छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का खात्मा: एक लंबे संघर्ष का ऐतिहासिक और निर्णायक अध्याय
दशकों तक छत्तीसगढ़ के जंगलों और ग्रामीण इलाकों में खौफ का पर्याय बने नक्सलवाद का अध्याय अब आधिकारिक तौर पर बंद हो चुका है। सरकार और सुरक्षा बलों द्वारा चलाई गई बेहद सख्त और समन्वित रणनीतिक कार्रवाइयों के परिणामस्वरूप 31 मार्च 2026 को छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद के पूर्ण अंत की घोषणा कर दी गई। यह उपलब्धि केवल सुरक्षा बलों की सफलता नहीं है, बल्कि उन तमाम ग्रामीण अंचलों के लिए राहत की सांस है जो बरसों से बम-बंदूकों की आवाज और बारूदी सुरंगों के साये में जीने को मजबूर थे।
नक्सली हिंसा का दायरा सिर्फ पुलिस और सुरक्षा बलों के साथ होने वाली मुठभेड़ों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इसने बस्तर के सामाजिक ताने-बाने, शिक्षा प्रणाली और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बुरी तरह तहस-नहस कर रखा था। चरमपंथियों की दहशत के कारण प्रभावित क्षेत्रों में सड़क निर्माण, स्कूल, अस्पताल और तमाम बुनियादी सरकारी सुविधाएं पहुंच नहीं पा रही थीं। आम नागरिकों के सामने विकास कार्यों में मदद करने पर नक्सलियों की क्रूर सजा और सुरक्षा बलों के दबाव के बीच पिसने की बड़ी विवशता थी। ऐसे में इस खूनी खेल पर लगाम कसना बेहद जरूरी हो गया था।
केंद्र सरकार और राज्य प्रशासन ने इस चुनौती से पार पाने के लिए त्रि-आयामी रणनीति अपनाई। इसमें एक तरफ जहां आक्रामक और खुफिया आधारित सैन्य अभियान चलाकर नक्सलियों की कमर तोड़ी गई, वहीं दूसरी तरफ मुख्यधारा में लौटने के इच्छुक भटके हुए लोगों के लिए आकर्षक पुनर्वास नीतियां लाई गईं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की सीधी देखरेख में चलाए गए इन अभियानों ने ज़मीन पर सकारात्मक परिणाम दिखाने शुरू कर दिए, जिसका नतीजा आज सबके सामने है।
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आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति: जब मुख्यधारा में लौटे हजारों हथियारबंद बागी
सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव और शासन द्वारा पेश की गई आकर्षक आत्मसमर्पण नीतियों का असर साफ तौर पर आंकड़ों में दिखाई देता है। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, 1 जनवरी 2024 से लेकर 28 फरवरी 2026 के बीच कुल 2,697 नक्सलियों ने हिंसा का रास्ता हमेशा के लिए त्याग दिया और पुलिस के सामने हथियार डाल दिए। इन आत्मसमर्पित सदस्यों ने लोकतंत्र और संविधान के दायरे में रहकर जीवन जीने का संकल्प लिया, जिसे सरकार ने हाथों-हाथ लिया।
राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व वाली सरकार और उपमुख्यमंत्री तथा गृहमंत्री विजय शर्मा द्वारा उठाए गए कदमों ने इस प्रक्रिया को और गति दी। मार्च 2025 में लागू की गई उन्नत पुनर्वास नीति के तहत आत्मसमर्पण करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को रोजगार के अवसर, कौशल प्रशिक्षण, आवास निर्माण के लिए सहायता, खाद्यान्न और बच्चों की शिक्षा के लिए विशेष प्रावधान दिए गए। इसका मूल उद्देश्य केवल बंदूकें छीनना नहीं था, बल्कि उन्हें समाज की मुख्यधारा में सम्मानजनक और स्थायी आजीविका दिलाना था ताकि वे कभी दोबारा अपराध की दुनिया का रुख न करें।
"नक्सलवाद के खात्मे का मतलब सिर्फ सुरक्षा बलों की जीत नहीं है, बल्कि यह उन इलाकों के हर नागरिक के जीवन में स्थायी शांति और विकास के नए सूरज के उगने जैसा है। अब हमारी प्राथमिकता इन क्षेत्रों के पुनर्निर्माण और प्रभावित परिवारों का जीवन संवारने की है।" — प्रशासनिक अधिकारी, छत्तीसगढ़ शासन
