नई दिल्ली/चेन्नई — तमिलनाडु की राजनीति में इन दिनों बयानों के तीर खूब चल रहे हैं। ताजा मामला डीएमके सांसद दयानिधि मारन और कांग्रेस के बीच का है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के परिसीमन संबंधी एक बयान के बाद राजनीतिक पारा चढ़ गया है। दयानिधि मारन ने इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने इसके विरोध में बेहद तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया है। इस पूरे घटनाक्रम ने दोनों सहयोगी दलों के बीच चल रही अंदरूनी खींचतान को खुलकर सामने ला दिया है।
घटना की शुरुआत तब हुई जब राहुल गांधी ने दक्षिण राज्यों के लोकसभा सीटों के परिसीमन को लेकर एक तीखी टिप्पणी की। इसके जवाब में डीएमके नेता दयानिधि मारन ने कांग्रेस पार्टी पर सीधा हमला बोल दिया। मारन ने खुलेआम कांग्रेस को जहरीला सांप करार दिया। उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग तमिलनाडु के अधिकारों पर चुप रहते हैं वे गद्दार हैं। इस बयान के बाद से दक्षिण भारत के राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई है। कांग्रेस के स्थानीय नेता भी अब इस पर अपनी प्रतिक्रिया देने लगे हैं।
एयरपोर्ट पर फंसे और रसोई वाले बयान से गरमाई सियासत
राजनीतिक बयानों के बीच दयानिधि मारन पहले से ही कई वजहों से चर्चा में बने हुए हैं। हाल ही में वे दिल्ली एयरपोर्ट पर करीब तीन घंटे तक फंसे रहे थे। इस दौरान उन्होंने निजीकरण के बाद एयर इंडिया की व्यवस्था पर सवाल उठाए थे। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी भी जाहिर की थी। इसके अलावा उनका 'रसोई में रहो' वाला बयान भी काफी विवादों में रहा। इस बयान में उन्होंने तमिलनाडु और उत्तर भारत की संस्कृति और रहन-सहन के बीच कड़ा फर्क बताया था। इन तमाम बयानों ने मिलकर राष्ट्रीय स्तर पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये बयानबाजी आने वाले चुनावों से पहले बहुत महत्वपूर्ण है। विपक्षी दलों का INDIA गठबंधन इस समय कई राज्यों में सीटों के तालमेल को लेकर उलझन में है। तमिलनाडु में डीएमके और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ती रही हैं। ऐसे में दोनों दलों के नेताओं के बीच इस तरह की बयानबाजी गठबंधन की सेहत के लिए ठीक नहीं मानी जा रही है। विपक्षी खेमे के भीतर चल रही यह कलह सत्तारूढ़ दल के लिए एक बड़ा मुद्दा बन गई है। जनता के बीच भी इन बयानों को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं।
उत्तर और दक्षिण के बीच बढ़ती वैचारिक दूरियां
यह पूरा विवाद सिर्फ दो पार्टियों का नहीं बल्कि उत्तर और दक्षिण भारत की संस्कृति का भी बन गया है। मारन के बयानों में लगातार यह बात सामने आती है कि दक्षिण राज्यों के साथ भेदभाव हो रहा है। वे लगातार यह आरोप लगाते हैं कि केंद्र सरकार और राष्ट्रीय दल दक्षिण की आवाज दबाना चाहते हैं। दूसरी ओर, आलोचकों का कहना है कि इस तरह के बयान देश की एकता को कमजोर करते हैं। भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता के नाम पर हो रही यह राजनीति अब अपने चरम पर पहुंचती दिख रही है।
आम जनता के बीच भी इन नेताओं के बयानों को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कुछ लोगों का मानना है कि नेताओं को ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर सोच-समझकर बोलना चाहिए। वहीं कुछ युवा इसे अपने राज्य के हकों की सही लड़ाई मान रहे हैं। आने वाले दिनों में देखना होगा कि डीएमके और कांग्रेस का यह आपसी विवाद किस दिशा में जाता है। क्या दोनों दल इस मतभेद को सुलझा पाएंगे या दरार और गहरी होगी, इस पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।
गठबंधन की भविष्य की राह और चुनावी समीकरण
देश में आगामी राजनीतिक बदलावों के लिहाज से तमिलनाडु का यह घटनाक्रम बेहद खास है। राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों को एकजुट करने के प्रयासों को ऐसे बयानों से झटका लग सकता है। कांग्रेस आलाकमान इस मामले में अभी काफी संभलकर चल रहा है। पार्टी नहीं चाहती कि दक्षिण के सबसे मजबूत राज्य में उसका डीएमके के साथ नाता टूटे। लेकिन स्थानीय स्तर के नेताओं के तीखे तेवर रिश्तों को लगातार तनावपूर्ण बना रहे हैं।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि कागजों पर भले ही गठबंधन बरकरार रहे, लेकिन जमीन पर भरोसा कम हो रहा है। कार्यकर्ता असमंजस में हैं कि वे स्थानीय नेता की सुनें या राष्ट्रीय गठबंधन के नियमों का पालन करें। जैसे-जैसे चुनावी तारीखें नजदीक आएंगी, यह दबाव और ज्यादा बढ़ता जाएगा। फिलहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या दोनों दल बैठकर इन दूरियों को मिटा पाते हैं या सियासत का यह नया दौर कोई बड़ा भूचाल लाता है।






