नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी में इन दिनों राजनीतिक सरगर्मी काफी तेज चल रही है। कई मुद्दों को लेकर अलग-अलग संगठन और राजनीतिक दल सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इसी माहौल के बीच देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट से एक बहुत बड़ा बयान सामने आया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने साफ शब्दों में कहा है कि देश के नागरिकों को लोकतांत्रिक तरीके से प्रदर्शन करने का पूरा हक है। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी चेतावनी दी है कि किसी भी राजनीतिक मकसद के लिए सुप्रीम कोर्ट के नाम का इस्तेमाल न किया जाए। कोर्ट को सियासत के अखाड़े में खींचने से बचना चाहिए क्योंकि इससे न्याय व्यवस्था पर असर पड़ता है।
यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देश की कई जगहों पर मुख्य चुनाव आयुक्त यानी सीईसी और अन्य संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ विरोध मार्च निकाले जा रहे हैं। कुछ मामलों में वकीलों और अदालत के कर्मचारियों को भी आने-जाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इस स्थिति का संज्ञान लेते हुए मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान सख्त रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विरोध जताना सबका अधिकार है, लेकिन यह विरोध ऐसा नहीं होना जिससे आम जनता या न्यायपालिका के काम में कोई रुकावट पैदा हो। कोर्ट रूम के भीतर सुरक्षा और शांति बनाए रखना प्रशासन की पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए।
संवैधानिक संस्थाओं को राजनीति से रखें दूर
कानूनी जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट जैसे बड़े संस्थानों को किसी भी विवाद से दूर रखना बेहद जरूरी है। जब राजनीतिक दल अपनी रोटियां सेकने के लिए अदालत के फैसलों या पीठों का इस्तेमाल करने लगते हैं, तो न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठने का खतरा बन जाता है। मुख्य न्यायाधीश का यह बयान इस बात की याद दिलाता है कि अदालत का काम सिर्फ कानून के हिसाब से न्याय देना है, न कि राजनीतिक बहसों का हिस्सा बनना। देश के हर नागरिक और राजनीतिक दल को इस लक्ष्मण रेखा का सम्मान करना चाहिए ताकि लोकतंत्र की मर्यादा बनी रहे।
दूसरी तरफ, फॉर्म-6 और अन्य चुनावी दस्तावेजों को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में अपनी स्थिति स्पष्ट की है। अदालत ने साफ किया है कि कुछ खास दस्तावेज उनके सामने सीधे सुनवाई के लिए नहीं आए हैं और न ही उन पर कोई आधिकारिक मुहर लगाई गई है। अदालतों के नाम पर फैलाई जा रही अफवाहों पर लगाम लगाने के लिए यह सफाई बहुत जरूरी थी। आए दिन सोशल मीडिया पर अदालती फैसलों को लेकर जो भ्रामक दावे किए जाते हैं, वे न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख से साफ हो गया है कि अदालत अपनी गरिमा से समझौता नहीं करेगी।
वकीलों और आम जनता की आवाजाही पर विशेष निर्देश
प्रदर्शनों के दौरान होने वाली ट्रैफिक जाम और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने कड़े निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने पुलिस और स्थानीय प्रशासन को आदेश दिया है कि विरोध प्रदर्शनों के नाम पर अदालती परिसरों के आसपास रास्ते बंद नहीं किए जाएं। वकीलों, मुवक्किलों और अदालत के स्टाफ को अपने काम के लिए आने-जाने में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए। न्याय तक सबकी पहुंच सुनिश्चित करना अदालत का मौलिक कर्तव्य है, और इसमें किसी भी तरह की रुकावट को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
द फ्रीलान्स की जमीनी पड़ताल बताती है कि अदालती परिसरों के बाहर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं ताकि किसी भी अप्रिय घटना को रोका जा सके। पुलिस बल को यह निर्देश दिए गए हैं कि वे शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को होने दें, लेकिन अगर कोई व्यवस्था बिगाड़ने की कोशिश करे तो तुरंत सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए। मुख्य न्यायाधीश की इस चेतावनी के बाद अब सभी राजनीतिक दलों और संगठनों को अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना होगा। अदालत के इस स्पष्ट संदेश ने यह साबित कर दिया है कि देश का संविधान और उसकी संस्थाएं किसी के दबाव में काम नहीं करेंगी।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जनता का भरोसा
किसी भी मजबूत लोकतंत्र के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका का होना सबसे अहम शर्त होती है। जब अदालतें निष्पक्ष होकर फैसले लेती हैं, तभी आम जनता का संविधान पर भरोसा कायम रहता है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की यह टिप्पणी देश की जनता को यह भरोसा दिलाती है कि अदालतें किसी भी राजनीतिक दबाव के आगे झुकने वाली नहीं हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि राजनीतिक दल इस नसीहत को कितना मानते हैं और अदालतों के कामकाज में कितनी मर्यादा बनाए रखते हैं।






