कोलकाता/ग्राउंड ब्यूरो — कलकत्ता हाईकोर्ट इन दिनों देश भर की कानूनी और राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में बना हुआ है। पिछले कुछ दिनों में इस अदालत ने एक के बाद एक कई ऐसे अहम फैसले दिए हैं जिनका सीधा असर आम जनता से लेकर बड़े राजनेताओं तक पर पड़ रहा है। चाहे वह नागरिकता का संवेदनशील मामला हो या फिर लोकसभा सांसद की गिरफ्तारी पर रोक का आदेश, हाईकोर्ट की हर एक टिप्पणी पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं। हमारी ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि अदालत के इन फैसलों से पश्चिम बंगाल की राजनीति और कानूनी गलियारों में हलचल काफी तेज हो गई है।
ताजा कानूनी घटनाक्रमों में सबसे बड़ा मामला नागरिकता और सरकारी सूची से नाम हटाने से जुड़ा हुआ है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक ऐसे मामले की सुनवाई की जहां एक व्यक्ति का नाम सूची से यह कहकर हटा दिया गया था कि वह बांग्लादेशी है। अदालत ने इस मामले में साफ कहा है कि संबंधित व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि वह असल में भारतीय नागरिक है। इस कड़े निर्देश ने सीमावर्ती इलाकों में अवैध घुसपैठ और नागरिकता की पहचान के चल रहे पुराने मुद्दों को एक बार फिर से सतह पर ला दिया है। अदालत का यह रुख साफ करता है कि देश की सुरक्षा और कानूनी दस्तावेजों की जांच में किसी भी तरह की ढील बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
महुआ मोइत्रा को गिरफ्तारी से सुरक्षा और राजनीतिक हलचल
राजनीतिक मोर्चे पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा को बड़ी राहत दी है। अदालत ने उनके खिलाफ एक हेट स्पीच यानी भड़काऊ भाषण के मामले में चल रहे गिरफ्तारी वारंट पर रोक लगा दी है। इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है, क्योंकि आने वाले दिनों में इसे लेकर सियासी बयानबाजी और तेज होने की पूरी उम्मीद है। अदालत के इस अंतरिम आदेश से फिलहाल सांसद को बड़ी कानूनी राहत मिली है और पुलिस की कार्रवाई पर रोक लग गई है।
दूसरी तरफ, पश्चिम बंगाल में शिक्षा व्यवस्था और छात्रों के भविष्य से जुड़े संवेदनशील नीट परीक्षा का मामला भी अब कलकत्ता हाईकोर्ट की चौखट तक पहुंच गया है। राज्य से जुड़े नीट परीक्षा का यह पहला मामला है जो इस अदालत के सामने सुनवाई के लिए आया है। छात्र और अभिभावक इस बात को लेकर बेहद चिंतित हैं कि परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता कैसे बनी रहे। अदालत इस पूरे मामले की बहुत बारीकी से जांच कर रही है ताकि किसी भी छात्र के भविष्य के साथ कोई खिलवाड़ न हो सके और न्याय सुनिश्चित किया जा सके।
असुरक्षित इमारतों को बिजली कनेक्शन पर हाईकोर्ट की दो टूक
कानून और व्यवस्था के अलावा बुनियादी नागरिक सुविधाओं से जुड़े मामलों पर भी कलकत्ता हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने अपने एक अन्य महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि किसी भी ऐसी इमारत को बिजली का कनेक्शन देने का निर्देश नहीं दिया जा सकता जिसे स्थानीय प्रशासन ने पहले ही असुरक्षित घोषित कर दिया है। इस फैसले से साफ हो गया है कि जनता की जान और सुरक्षा कागजी अनुमति से ज्यादा अहम है। नगर निकायों और बिजली वितरण कंपनियों के लिए यह आदेश एक बहुत बड़ा दिशा-निर्देश साबित होगा।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य सरकार के मामलों को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक अक्सर कानूनी खींचतान देखने को मिलती है। हालिया फैसलों ने यह साबित कर दिया है कि न्यायपालिका राज्य की हर गतिविधि पर पैनी नजर रखे हुए है। चाहे प्रशासनिक लापरवाही हो या राजनीतिक विवाद, अदालत का दरवाजा खटखटाने वालों को कानून के दायरे में ही न्याय मिल रहा है। द फ्रीलान्स की टीम इन सभी मामलों की आगे भी लगातार और गहरी पड़ताल जारी रखेगी।
कानूनी जानकारों की राय और आगे की राह
वरिष्ठ वकीलों और कानूनी जानकारों का मानना है कि कलकत्ता हाईकोर्ट के ये सभी फैसले आने वाले समय में एक मजबूत मिसाल बनेंगे। चाहे वह नागरिकता साबित करने की बात हो या असुरक्षित निर्माणों पर बिजली रोकने का आदेश, हर फैसला समाज में अनुशासन लाने का काम कर रहा है। आम जनता भी अदालत के इन सख्त और पारदर्शी कदमों की सराहना कर रही है क्योंकि इससे कानून के राज पर लोगों का भरोसा और अधिक मजबूत होता है।



