नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति एक बार फिर बड़े विवादों के घेरे में आ गई है। मध्य पूर्व के एक प्रमुख मुस्लिम देश को झुकाने और उसका प्रभाव पूरी तरह खत्म करने चले डोनाल्ड ट्रंप को खुद भारी फजीहत का सामना करना पड़ा है। हाल ही में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक इस राजनीतिक और रणनीतिक उठापटक में अमेरिका को 31,943 करोड़ रुपये से ज्यादा का बड़ा आर्थिक चूना लगा है। हमारी ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि इस मामले में अमेरिकी प्रशासन के शुरुआती दावे खोखले साबित हुए और जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग निकली।
विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन ने बिना सोचे-समझे जो आक्रामक कदम उठाए, उसने मध्य पूर्व की भू-राजनीति को और अधिक अशांत कर दिया। इस पूरे विवाद के केंद्र में कच्चे तेल की सप्लाई और रणनीतिक जलडमरूमध्य यानी होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण का मुद्दा प्रमुखता से उभरा। अमेरिकी नौसेना के दावों के विपरीत, उस क्षेत्र में स्थानीय ताकतों ने डटकर मुकाबला किया, जिससे वैश्विक बाजार में खलबली मच गई। इस अफरातफरी के बीच कच्चे तेल के दाम आसमान छूने लगे और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर इसका बुरा असर पड़ा।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण और तेल संकट
होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिकी नौसेना की गतिविधियों और बयानों ने वैश्विक स्तर पर तनाव को कई गुना बढ़ा दिया। ट्रंप ने दावा किया था कि इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर अमेरिकी सेना का पूरा नियंत्रण है, लेकिन जमीनी हालात ने इन दावों की हवा निकाल दी। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी को इस संकट से निपटने के लिए बाजार में बड़े पैमाने पर रणनीतिक तेल भंडार जारी करने पड़े। तेल की कीमतों में आए इस उथल-पुथल के कारण पूरी दुनिया में महंगाई का दबाव बढ़ गया और अमेरिका को अपने ही फैसलों की भारी कीमत चुकानी पड़ी।
इस बीच कूटनीतिक गलियारों में नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गईं, जहां ट्रंप के समर्थकों और विरोधियों के बीच तीखी बहस छिड़ गई। एक तरफ जहां ट्रंप अपनी नीतियों को अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आर्थिक जानकारों का कहना है कि यह अमेरिका के लिए एक महंगा सौदा साबित हुआ है। दस साल पहले विदेशों में फंसे आम मजदूरों और उनके परिवारों के संघर्ष की दर्दनाक दास्तां भी इस बात की गवाही देती है कि बड़ी ताकतों के इन फैसलों का खामियाजा अंततः आम इंसानों को ही भुगतना पड़ता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार और आईईए की आपातकालीन बैठकें
इस पूरे घटनाक्रम के बाद अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी यानी आईईए ने साफ कर दिया है कि जरूरत पड़ने पर वैश्विक बाजार में और अधिक कच्चा तेल जारी किया जाएगा। अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा उठाए गए कदमों से बाजार में स्थिरता लाने की कोशिश तो की जा रही है, लेकिन निवेशकों का भरोसा डगमगा गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक मध्य पूर्व में कूटनीतिक संवाद बहाल नहीं होता, तब तक वैश्विक अर्थव्यवस्था पर यह संकट मंडराता रहेगा। ट्रंप की नीतियों के चलते पैदा हुई इस स्थिति ने अमेरिकी खजाने को तगड़ा झटका दिया है।
आम जनता और छोटे व्यापारियों के लिए भी यह समय काफी मुश्किल भरा साबित हो रहा है क्योंकि ईंधन के दाम बढ़ने से हर जरूरी चीज महंगी हो गई है। सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों के साथ अमेरिका के बदलते रिश्तों ने वैश्विक समीकरणों को नए सिरे से परिभाषित करना शुरू कर दिया है। द फ्रीलान्स की इस विशेष पड़ताल से यह साफ हो जाता है कि आक्रामक सैन्य और आर्थिक दबाव की नीतियां अब पुरानी पड़ चुकी हैं और इनका उल्टा असर महाशक्तियों पर ही भारी पड़ रहा है।
भविष्य के कूटनीतिक समीकरण और अमेरिका की किरकिरी
आने वाले दिनों में अमेरिका की इस रणनीति के दूरगामी परिणाम देखने को मिलेंगे। जिस तरह से 31,943 करोड़ रुपये का भारी नुकसान अमेरिकी जनता के सामने आया है, उसने वहां के राजनीतिक गलियारों में भी सवाल खड़े कर दिए हैं। ट्रंप के आलोचक इसे उनकी अदूरदर्शिता का प्रमाण मान रहे हैं। द फ्रीलान्स की टीम इस पूरे मामले पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगी और आगे भी आपको पल-पल की सटीक जमीनी सच्चाई से अवगत कराती रहेगी।




