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देशपढ़ने में समय: 4 मिनट

जंतर-मंतर को प्रदर्शन सूची से हटाने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र और दिल्ली पुलिस से मांगा जवाब

राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की आधिकारिक सूची से हटाए जाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। शीर्ष अदालत ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है और जवाब तलब किया है। इसके साथ ही मुख्य न्यायाधीश ने साफ कहा है कि कोई भी अदालत पर दबाव नहीं बना सकता है।
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नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•15 अक्टूबर 2026 • अपडेटेड•36
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जंतर-मंतर को प्रदर्शन सूची से हटाने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र और दिल्ली पुलिस से मांगा जवाब
📷 जंतर-मंतर को प्रदर्शन सूची से हटाने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र और दिल्ली पुलिस से मांगा जवाब — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की आधिकारिक सूची से हटाए जाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। शीर्ष अदालत ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है और जवाब तलब किया है। इसके साथ ही मुख्य न्यायाधीश ने साफ कहा है कि कोई भी अदालत पर दबाव नहीं बना सकता है।
  • इस खबर से जुड़े सभी पहलुओं की जांच और निगरानी संबंधित विभागों द्वारा की जा रही है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार इस घटनाक्रम का आम जनता पर सीधा असर पड़ सकता है।

नई दिल्ली से हमारी विशेष फील्ड रिपोर्ट के अनुसार, देश की राजधानी में प्रदर्शन करने के अधिकार और सार्वजनिक जगहों के इस्तेमाल को लेकर कानूनी लड़ाई तेज हो गई है। दिल्ली के जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाए जाने के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर संज्ञान लिया है। अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस से कड़ा जवाब मांगा है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब विपक्षी दलों और विभिन्न समूहों द्वारा लगातार लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन और पाबंदियों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

इस पूरे मामले की गूंज तब और तेज हो गई जब राजनीतिक दलों के नेताओं और INDIA ब्लॉक की तरफ से अदालतों का दरवाजा खटखटाया गया। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का बुनियादी अधिकार है। ऐसे में किसी मुख्य स्थल को प्रदर्शन की सूची से ही बाहर कर देना सीधे तौर पर असहमति की आवाज़ को दबाने जैसा है। कोर्ट ने इस दलील को गंभीरता से सुना है और अब प्रशासन को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया है।

जंतर-मंतर को सूची से बाहर करने पर क्यों मचा है बवाल?

दशकों से जंतर-मंतर को देश भर के आंदोलनों, धरना-प्रदर्शनों और विरोध रैलियों का मुख्य केंद्र माना जाता रहा है। मजदूर संगठनों से लेकर छात्र नेताओं और आम नागरिकों तक ने अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए इसी जमीन का इस्तेमाल किया है। लेकिन पिछले कुछ समय से स्थानीय नियमों और प्रशासनिक आदेशों के तहत यहां विरोध प्रदर्शनों पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए। जब इस प्रशासनिक फैसले को औपचारिक रूप से चुनौती दी गई, तब जाकर यह मामला सुप्रीम कोर्ट की देहरी तक पहुंचा है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून का पालन सभी के लिए बराबर है और अदालती प्रक्रियाओं को प्रभावित करने का प्रयास स्वीकार नहीं किया जाएगा। मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान अपनी सख्त टिप्पणी में यह बात साफ कर दी कि दबाव की राजनीति से न्यायपालिका के काम में दखल नहीं दिया जा सकता। इसके बावजूद, विरोध प्रदर्शन की जगहों के चयन और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाने का मुद्दा अब बेहद गंभीर बन चुका है.

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चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों की याचिकाओं पर भी नजर

इस कानूनी हलचल के बीच चुनाव आयोग के कामकाज और विरोध प्रदर्शनों से जुड़े अन्य मामलों पर भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं की तरफ से दायर की गई याचिकाओं में भी चुनावी प्रक्रिया और संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए हैं। कोर्ट ने इन सभी मामलों में संतुलन साधते हुए संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए हैं। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि राजधानी में प्रदर्शन करने के नियम कितने सख्त या उदार रहते हैं।

हमारी जमीनी पड़ताल बताती है कि स्थानीय पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां सुरक्षा और ट्रैफिक व्यवस्था का हवाला देकर जंतर-मंतर जैसे संवेदनशील इलाकों में भीड़ जुटाने के खिलाफ हैं। वहीं दूसरी ओर, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस तरह की पाबंदियां लोकतंत्र के मूल ढांचे को कमजोर करती हैं। अब सबकी निगाहें केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस के उस आधिकारिक जवाब पर टिकी हैं जो उन्हें सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करना है।

आगे क्या होगा और प्रशासन के पास क्या हैं विकल्प?

सुप्रीम कोर्ट के इस नए नोटिस के बाद केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस के कानूनी सलाहकारों पर दबाव बढ़ गया है। उन्हें अदालत को यह समझाना होगा कि किन ठोस कारणों के चलते जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाया गया और क्या इसके विकल्प के तौर पर कोई अन्य जगह पूरी तरह सुरक्षित और सुलभ है। यदि सरकार अदालत को संतुष्ट नहीं कर पाती है, तो प्रदर्शनकारियों के लिए पुरानी व्यवस्था बहाल होने का रास्ता खुल सकता है।

द फ्रीलान्स की टीम इस मामले से जुड़ी हर कानूनी और प्रशासनिक हलचल पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगी। राजधानी की सड़कों पर अधिकारों की इस जंग में अगला अदालती मोड़ तय करेगा कि आने वाले दिनों में जनता अपनी आवाज किस मंच से और किस हद तक बुलंद कर पाएगी। फिलहाल, सभी पक्षों को अदालत के अगले औपचारिक आदेश का इंतजार है।

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