नई दिल्ली से 'द फ्रीलान्स' की विशेष ग्राउंड रिपोर्ट। भारत और चीन के रिश्तों को लेकर एक बार फिर देश के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बेहद कड़े और दो टूक शब्दों में अपनी बात रखी है। उन्होंने साफ कर दिया है कि दोनों पड़ोसी देशों के बीच सामान्य संबंध तभी बहाल हो सकते हैं जब सीमा पर पूरी तरह शांति और स्थिरता का माहौल हो। विदेश मंत्री के इस बयान ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति हलकों में बड़ा संदेश दिया है। भारत ने दुनिया के सामने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी क्षेत्रीय अखंडता और सुरक्षा के साथ किसी भी प्रकार का समझौता करने के मूड में नहीं है। पूर्वी लद्दाख में पिछले कुछ वर्षों से चले आ रहे गतिरोध के बाद से भारत का रुख लगातार अडिग रहा है और इस ताज़ा बयान ने उसी नीति को और अधिक मजबूती दी है।
विदेश मंत्री ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि रिश्तों की गाड़ी को पटरी पर लाने के लिए दोनों पक्षों को आपसी सम्मान, आपसी संवेदनशीलता और आपसी हितों का पूरा ध्यान रखना होगा। जब तक सरहद पर तनाव कम नहीं होता और फौजी आमने-सामने की स्थिति से पीछे नहीं हटते, तब तक अन्य क्षेत्रों में सामान्य सहयोग की उम्मीद करना बेमानी होगा। भारत का यह कड़ा संदेश सीधे तौर पर बीजिंग के लिए एक स्पष्ट संकेत है कि कूटनीतिक और आर्थिक बातचीत का दायरा तभी आगे बढ़ सकता है जब सीमाई इलाकों में विश्वास का माहौल फिर से कायम हो।
सीमा की स्थिति तय करेगी रिश्तों का भविष्य
भारत सरकार की नीति अब पूरी तरह से पारदर्शी और जमीन पर मौजूद वास्तविक हालात पर आधारित हो चुकी है। विदेश मंत्री जयशंकर ने बार-बार इस बात को रेखांकित किया है कि कूटनीति के मोर्चे पर संवाद जारी रहना अपनी जगह एक जरूरी प्रक्रिया है, लेकिन सरहद की वास्तविक स्थिति ही इस बात का फैसला करेगी कि दोनों देशों के रिश्ते किस दिशा में आगे बढ़ेंगे। भारत ने यह साफ कर दिया है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह सक्षम और प्रतिबद्ध है। देश की सुरक्षा और संप्रभुता के मामले में किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरती जाएगी और पड़ोसी देश को इस जमीनी हकीकत को स्वीकार करना ही होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार का स्पष्ट और कड़ा रुख भारत की बदलती हुई कूटनीतिक ताकत को दर्शाता है। आज का नया भारत अपनी शर्तों पर दुनिया से बात करता है और अपने रणनीतिक हितों के साथ कोई समझौता नहीं करता। चीन के साथ व्यापारिक रिश्ते अपनी जगह हैं, लेकिन देश की सुरक्षा सर्वोपरि है। जब तक सीमा पर सैनिकों के पीछे हटने और तनाव पूरी तरह खत्म होने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक द्विपक्षीय वार्ताओं में कोई बड़ा breakthrough या बदलाव देखने की उम्मीद कम ही है।
पहले धंधे का हिसाब और आपसी विश्वास जरूरी
विदेश मंत्री ने अपने हालिया बयानों के जरिए कूटनीति के साथ-साथ आर्थिक मामलों पर भी चीन को आईना दिखाया है। उनका यह संदेश बहुत साफ था कि जब तक आपसी विश्वास पूरी तरह डगमगाया हुआ है, तब तक सामान्य व्यावसायिक या आर्थिक साझेदारियों को सहजता से आगे बढ़ाना संभव नहीं है। भारत ने यह साबित कर दिया है कि वह दबाव में आने वाला देश नहीं है। देश की जनता और राजनीतिक हलकों में भी इस कड़े रुख का स्वागत किया जा रहा है, क्योंकि हर नागरिक यही चाहता है कि देश की सीमाएं सुरक्षित रहें और दुश्मन देश को उसकी भाषा में ही जवाब दिया जाए।
आने वाले दिनों में भारत और चीन के बीच होने वाली कूटनीतिक बैठकों पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी रहेंगी। यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि बीजिंग भारत के इस स्पष्ट और दो टूक संदेश पर किस प्रकार की प्रतिक्रिया देता है। क्या वे सीमा पर शांति बहाلی के लिए ठोस कदम उठाएंगे या फिर अपना अड़ियल रवैया जारी रखेंगे? फिलहाल 'द फ्रीलान्स' की पड़ताल यही बताती है कि गेंद पूरी तरह से चीन के पाले में है और भारत अपने रुख से एक इंच भी पीछे हटने को तैयार नहीं है।












