नई दिल्ली से ग्राउंड रिपोर्ट — देश की राजधानी में विरोध-प्रदर्शनों और भाषणबाजी का दौर इन दिनों एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। देश के जाने-माने वकील हरीश साल्वे ने एक बड़ा बयान देते हुए कहा है कि भारत में हो रहे कुछ विरोध-प्रदर्शनों के पीछे विदेशी फंडिंग और बाहरी दखल शामिल है। उन्होंने साफ शब्दों में मांग की है कि भारत सरकार को इस पूरे मामले की गहराई से जांच करवानी चाहिए। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में बहस छिड़ गई है और यह मुद्दा सोशल मीडिया पर भी लगातार ट्रेंड कर रहा है।
एक तरफ जहां विदेशी दखल और फंडिंग को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों की जगह तय करने को लेकर प्रशासनिक नियम भी बदल दिए गए हैं। केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय के नए फरमान के मुताबिक अब ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर हर तरह के धरना-प्रदर्शन आसानी से नहीं हो सकेंगे। सरकार ने दिल्ली के भीतर विरोध-प्रदर्शन करने के लिए तीन नए स्थान तय कर दिए हैं। इस कदम के बाद से स्थानीय प्रशासन और आंदोलन करने वाले संगठनों के बीच तनाव की स्थिति बनती दिख रही है।
जंतर-मंतर के नियम बदलने पर आमने-सामने सरकार और संगठन
गृह मंत्रालय के इस नए निर्देश के बाद विरोध प्रदर्शन करने वाले संगठनों ने प्रशासन पर दबाव बढ़ा दिया है। सिविल सोसाइटीज और अधिकारों के लिए लड़ने वाले समूहों ने दिल्ली पुलिस को अल्टीमेटम देना शुरू कर दिया है। CJP यानी सिटिजंस फॉर जस्टिस एंड पीस ने दिल्ली पुलिस को साफ अल्टीमेटम दिया है कि वह जंतर-मंतर या तयशुदा जगहों पर प्रदर्शन के लिए तारीख और समय जल्द से जल्द तय करे। संगठनों का कहना है कि अपनी बात कहने का अधिकार लोकतांत्रिक देश में हर नागरिक का है और नियमों के नाम पर आवाज को दबाया नहीं जा सकता है।
दूसरी ओर, सुरक्षा एजेंसियों और सरकार का मानना है कि राजधानी की कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए भीड़भाड़ वाले इलाकों में कड़े नियम जरूरी हैं। अधिकारियों का कहना है कि कई बार छोटे-छोटे धरनों की वजह से आम जनता को भारी जाम और परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसी समस्या से निपटने के लिए दिल्ली के दूसरे कोनों में नए प्रोटेस्ट साइट्स बनाए गए हैं, ताकि शहर का ट्रैफिक भी सुचारू रूप से चलता रहे और प्रदर्शनकारियों को भी अपनी बात रखने की जगह मिल सके।
विदेशी फंडिंग और राजनीतिक बयानों का नया दौर
हरीश साल्वे के बयान के बाद राजनीतिक दलों में भी जुबानी जंग तेज हो गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक बार फिर सरकार और सत्ताधारी दल पर तीखा हमला बोला है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि देश में खास विचारधारा के संगठनों को पूरी छूट दी जा रही है। उन्होंने सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो शेयर करते हुए दावा किया कि पुलिस प्रशासन को युवाओं की पिटाई करने तक के आदेश दिए गए हैं। विपक्षी दल इन बयानों के जरिए सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं और कह रहे हैं कि लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचला जा रहा है।
इन घरेलू विवादों के बीच अंतरराष्ट्रीय मंचों और बयानों पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडे ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग और न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा है कि भारत के आंतरिक मामलों पर सवाल उठाने वाले संस्थान दुनिया के दूसरे हिस्सों में होने वाली घटनाओं पर चुप क्यों रहते हैं। उन्होंने इसे पश्चिमी मीडिया और संस्थाओं की दोहरी नीति करार दिया है।
द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल
हमारी जमीनी पड़ताल बताती है कि देश में एक तरफ जहां कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर विरोध प्रदर्शनों के तौर-तरीके बदले जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ वैचारिक लड़ाई तेज हो गई है। विदेशी फंडिंग के दावों की जांच होगी या नहीं, यह तो आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन राजधानी में धरने-प्रदर्शनों की जगह बदलना और उस पर राजनीति गरमाना तय है। आम जनता इस पूरे घटनाक्रम में अपनी रोजमर्रा की परेशानियों और राजनीतिक बयानों के बीच पिसती नजर आ रही है।









