नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी के दिल कहे जाने वाले कनॉट प्लेस में इन दिनों राजनीतिक सरगर्मी और विरोध प्रदर्शनों का दौर चरम पर है। स्थिति यह है कि एक तरफ पुलिस और अदालतों की सख्ती के बीच तिरंगा मार्च निकालने की जिद पर घमासान मचा है, तो दूसरी तरफ त्योहारी सीजन के बीच कारोबारियों की धड़कनें बढ़ी हुई हैं। हालात ऐसे बन चुके हैं कि आम खरीदार और पर्यटक यहां आने से कतराने लगे हैं। द फ्रीलान्स की टीम ने मौके पर पहुंचकर जब हालात का जायजा लिया, तो व्यापारियों का दर्द खुलकर सामने आया। बाजारों में इस समय खरीदारों की भीड़ होनी चाहिए थी, लेकिन प्रदर्शनों के डर से लोग आने से बच रहे हैं।
पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब सीजेपी से जुड़े अभिजीत दिपके ने कनॉट प्लेस में बड़ा तिरंगा मार्च निकालने का खुला ऐलान कर दिया। उन्होंने सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से लोगों से भारी संख्या में जुड़ने की अपील की थी। इस ऐलान के बाद दिल्ली पुलिस पूरी तरह मुस्तैद हो गई और सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई। पुलिस ने साफ कर दिया कि बिना अनुमति के किसी भी तरह का जमावड़ा या मार्च बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मामला दिल्ली हाईकोर्ट तक जा पहुंचा, जहां पुलिस ने अदालत को भरोसा दिलाया कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए वे हरसंभव सख्त कदम उठाएंगे। इसके बाद मार्च को लेकर कानूनी शिकंजा और ज्यादा कसता चला गया।
तिरंगा मार्च के ऐलान पर पुलिस और अदालत की कड़ी नजर
अभिजीत दिपके के इस ऐलान के बाद प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया। दिल्ली पुलिस के अधिकारियों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि तय नियमों का उल्लंघन किया गया तो कानूनी कार्रवाई तय है। अदालत में सुनवाई के दौरान भी पुलिस का रुख बेहद सख्त नजर आया। अधिकारियों ने कोर्ट को बताया कि शहर की शांति भंग करने की अनुमति किसी को नहीं दी जा सकती। दूसरी तरफ, आयोजकों का कहना था कि तिरंगा लहराना किसी का भी लोकतांत्रिक अधिकार है। इस खींचतान के बीच कनॉट प्लेस के अलग-अलग ब्लॉकों में पुलिस बल तैनात कर दिया गया। आने-जाने वाले हर व्यक्ति पर पैनी नजर रखी जा रही है ताकि किसी भी अप्रिय घटना को समय रहते रोका जा सके।
राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के प्रदर्शनों का सिलसिला यहीं नहीं थमा। कनॉट प्लेस की सड़कों पर भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन यानी एनएसयूआई के कार्यकर्ताओं ने भी जोरदार प्रदर्शन किया। इस दौरान प्रदर्शनकारी महिलाओं और पुलिस के बीच तीखी झड़प देखने को मिली। हालात को काबू में करने के लिए महिला पुलिसकर्मियों को मोर्चा संभालना पड़ा। नारेबाजी और हंगामे के बीच पुलिस ने कई प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोक दिया। कुछ देर के लिए इलाके में अफरा-तफरी का माहौल बन गया, जिससे खरीदारी करने आए आम लोग बुरी तरह सहम गए। इस तरह के लगातार आयोजनों ने पूरे इलाके की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है।
त्योहारी सीजन में व्यापारियों की मार्मिक पुकार और ठप कारोबार
धनतेरस, दिवाली और शादियों के इस मुख्य सीजन में कनॉट प्लेस के व्यापारियों के चेहरों पर मायूसी छाई हुई है। दुकानदारों का कहना है कि साल भर वे इसी सीजन का इंतजार करते हैं ताकि अच्छा मुनाफा कमा सकें। लेकिन पिछले कुछ दिनों से लगातार हो रहे प्रदर्शनों, मार्च और पुलिस पहरे के कारण ग्राहक दुकानों तक पहुंच ही नहीं पा रहे हैं। कई दुकानदारों ने द फ्रीलान्स से बातचीत में बताया कि उनका रोज का किराया और कर्मचारियों का खर्च भी निकलना मुश्किल हो गया है। बार-बार लगने वाले जाम और सुरक्षा बैरिकेडिंग से खरीदार दूसरे बाजारों का रुख कर रहे हैं। व्यापारियों ने प्रशासन और राजनीतिक दलों से अपील की है कि वे कम से कम त्योहारी दिनों में इस तरह के आयोजनों से बचें।
जमीनी स्तर पर हालात यह हैं कि कनॉट प्लेस के इनर और आउटर सर्कल में पुलिस की गाड़ियां लगातार गश्त कर रही हैं। आम दिनों में गुलजार रहने वाले इन परिसरों में सन्नाटा तो नहीं है, लेकिन खरीदारों की चहल-पहल बहुत कम हो गई है। सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों के बीच पर्यटक और स्थानीय लोग असमंजस में हैं कि वे बाहर निकलें या घर पर रहें। पुलिस प्रशासन का कहना है कि सुरक्षा उनकी पहली प्राथमिकता है और किसी को भी कानून हाथ में लेने की छूट नहीं दी जाएगी। आने वाले दिनों में जब तक त्योहार का माहौल रहेगा, तब तक पुलिस बल तैनात रहने की संभावना है।
कानून व्यवस्था और कारोबार के बीच उलझा कनॉट प्लेस का भविष्य
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि लोकतांत्रिक अधिकारों और व्यापारिक हितों के बीच संतुलन कैसे बैठाया जाए। एक तरफ नागरिक संगठन अपनी बात रखने के लिए सार्वजनिक स्थलों को चुनते हैं, तो दूसरी तरफ आम जनता और व्यापारी वर्ग इसका खामियाजा भुगतता है। पुलिस के लिए भी यह दोहरी चुनौती है कि वे एक तरफ शांति व्यवस्था कायम रखें और दूसरी तरफ लोगों के मौलिक अधिकारों का भी हनन न होने दें। द फ्रीलान्स की पड़ताल बताती है कि जब तक प्रशासन और संगठनों के बीच कोई ठोस संवाद नहीं बनता, तब तक ऐसी स्थितियां बार-बार पैदा होती रहेंगी। फिलहाल हर किसी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में प्रशासन इस सख्ती को कैसे आगे बढ़ाता है और व्यापारी अपने नुकसान की भरपाई कैसे कर पाते हैं।








