नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — अमेरिका में काम करने की इच्छा रखने वाले भारतीय पेशेवर और देश की बड़ी आईटी कंपनियों के लिए मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। ताजा घटनाक्रम में टीसीएस, विप्रो और इंफोसिस जैसी देश की दिग्गज आईटी कंपनियों को अमेरिका के लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम से निलंबित कर दिया गया है। इस कदम को भारतीय तकनीकी उद्योग के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है क्योंकि इससे अमेरिकी बाजार में कर्मचारियों की नियुक्ति और उनकी प्रोजेक्ट प्लानिंग पर सीधा असर पड़ेगा। अमेरिकी प्रशासन लगातार वीजा नियमों को कड़ा कर रहा है ताकि स्थानीय नागरिकों को रोजगार में प्राथमिकता मिल सके।
इस बीच अमेरिकी संसद में एच-1बी वीजा प्रणाली में हो रहे कथित फ्रॉड और शोषण को लेकर भी तीखी आवाजें उठने लगी हैं। अमेरिकी सांसदों ने देश के नीति निर्माताओं को चिट्ठी लिखकर वीजा प्रणाली में हो रही कमियों को उजागर किया है और तुरंत सख्त कार्रवाई की मांग की है। सांसदों का कहना है कि वीजा नियमों की आड़ में बड़ी कंपनियां नियमों का उल्लंघन कर रही हैं जिससे विदेशी कामगारों का शोषण भी हो रहा है। इन शिकायतों के बाद अमेरिकी जांच एजेंसियों ने बड़ी कंपनियों की कार्यशैली की आंतरिक जांच तेज कर दी है।
वीजा नियम तोड़ा तो लगेगा ढाई करोड़ का जुर्माना
अमेरिकी संसद में पेश किए गए नए बिल के अनुसार यदि कोई कंपनी एच-1बी वीजा के नियमों का उल्लंघन करती पाई जाती है तो उसे भारी आर्थिक दंड भुगतना होगा। नए प्रस्ताव में जुर्माने की राशि को बढ़ाकर सीधे ढाई करोड़ रुपये यानी करीब तीन लाख डॉलर तक करने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा नियमों का गंभीर उल्लंघन करने पर संबंधित कंपनियों या अधिकारियों पर दस साल तक का बैन भी लगाया जा सकता है। यह नया कानून भारतीय प्रोफेशनल्स और कंपनियों के लिए एक बड़ी चेतावनी की तरह है जो अब तक इन वीजा के जरिए आसानी से कर्मचारियों को अमेरिका भेजते रहे थे।
प्रशासनिक सख्ती की चपेट में सिर्फ भारतीय कंपनियां ही नहीं बल्कि माइक्रोसॉफ्ट जैसी अमेरिकी टेक दिग्गज भी आ गई हैं। खबरों के मुताबिक माइक्रोसॉफ्ट पर भी एच-1बी वीजा के दुरुपयोग और ग्रीन कार्ड कार्यक्रम के नियमों को ताक पर रखने के आरोप लगे हैं जिसके बाद उसे भी इस प्रक्रिया से निलंबित कर दिया गया है। दुनिया की सबसे बड़ी तकनीकी कंपनियों में शुमार माइक्रोसॉफ्ट पर इस तरह की कार्रवाई से यह साफ हो गया है कि अमेरिका अब वीजा कानूनों के पालन को लेकर किसी भी तरह की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है।
भारतीय आईटी सेक्टर पर मंडरा रहा बड़ा संकट
अमेरिका के इन कड़े रुख से भारतीय आईटी कंपनियों के बिजनेस मॉडल पर बहुत बड़ा असर पड़ रहा है। टीसीएस, विप्रो और इंफोसिस जैसी कंपनियां अपनी परियोजनाओं को समय पर पूरा करने के लिए बड़ी संख्या में भारतीय इंजीनियरों को अमेरिका भेजती थीं। लेकिन लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम के निलंबन के बाद अब ऑन-साइट काम करने वाले कर्मचारियों के वीजा आवेदन फंस सकते हैं। इससे कंपनियों की लागत बढ़ेगी और ग्राहकों को सेवाएं देने में देरी भी हो सकती है, जिसका सीधा असर इनके मुनाफे पर पड़ना तय माना जा रहा है।
जमीनी स्तर पर काम करने वाले जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में एच-1बी वीजा मिलना और भी ज्यादा मुश्किल हो जाएगा। कंपनियों को अब अमेरिकी नागरिकों और वहां पहले से मौजूद वैध कामगारों को ही नौकरी पर रखने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड पड़ताल से साफ है कि अमेरिका में अप्रवासन नीतियों पर राजनीति तेज हो गई है और इसका सबसे ज्यादा असर भारत के तकनीकी क्षेत्र और वहां काम करने वाले युवाओं के भविष्य पर पड़ रहा है।
नतीजों की चिंता में डूबे भारतीय पेशेवर
अमेरिका में रह रहे और वहां जाने की तैयारी कर रहे हजारों भारतीय प्रोफेशनल्स में इस नए घटनाक्रम के बाद भारी अनिश्चितता का माहौल है। जो लोग पहले से ही एच-1बी वीजा पर अमेरिका में नौकरी कर रहे हैं, वे भी अपने ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया को लेकर डरे हुए हैं। विभिन्न कंपनियों के एचआर विभाग अपने कानूनी सलाहकारों के साथ मिलकर इन नए नियमों का अध्ययन कर रहे हैं ताकि किसी भी तरह के भारी जुर्माने या कानूनी कार्रवाई से बचा जा सके।






