की कमी के चलते अधिकारियों ने किसानों से कहा है कि वे घबराएं नहीं और उसकी जगह एसएसपी के साथ यूरिया का संतुलित इस्तेमाल करें। बाढ़ या जलभराव वाले क्षेत्रों में धान की फसल को बचाने के लिए कृषि विशेषज्ञों ने एक कट्ठा खेत में एक किलो यूरिया और दो सौ ग्राम जिंक मिलाने की खास सलाह दी है। जानकारों का मानना है कि सही मात्रा में खाद डालने से फसल को सड़ने से बचाया जा सकता है और पैदावार भी सुरक्षित रहती है।
ठगी और कालाबाजारी के खिलाफ प्रशासन की सख्ती
खाद की किल्लत का फायदा उठाकर ठग सक्रिय हो गए हैं, जिसका ताजा उदाहरण बरेली में देखने को मिला जहां यूरिया खाद की पर्ची कटाने के नाम पर एक किसान से ठगी कर ली गई। ऐसे मामलों को रोकने के लिए अब कृषि विभाग और स्थानीय पुलिस मिलकर काम कर रही है। डिजिटल पोर्टल के जरिए यह ट्रैक किया जा रहा है कि किस डीलर ने किस किसान को कितनी खाद बेची है। अधिकारियों का दावा है कि फर्जीवाड़े में लिप्त पाए जाने वाले दुकानदारों के लाइसेंस तुरंत रद्द किए जा रहे हैं। इसके बावजूद, किसानों को जागरूक रहने की जरूरत है ताकि वे किसी भी बिचौलिए के झांसे में न आएं।
ग्रामीण बाजारों में यूरिया की सुचारू सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकारों ने निगरानी समितियां भी बनाई हैं। किसानों को सलाह दी जा रही है कि वे हमेशा अधिकृत सहकारी समितियों या लाइसेंस प्राप्त दुकानों से ही खाद खरीदें। अगर कोई दुकानदार तय कीमत से ज्यादा पैसे मांगे या बिल न दे, तो उसकी शिकायत तुरंत कृषि विभाग के हेल्पलाइन नंबर पर दर्ज कराई जा सकती है। द फ्रीलान्स की पड़ताल यही कहती है कि जब तक डिजिटल निगरानी का यह सिस्टम पूरी ईमानदारी से जमीन पर लागू नहीं होगा, तब तक किसानों की यह परेशानी पूरी तरह खत्म नहीं हो सकती।
संतुलित खाद के इस्तेमाल से बचेगी फसल
मौसम के बदलते मिजाज और हालिया बारिश के कारण कई राज्यों में धान की फसलों को नुकसान पहुंचा है। ऐसे वक्त में किसानों के मन में असमंजस है कि वे खेतों में कौन सी खाद डालें ताकि फसल बर्बाद न हो। कृषि वैज्ञानिकों और मैदानी अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि यूरिया का अंधाधुंध इस्तेमाल करने से जमीन की उपजाऊ शक्ति कम होती है। इसलिए किसानों को तय मात्रा में ही यूरिया और अन्य पोषक तत्वों का छिड़काव करना चाहिए। सही जानकारी और समय पर सही खाद मिलने से ही किसानों की मेहनत रंग ला पाएगी और अन्नदाता को इस संकट से राहत मिलेगी।




