नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की चुनाव व्यवस्था और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार इन दिनों दो अलग-अलग वजहों से लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं। एक तरफ जहां उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है, वहीं दूसरी तरफ देश के भीतर राजनीतिक दलों का विरोध भी तेज होता जा रहा है। भारतीय चुनाव आयोग के प्रमुख ज्ञानेश कुमार के साथ अन्य दो आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के फैसलों पर भी राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं गर्म हैं। द फ्रीलान्स की टीम ने इस पूरे मामले की जमीनी पड़ताल की है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि वैश्विक मंच और घरेलू राजनीति के इस दौर में असल जमीनी हकीकत क्या है।
ताजा अंतरराष्ट्रीय अपडेट के अनुसार, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को वर्ष 2026 के लिए 'अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र और निर्वाचन सहायता संस्थान' यानी इंटरनेशनल आईडीईए के अध्यक्ष पद का कार्यभार सौंपा जाएगा। आकाशवाणी और डीडी न्यूज की रिपोर्टों के मुताबिक यह भारत के चुनाव प्रबंधन और लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए एक बड़ा वैश्विक सम्मान माना जा रहा है। इस संस्था में दुनिया भर के लोकतांत्रिक देश शामिल हैं जो चुनाव प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने पर काम करते हैं। ज्ञानेश कुमार के इस मनोनयन से वैश्विक स्तर पर भारतीय चुनाव प्रणाली की भूमिका और मजबूत होने की बात कही जा रही है, जिस पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पुराने बयानों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की भी नजर रही है।
पुणे में कांग्रेस का हल्लाबोल और इस्तीफे की मांग
एक तरफ जहां वैश्विक मंच पर भारत की साख बढ़ाने वाले कदम उठाए जा रहे हैं, वहीं घरेलू मोर्चे पर राजनीतिक तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में महाराष्ट्र के पुणे शहर में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस पार्टी ने जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने आयोग की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए उनके इस्तीफे की मांग तक कर डाली। स्थानीय पुलिस और प्रशासन ने इस विरोध प्रदर्शन को देखते हुए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे। कांग्रेस कार्यकर्ताओं का आरोप है कि चुनाव आयोग के कुछ फैसले निष्पक्ष नहीं रहे हैं, जिसके चलते देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर असर पड़ रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भारत जैसे विशाल देश में चुनाव आयोग की भूमिका हमेशा से संवेदनशील और दबाव भरी रही है। जब भी चुनाव नजदीक आते हैं या राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक टकराव बढ़ता है, तब आयोग के फैसलों को लेकर बहस तेज हो जाती है। पुणे में हुआ यह विरोध प्रदर्शन इसी कड़ी का एक हिस्सा है जहां विपक्षी दलों ने खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की है। हालांकि, चुनाव आयोग की तरफ से अभी तक इन स्थानीय विरोध प्रदर्शनों पर कोई आधिकारिक या तीखी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, और आयोग अपने नियमित प्रशासनिक कार्यों में व्यस्त है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की बढ़ती साख और जिम्मेदारियां
इंटरनेशनल आईडीईए के अध्यक्ष के रूप में ज्ञानेश कुमार का चुना जाना यह दिखाता है कि दुनिया भर के देश भारत के चुनाव अनुभव से सीखना चाहते हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है जो हर पांच साल में सफलतापूर्वक इतने बड़े पैमाने पर चुनाव कराता है। चुनाव आयोग की तकनीकी क्षमता, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल और दूर-दराज के इलाकों तक मतदान सामग्री पहुंचाने का तरीका पूरी दुनिया के लिए अध्ययन का विषय रहता है। वर्ष 2026 के लिए यह कमान मिलना भारत के प्रशासनिक और लोकतांत्रिक ढांचे की मजबूती की मुहर माना जा रहा है।
दूसरी ओर, जमीन पर काम करने वाले रिपोर्टरों का यह भी कहना है कि घरेलू राजनीति में हर फैसले पर सवाल उठाना भारतीय लोकतंत्र का एक सहज हिस्सा बन चुका है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखे तेवर चुनाव आयोग के काम करने के तरीकों को और अधिक पारदर्शी बनाने की मांग करते हैं। आने वाले दिनों में देखना यह होगा कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर मिलने वाली इस नई जिम्मेदारी और देश के भीतर चल रहे राजनीतिक विरोध के बीच चुनाव आयोग किस तरह संतुलन बिठाता है। द फ्रीलान्स इस मामले से जुड़े हर नए अपडेट पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा।
पारदर्शिता और निष्पक्षता पर जनता की नजर
आम जनता और जागरूक मतदाताओं का मानना है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर किसी भी तरह का दाग नहीं लगना चाहिए। चाहे वह ईवीएम की सुरक्षा हो या फिर चुनाव की तारीखों का ऐलान, हर कदम पर पारदर्शिता बेहद जरूरी है। पुणे में हुए प्रदर्शनों के बाद आम लोगों के बीच भी इस बात की चर्चा है कि संस्थाओं और राजनीतिक दलों के बीच संवादहीनता खत्म होनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और घरेलू आलोचना के इस दौर में मुख्य चुनाव आयुक्त के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं जिनका सामना उन्हें आने वाले समय में करना होगा।




