नई दिल्ली और रायपुर से हमारी ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, देश के आंतरिक सुरक्षा मामलों को लेकर केंद्र सरकार ने अपना रुख और ज्यादा सख्त कर लिया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक बड़ा बयान देते हुए कहा है कि माओवाद से जुड़ी हर निशानी को जमीन से मिटाना होगा। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि देश से नक्सलवाद का खात्मा तो हो रहा है, लेकिन अब उसके बचे हुए निशानों को भी पूरी तरह खत्म करना जरूरी है।
गृह मंत्री के इस बयान के बाद सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन ने अपनी रणनीति तेज कर दी है। पिछले पांच दशकों से देश के कई हिस्से नक्सल हिंसा की आग में झुलस रहे थे। आम लोगों और सुरक्षा बलों ने जो भयानक दर्द झेला है, उसे कभी भूला नहीं जा सकता। सरकार का मानना है कि केवल हथियारबंद संघर्ष खत्म होने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उस विचारधारा और उसके निशानों को भी हमेशा के लिए इतिहास बना देना होगा।
बस्तर में बदल रही है तस्वीर, विकास और पुनर्वास पर जोर
एक समय जो इलाके नक्सलियों का गढ़ माने जाते थे, वहां अब बदलाव की बयार बह रही है। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में सुरक्षा बलों के शिविर खुलने के बाद विकास योजनाओं ने रफ्तार पकड़ ली है। प्रशासन लगातार गांवों तक सड़क, बिजली, पानी, स्कूल और अस्पताल पहुंचाने का काम कर रहा है। हाल ही में बस्तर में विशेष शिविरों के जरिए दिव्यांगजनों को सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाया गया है।
स्थानीय प्रशासन के आंकड़ों के मुताबिक, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले सैकड़ों दिव्यांगजनों को उपकरण और पेंशन का लाभ मिला है। यह इस बात का सबूत है कि अब शासन और प्रशासन की पहुंच उन दूरदराज के इलाकों तक हो गई है जहां पहले सरकारी अमला जाने से भी डरता था। पुनर्वास नीतियों के तहत आत्मसमर्पण करने वाले युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने का काम भी तेजी से चल रहा है।
पांच दशक की पीड़ा और जख्मों को भरना बड़ी चुनौती
नक्सलवाद के खांत्मे की बात जितनी आसान लगती है, उसके जख्म उतने ही गहरे हैं। पिछले पचास सालों में हजारों सुरक्षाकर्मी, निर्दोष नागरिक और आदिवासी इस खूनी संघर्ष की भेंट चढ़ चुके हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस दर्द को देश के सामने रखा है। उनका कहना है कि भले ही आज हम जीत के करीब हैं, लेकिन उन पांच दशकों की पीड़ा को कभी मिटाया नहीं जा सकता जो देश ने झेली है।
जमीनी स्तर पर काम कर रहे अधिकारियों का मानना है कि लोगों के दिलों से डर निकालने में अभी थोड़ा वक्त और लगेगा। आदिवासियों के बीच विकास का भरोसा पैदा करना सबसे बड़ी प्राथमिकता है। सरकार की कोशिश है कि बस्तर और झारखंड जैसे इलाकों में युवाओं को रोजगार के नए मौके दिए जाएं ताकि वे भटकाव के रास्ते पर दोबारा न जाएं।
सुरक्षा बलों का कड़ा पहरा और भविष्य की रणनीति
सुरक्षा एजेंसियों ने आने वाले महीनों के लिए अपनी रणनीति पूरी तरह तैयार कर ली है। खुफिया तंत्र को और मजबूत किया गया है ताकि किसी भी बचे-खुचे ठिकाने को पनपने का मौका न मिले। केंद्रीय बलों और राज्य पुलिस के बीच तालमेल पहले से कहीं ज्यादा बेहतर हुआ है।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि आम जनता अब शांति चाहती है। लोग चाहते हैं कि विकास की रफ्तार ऐसी ही बनी रहे ताकि उनके बच्चे बेहतर भविष्य देख सकें। सरकार का यह संकल्प कि माओवाद का नामोनिशान नहीं बचेगा, अब मैदानी स्तर पर सच साबित होता दिख रहा है।












