नई दिल्ली और कीव से 'द फ्रीलान्स' की विशेष ग्राउंड रिपोर्ट — रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे खूनी संघर्ष को आज लंबा वक्त बीत चुका है, लेकिन युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा है। यूक्रेन की राजधानी कीव पर रूस के हमले लगातार जारी हैं। हाल ही में यूक्रेन के एक मिसाइल उत्पादन संयंत्र को निशाना बनाया गया है। इसके अलावा देश के दो सबसे अहम पुलों पर भी ड्रोन से हमले किए गए हैं, जिससे लाखों गाड़ियों की आवाजाही पर बुरा असर पड़ा है। इस युद्ध के बीच दुनिया के 32 नाटो देशों के प्रतिनिधि अचानक कीव पहुंचे हैं। नाटो देशों के इस बड़े दौरे से इलाके में तनाव और ज्यादा बढ़ गया है। रूस और यूक्रेन के बीच चल रही इस जंग के कारण पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था हिल गई है और आम लोगों का जीवन मुश्किल हो गया है।
इस पूरे मामले पर भारत ने अपना रुख पूरी तरह साफ कर दिया है। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय यानी एमईए ने दो टूक कहा है कि युद्ध किसी भी समस्या का हल नहीं है। भारत का साफ मानना है कि बातचीत और कूटनीति ही आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है। इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए भारत ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की को एक खास तीन सूत्रीय पीस प्लान यानी शांति प्रस्ताव भेजा है। इस शांति प्लान में यह जोर दिया गया है कि दोनों देशों को तुरंत हिंसा रोकनी चाहिए और मेज पर बैठकर आपसी बातचीत से मसले को हल करना चाहिए। भारत की इस पहल की पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है, क्योंकि भारत दोनों देशों के साथ अच्छे रिश्ते रखता है और शांति की बात करता है।
काला सागर में ड्रोन हमलों से भारत पर क्या असर पड़ रहा है?
इस जंग का असर केवल यूरोप तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर भारत जैसे दूर बैठे देशों पर भी पड़ रहा है। हाल ही में काला सागर में एक बड़ा हादसा हुआ है। यूक्रेन के ड्रोन हमले की वजह से काला सागर से गुजर रहे एक तेल टैंकर में भयंकर आग लग गई। इस हमले के बाद आसमान दूर तक काले धुएं से भर गया। काला सागर का यह इलाका दुनिया भर में गेहूं और तेल के व्यापार के लिए बहुत जरूरी माना जाता है। इस समुद्री रास्ते के बंद होने या असुरक्षित होने से भारत आने वाले खाने के तेल और गेहूं की सप्लाई पर बड़ा असर पड़ सकता है। इसके अलावा इस रास्ते पर काम करने वाले भारतीय नाविकों की सुरक्षा को लेकर भी बड़ा खतरा पैदा हो गया है। भारत के कई नाविक इन जहाजों पर काम करते हैं, जिनकी सुरक्षा को लेकर उनके परिवार वाले बेहद डरे हुए हैं।
यूक्रेन के अंदर हालात लगातार बदतर होते जा रहे हैं। रूस की तरफ से भेजे जा रहे ड्रोन शहर के रिहायशी इलाकों और जरूरी बुनियादी ढांचे को निशाना बना रहे हैं। यूक्रेन के जिन दो बड़े पुलों पर हमले हुए हैं, वे वहां की आम जनता के आने-जाने के लिए बहुत जरूरी थे। इन पुलों के टूटने या क्षतिग्रस्त होने से आम लोगों को राहत सामग्री पहुंचाने में भी बड़ी मुश्किलें आ रही हैं। जान-माल का यह नुकसान आने वाले दिनों में मानवीय संकट को और गहरा कर सकता है। अंतरराष्ट्रीय राहत एजेंसियां लगातार चेतावनी दे रही हैं कि अगर हमलों का यह दौर नहीं रुका, तो आने वाले सर्दियों के महीनों में स्थिति और भी ज्यादा भयानक हो जाएगी।
शांति की उम्मीद और वैश्विक कूटनीति का भविष्य
एक तरफ जहां युद्ध के मैदान में बारूदों की गंध तेज हो रही है, वहीं दूसरी तरफ कूटनीतिक गलियारों में मुलाकातों का दौर भी जारी है। नाटो देशों के 32 प्रतिनिधियों का कीव पहुंचना यह साफ दिखाता है कि पश्चिमी देश यूक्रेन को अकेला छोड़ने के मूड में नहीं हैं। वे लगातार यूक्रेन को सैन्य और आर्थिक मदद दे रहे हैं। हालांकि, इन सब के बीच भारत की भूमिका एक शांतिदूत के रूप में उभर कर सामने आई है। भारत ने बार-за-बार यह कहा है कि वैश्विक मंच पर भारत का रुख हमेशा से शांति के पक्ष में रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति का यह असर है कि आज दुनिया का हर बड़ा देश भारत के शांति प्रस्ताव को बहुत गंभीरता से सुन रहा है।
जमीन पर मौजूद हमारे संवाददाताओं और अंतरराष्ट्रीय एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब तक रूस और यूक्रेन दोनों पक्ष किसी समझौते पर राजी नहीं होते, तब तक यह संकट थमता नजर नहीं आएगा। काला सागर में तेल टैंकरों पर हमले और नाटो देशों की बढ़ती दखलअंदाजी ने इस लड़ाई को और ज्यादा पेचीदा बना दिया है। भारत की तरफ से भेजा गया तीन सूत्रीय शांति प्लान क्या रंग लाएगा, यह आने वाले कुछ हफ्तों में साफ हो जाएगा। फिलहाल, भारत सरकार अपने नागरिकों, खासकर वहां फंसे छात्रों और नाविकों की सुरक्षा पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है। 'द फ्रीलान्स' इस पूरी जंग और उसके भारत पर पड़ने वाले हर असर की पल-पल की ग्राउंड रिपोर्ट आप तक आगे भी पहुंचाता रहेगा।







