वाशिंगटन/नई दिल्ली — अमेरिकी राजनीति के गलियारों में इस समय भूचाल आया हुआ है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीतियों और आक्रामक बयानों पर अब सवाल उठने लगे हैं। दुनिया भर के मीडिया स्रोतों से मिल रही जानकारी के मुताबिक, एक खास मुस्लिम देश को घेरने की उनकी रणनीति उल्टी पड़ गई है। इस पूरी कूटनीतिक और आर्थिक खींचतान में अमेरिका को लगभग 31943 करोड़ रुपये का बड़ा चूना लगा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि ट्रंप के विरोधी अब उनकी इस नीति को अमेरिका की बड़ी नाकामी बता रहे हैं।
इस पूरे मामले की जड़ें मध्य पूर्व की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में जुड़ी हैं। अमेरिका ने उस देश पर कड़े प्रतिबंध लगाने और उसका असर कम करने के लिए कई बड़े कदम उठाए थे। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही निकली। उस देश ने बाहरी दबाव के आगे झुकने से साफ इनकार कर दिया। इसके उलट, इस पूरे संघर्ष के दौरान अमेरिकी खजाने और व्यापारिक हितों को भारी चोट पहुंची। वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार, इस टकराव का कुल आर्थिक नुकसान 31943 करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण और नौसेना की गतिविधियां
इस संकट के बीच अमेरिकी नौसेना की हरकतों ने तनाव को और बढ़ा दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे संवेदनशील इलाके पर अमेरिकी नियंत्रण के दावों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में खलबली मचा दी है। तेल की सप्लाई और समुद्री रास्तों पर कब्जे की इस जंग ने कच्चे तेल की कीमतों को प्रभावित किया है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी यानी आईईए ने साफ कर दिया है कि जरूरत पड़ने पर बाजार में और अधिक तेल जारी किया जाएगा ताकि कीमतों को नियंत्रित रखा जा सके। इसके बावजूद, अमेरिकी सैन्य अभियानों पर होने वाले खर्च ने देश की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया है।
दूसरी ओर, अमेरिका की घरेलू राजनीति में भी इसका असर साफ दिखाई दे रहा है। ट्रंप के विरोधी खेमे के नेता इस बात का प्रचार कर रहे हैं कि बिना सोचे-समझे उठाए गए कदमों से देश की साख गिरी है। नोबेल शांति पुरस्कार से जुड़ी चर्चाओं के बीच ट्रंप की नीतियों की आलोचना तेज हो गई है। लोग पूछ रहे हैं कि जिस देश को कमजोर करने की कोशिश की जा रही थी, उससे मुकाबला करने में अमेरिका ने अपना ही इतना पैसा क्यों पानी की तरह बहा दिया?
वैश्विक बाजार और तेल संकट पर कड़ा असर
मध्य पूर्व के इस तनाव का असर केवल कूटनीति तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर आम आदमी की जेब और वैश्विक बाजार पर पड़ रहा है। तेल आपूर्ति बाधित होने के डर से दुनिया भर के शेयर बाजारों में सुस्ती देखी गई। हालांकि ऊर्जा एजेंसियों ने आश्वासन दिया है कि वैकल्पिक इंतजाम किए जा रहे हैं, फिर भी अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। इस बीच, सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों से जुड़ी मानवीय खबरें भी सुर्खियों में हैं, जो वहां के कड़े कानूनों और प्रवासी कामगारों की मुश्किलों को उजागर करती हैं।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि किसी भी देश को आर्थिक या सैन्य बल पर झुकाने की कोशिशें अक्सर महंगी साबित होती हैं। डोनाल्ड ट्रंप के मामले में भी यही देखने को मिला है। अपने ही देश में राजनीतिक लाभ पाने के लिए शुरू की गई इस मुहिम ने अंततः अमेरिका के लिए ही मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में अमेरिकी प्रशासन इस आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए क्या नई रणनीति अपनाता है।
डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों पर उठते कड़े सवाल
विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की यह रणनीति पूरी तरह विफल रही है। किसी देश विशेष को निशाना बनाने की जिद में अमेरिका को भारी आर्थिक और कूटनीतिक नुकसान उठाना पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी अमेरिका की किरकिरी हुई है। जनता अब सवाल पूछ रही है कि इस नुकसान की भरपाई कौन करेगा। आने वाले दिनों में यह मुद्दा अमेरिकी राजनीति में एक बड़ा हथियार बनने वाला है, जिससे ट्रंप की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।