दक्षिण बस्तर के वो इलाके जो कभी खौफ के गढ़ थे, वहां अब बदलाव की बयार
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खात्मे की इस पूरी मुहिम का केंद्र बिंदु मुख्य रूप से दक्षिण बस्तर के वे इलाके रहे, जो दशकों तक लाल आतंक के सबसे सुरक्षित ठिकाने माने जाते थे। आंकड़ों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि आत्मसमर्पण करने वाले कुल नक्सलियों में सबसे बड़ी संख्या इन्हीं जिलों से आई है। अकेले बीजापुर जिले में 918 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जबकि सुकमा में 701 और दंतेवाड़ा जिले में 569 लोगों ने हिंसा को अलविदा कहा।
इसके अलावा नारायणपुर में 314, कांकेर में 61, बस्तर में 36 और गरियाबंद में 29 नक्सलियों ने पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया। कोंडागांव, खैरागढ़-छुईखदान-गंडई, धमतरी, मानपुर-मोहला-अंबागढ़ चौकी और कबीरधाम जैसे अन्य जिलों से भी बड़ी संख्या में उग्रवादियों ने मुख्यधारा का दामन थामा। इन आंकड़ों से यह साबित होता है कि स्थानीय स्तर पर लोगों का नक्सलियों की खोखली विचारधारा से मोहभंग हो चुका था और वे शांतिपूर्ण तथा खुशहाल जीवन की तलाश में थे।
हिंसा की आग में बेसहारा हुए अनाथ बच्चों के पुनर्वास की नई और कठिन चुनौती
हालांकि 31 मार्च 2026 को नक्सलवाद के खात्मे की घोषणा के साथ सुरक्षा और सैन्य मोर्चे की बड़ी लड़ाई जीत ली गई है, लेकिन इसके बाद प्रशासन के सामने एक और बेहद संवेदनशील चुनौती खड़ी हो गई है। यह चुनौती उस मानवीय पहलू से जुड़ी है, जिसके केंद्र में वे मासूम बच्चे हैं जिन्होंने नक्सली संगठनों और हिंसा के माहौल के बीच अपना पूरा बचपन बिताया है। कई बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने मुठभेड़ों या आपसी संघर्ष में अपने माता-पिता को खो दिया और वे पूरी तरह अनाथ हो चुके हैं।
इन बच्चों की परवरिश, उनकी मानसिक स्थिति में सुधार, उनकी शिक्षा और भविष्य के अधिकारों को सुरक्षित करने की जिम्मेदारी अब मानवाधिकार आयोग और समाज कल्याण विभागों के कंधों पर आ गई है। वर्षों तक बंदूकों के साए में जीने वाले इन बच्चों को मनोवैज्ञानिक परामर्श देकर सामान्य समाज में ढालना और उनके लिए बेहतर शैक्षणिक संस्थान उपलब्ध कराना एक जटिल कार्य है। मानवाधिकार आयोग ने इस दिशा में गंभीर कदम उठाने शुरू कर दिए हैं ताकि इन अनाथ बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो सके।
स्थायी शांति और सामाजिक समरसता की ओर बढ़ता छत्तीसगढ़ का भविष्य
नक्सलवाद के खात्मे के बाद छत्तीसगढ़ के सामने अब असली परीक्षा सामाजिक और आर्थिक मोर्चे पर स्थायी शांति स्थापित करने की है। जिन क्षेत्रों में कभी गोलियों की गूंज सुनाई देती थी, वहां अब पक्की सड़कें, बिजली, स्कूल और अस्पताल बनाए जा रहे हैं। सरकार की विभिन्न लोक कल्याणकारी योजनाएं अब अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक आसानी से पहुंच रही हैं, जिससे आदिवासियों और स्थानीय निवासियों का व्यवस्था के प्रति विश्वास मजबूत हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस जीत को चिरस्थायी बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि आत्मसमर्पण करने वाले युवाओं और हिंसा से प्रभावित बच्चों की लगातार मॉनिटरिंग की जाए। उन्हें बेहतर शिक्षा और रोजगार के साधन मुहैया कराकर समाज का उपयोगी अंग बनाया जाना चाहिए। यदि सरकार और मानवाधिकार एजेंसियां इन बच्चों और परिवारों के पुनर्वास के कार्य को उतनी ही मुस्तैदी से पूरा करती हैं जितनी मुस्तैदी से सैन्य अभियान चलाए गए, तो छत्तीसगढ़ का यह नया अध्याय देश के अन्य प्रभावित राज्यों के लिए एक मिसाल बन जाएगा।








