नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और अन्य दो निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी इस समय राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में हैं। चुनाव आयोग के कामकाज और फैसलों को लेकर पिछले कुछ समय से राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर गर्म चल रहा है। एक तरफ जहां प्रशासनिक स्तर पर आयोग की भूमिका को वैश्विक पहचान मिल रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों की ओर से तीखे तेवर भी देखने को मिल रहे हैं। द फ्रीलान्स की टीम ने इस पूरे मामले की जमीनी हकीकत और विभिन्न बयानों की पड़ताल की है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भी भारत की चुनाव व्यवस्था और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार का जिक्र किए जाने के बाद से यह मामला और अधिक चर्चा में आ गया है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय चुनावी प्रणाली की कार्यशैली हमेशा से एक बड़ा विषय रही है। अमेरिका जैसे बड़े देश के नेता द्वारा भारतीय चुनाव तंत्र का जिक्र किया जाना यह बताता है कि दुनिया भर में भारत के चुनावों का दायरा कितना बड़ा है। भारत का चुनाव आयोग दुनिया का सबसे बड़ा स्वतंत्र चुनावी प्रबंधन निकाय माना जाता है, जिसके फैसले हर बार पूरी दुनिया का ध्यान खींचते हैं।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का बढ़ता कद
एक तरफ देश के भीतर राजनीतिक विरोध के सुर उठ रहे हैं, तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त को बड़ी जिम्मेदारी मिली है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार वर्ष 2026 के लिए 'अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र और निर्वाचन सहायता संस्थान' यानी इंटरनेशनल आइडिया के अध्यक्ष पद का कार्यभार संभालेंगे। यह संस्थान दुनिया भर में लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने का काम करता है। इस प्रतिष्ठित पद पर भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त का चुना जाना देश के लोकतांत्रिक ढांचे और चुनाव आयोग की साख के लिए एक बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है।
यह अंतरराष्ट्रीय नियुक्ति ऐसे समय में आई है जब आयोग के कामकाज को लेकर देश के भीतर कई तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं। सरकारी और स्वायत्त संस्थाओं के कामकाज के तरीकों पर अक्सर राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक मतभेद देखने को मिलते हैं। इंटरनेशनल आइडिया जैसे वैश्विक मंच की अध्यक्षता मिलने से भारत को दुनियाभर के देशों के साथ अपने चुनावी अनुभव साझा करने का बड़ा मौका मिलेगा। जानकारों का मानना है कि इससे वैश्विक स्तर पर भारत की साख मजबूत होगी और दुनिया को यह समझने में मदद मिलेगी कि इतने विशाल देश में चुनाव कैसे कराए जाते हैं।
देश के भीतर राजनीतिक दलों का कड़ा विरोध
वैश्विक मंच पर मिल रही इन सफलताओं के उलट, देश के अंदरूनी हिस्सों में राजनीतिक दलों का गुस्सा भी फूट रहा है। हाल ही में महाराष्ट्र के पुणे शहर में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस पार्टी ने जोरदार प्रदर्शन किया है। पार्टी कार्यकर्ताओं ने हाथों में तख्तियां लेकर कड़ा विरोध जताया और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग तक कर डाली। विपक्षी दलों का आरोप है कि चुनाव आयोग के फैसले निष्पक्ष नहीं हैं और उन्हें किसी खास राजनीतिक दल के पक्ष में काम करने से रोका जाना चाहिए। विरोध प्रदर्शनों का यह दौर देश के कई अन्य हिस्सों में भी छोटे-बड़े रूपों में देखने को मिल रहा है।
स्थानीय स्तर पर हो रहे इन प्रदर्शनों से साफ है कि चुनाव आयोग और विपक्षी दलों के बीच का तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा है। लोकतंत्र में विरोध जताना हर राजनीतिक दल का अधिकार होता है, लेकिन जब बात संवैधानिक संस्थाओं के मुखिया की हो, तो यह बहस और भी गंभीर हो जाती है। चुनाव आयोग पर हमेशा से यह दबाव रहा है कि वह हर हाल में निष्पक्ष रहे और किसी भी तरह के राजनीतिक दबाव से दूर रहे। आम जनता भी इन विरोध प्रदर्शनों को बहुत ध्यान से देख रही है, क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत एक निष्पक्ष और मजबूत चुनाव प्रक्रिया में ही निहित होती है।
आगामी चुनावों और व्यवस्था पर इसका असर
भारत में चुनाव प्रक्रिया हमेशा से एक महापर्व की तरह होती है, जिसमें करोड़ों लोग हिस्सा लेते हैं। ऐसे में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य आयुक्तों की भूमिका बहुत संवेदनशील हो जाती है। जब भी चुनाव आयोग के किसी फैसले पर सवाल उठते हैं, तो पूरी व्यवस्था पर इसका असर पड़ना स्वाभाविक है। एक तरफ अंतरराष्ट्रीय मंच पर अध्यक्ष बनना और दूसरी तरफ देश के भीतर विरोध का सामना करना, यह दोनों ही स्थितियां एक साथ चल रही हैं। द फ्रीलान्स की टीम मानती है कि आने वाले समय में आयोग के सामने अपनी निष्पक्षता को साबित करने की और बड़ी चुनौतियां होंगी।
जनता के बीच भी इस बात की चर्चा आम है कि देश की संस्थाएं जितनी मजबूत होंगी, लोकतंत्र उतना ही बेहतर काम करेगा। चाहे वह अंतरराष्ट्रीय संस्था का नेतृत्व हो या फिर देश के भीतर उठ रहे तीखे सवाल, दोनों ही बातें भारतीय लोकतंत्र के जीवंत होने का प्रमाण देती हैं। चुनाव आयोग को अपनी कार्यशैली से यह भरोसा दिलाना होगा कि आम नागरिक का वोट सबसे सुरक्षित और मूल्यवान है। जैसे-जैसे साल 2026 नजदीक आएगा, इंटरनेशनल आइडिया के अध्यक्ष के रूप में ज्ञानेश कुमार के कामकाज पर भी पूरी दुनिया की नजरें टिकी रहेंगी।





