अमरावती/ग्राउंड ब्यूरो — आंध्र प्रदेश में बुजुर्गों और जरूरतमंदों को मिलने वाली पेंशन का मुद्दा इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा में है। राज्य के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू की सरकार ने पेंशन योजनाओं को लेकर कई बड़े कदम उठाए हैं। आम लोगों के बीच यह सवाल सबसे बड़ा है कि इस महीने पेंशन समय पर मिलेगी या नहीं। द फ्रीलान्स की टीम ने जमीनी स्तर पर जाकर यह जानने की कोशिश की कि पेंशनर्स के मन में इस योजना को लेकर क्या चल रहा है।
बीते कुछ समय से राज्य में पेंशन की रकम और इसके वितरण के तरीके को लेकर काफी राजनीति भी देखने को मिली है। पिछले साल वाईएस जगन मोहन रेड्डी के कार्यकाल में 'वाईएसआर पिंघनु कानुका' योजना के तहत घर-घर जाकर पैसे देने का नियम काफी चर्चा में रहा था। अब सत्ता बदलने के बाद नई सरकार ने भी पेंशन वितरण व्यवस्था को सुचारू बनाने के लिए नए निर्देश जारी किए हैं। गांवों और शहरों में लोग बैंक खातों और डाकघरों के जरिए मिलने वाले पैसों का हिसाब लगा रहे हैं।
समय पर पेंशन वितरण की नई व्यवस्था
राज्य सरकार ने यह सुनिश्चित करने का दावा किया है कि हर महीने की पहली तारीख को ही पेंशनर्स के हाथों में पैसे पहुंच जाएं। कई इलाकों में ग्रामीण बैंक और डाकघर के कर्मचारी सुबह-सुबह ही बुजुर्गों के घर दस्तक दे रहे हैं। हालांकि, कुछ दूर-दराज के गांवों में तकनीकी दिक्कतों की वजह से आज भी लोगों को लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ता है। स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि कागजी कार्रवाई और आधार मिलान के चक्कर में कई बार पूरा दिन निकल जाता है।
प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि किसी भी पात्र लाभार्थी का नाम काटा नहीं गया है। सरकार की कोशिश है कि बिचौलियों को पूरी तरह बाहर रखकर सीधे बैंक खातों या नकद माध्यम से सही व्यक्ति तक पैसा पहुंचाया जाए। इसके लिए जिला स्तर पर विशेष निगरानी दल भी बनाए गए हैं जो हर गांव की रिपोर्ट ले रहे हैं। गांव के चौपालों पर चाय की चुस्कियों के साथ इस बात की चर्चा आम है कि इस बार पेंशन की राशि समय पर मिली या नहीं।
राजनीतिक बयानबाजी और जनता का नजरिया
इस पूरे मामले पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग भी लगातार जारी है। विपक्षी दलों का आरोप है कि मौजूदा सरकार पुरानी कल्याणकारी योजनाओं के नाम बदलने में लगी है। वहीं, सत्तारूढ़ दल का कहना है कि वे पहले से बेहतर और पारदर्शी तरीके से लोगों तक मदद पहुंचा रहे हैं। इन सबके बीच आम जनता सिर्फ अपने हक के पैसों से मतलब रखती है। लोगों का कहना है कि उन्हें राजनीति से ज्यादा इस बात से फर्क पड़ता है कि महीने के पहले हफ्ते में उनके घर का खर्च चलाने के लिए पैसे आ रहे हैं या नहीं।
बुजुर्ग महिलाओं और पुरुषों से जब हमारी टीम ने बात की तो कई तरह की बातें सामने आईं। कुछ लोगों ने प्रक्रिया आसान होने की बात कही तो कुछ ने अभी भी पुरानी व्यवस्था को ही बेहतर बताया। महंगाई के इस दौर में यह पेंशन की राशि कई परिवारों के लिए जीवनयापन का मुख्य सहारा बनी हुई है। राशन खरीदने से लेकर दवाइयों का खर्च उठाने तक, यह पैसा हर महीने एक बड़ी राहत लेकर आता है।
द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल
हमारी पड़ताल में यह बात साफ सामने आई है कि आंध्र प्रदेश में पेंशन का मुद्दा सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं बल्कि लाखों परिवारों की आजीविका का सवाल है। सरकार चाहे किसी की भी हो, जनता अपनी बुनियादी सुविधाओं पर कोई समझौता नहीं चाहती है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार पेंशन की राशि बढ़ाने या नियमों में क्या नए बदलाव करती है। द फ्रीलान्स की नजर इस खबर पर आगे भी बनी रहेगी और हम जमीनी सच आप तक पहुंचाते रहेंगे।








