नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए एक बड़े विरोध प्रदर्शन के मामले में नया मोड़ आ गया है। इस प्रदर्शन में शामिल रहे नागरिक अधिकार कार्यकर्ता सौरव दास और आशुतोष रांका की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। दिल्ली पुलिस ने इन दोनों नेताओं के खिलाफ एक ताजा मामला दर्ज किया है। पुलिस का सीधा आरोप है कि जेल या हिरासत से बाहर आने के महज एक दिन बाद ही इन लोगों ने कानूनी रूप से भरे गए पीस बॉन्ड यानी शांति समझौते की शर्तों को तोड़ दिया। इस कार्रवाई के बाद से राजधानी के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में एक बार फिर से हलचल तेज हो गई है।
घटना की शुरुआत तब हुई थी जब जंतर-मंतर पर 'चलो जंतर-मंतर' के नारे के साथ जोरदार प्रदर्शन आयोजित किया गया था। इस प्रदर्शन में भाग लेने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से कार्यकर्ता और नेता दिल्ली पहुंचे थे। स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने कानून व्यवस्था बनाए रखने का हवाला देते हुए इस तरह के आयोजनों पर कड़ी नजर रखी थी। हालात तब और बिगड़ गए जब पुलिस ने सुरक्षा नियमों का हवाला देकर कई प्रमुख कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले लिया। अदालत में पेशी के बाद इन्हें कुछ दिनों के लिए न्यायिक हिरासत में भी भेजा गया था जिससे मामला और गरमा गया।
जंतर-मंतर प्रदर्शन के बाद बढ़ी कानूनी मुश्किलें
जेल की सलाखों से बाहर आने के बाद सौरव दास और आशुतोष रांका से यह उम्मीद की जा रही थी कि वे शांति व्यवस्था बनाए रखेंगे। लेकिन दिल्ली पुलिस के सूत्रों के अनुसार रिहाई के अगले ही दिन इन दोनों ने तय नियमों के खिलाफ जाकर दोबारा सार्वजनिक गतिविधियों में हिस्सा लिया। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जब किसी व्यक्ति को शांति बनाए रखने के मुचलके पर छोड़ा जाता है, तो उसे कुछ खास नियमों का पालन करना होता है। इन नियमों के टूटने पर पुलिस के पास कानूनी कार्रवाई करने का पूरा अधिकार होता है। इसी आधार पर अब नया मुकदमा दर्ज किया गया है और आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
दूसरी तरफ इस पूरे मामले को लेकर नागरिक अधिकार संगठनों और कार्यकर्ताओं में गहरा रोष देखा जा रहा है। इन संगठनों का आरोप है कि प्रशासन शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने के मौलिक अधिकार को दबाने की कोशिश कर रहा है। उनका कहना है कि सरकार और पुलिस विरोध की हर आवाज को कुचलने के लिए कानूनी दांव-पेच का इस्तेमाल कर रहे हैं। कार्यकर्ताओं का यह भी तर्क है कि उन्होंने ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे कानून व्यवस्था को कोई बड़ा खतरा पैदा हो। इसके बावजूद उनके खिलाफ लगातार सख्त कदम उठाए जा रहे हैं जो न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ हैं।
अभिजीत दीपके की चेतावनी और एयरपोर्ट पर सुरक्षा
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक अन्य प्रमुख नाम अभिजीत दीपके का भी सामने आया है। हाल ही में अभिजीत दीपके, सौरव और रांका ने सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से जंतर-मंतर पर फिर से जुटने का खुला ऐलान किया था। इस घोषणा के बाद से ही दिल्ली पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने हवाई अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर अपनी चौकसी बहुत बढ़ा दी थी। अभिजीत दीपके ने यहां तक कह दिया था कि वे खुद आ रहे हैं और पुलिस चाहे तो उन्हें गिरफ्तार कर सकती है। इस खुली चुनौती के बाद से पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया था और संभावित जगहों पर भारी पुलिस बल तैनात किया गया था।
जमीन पर स्थिति अभी भी काफी तनावपूर्ण बनी हुई है और पुलिस किसी भी अनहोनी से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। दिल्ली की सड़कों और प्रमुख चौराहों पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं ताकि किसी भी तरह की अप्रिय घटना को रोका जा सके। यातायात पुलिस ने भी प्रदर्शन के संभावित रूट्स को ध्यान में रखते हुए विशेष एडवाइजरी जारी की थी ताकि आम नागरिकों को परेशानी न हो। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि अदालत इस नए मुकदमे पर क्या रुख अपनाती है और दोनों पक्षों की तरफ से क्या दलीलें दी जाती हैं।
कानूनी कार्रवाई और आगे की रणनीति
प्रशासन की इस सख्त कार्रवाई ने एक बार फिर से देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विरोध प्रदर्शन के अधिकारों पर बहस छेड़ दी है। एक तरफ जहां पुलिस अपनी कार्रवाई को कानून व्यवस्था की रक्षा का हवाला देकर सही ठहरा रही है, वहीं दूसरी तरफ मानवाधिकार समर्थक इसे तानाशाही रवैया बता रहे हैं। इस मामले की गूंज अब अदालतों तक पहुंच चुकी है जहां वकीलों की टीमें अपने मुवक्किलों की रिहाई और जमानत के लिए नए सिरे से कानूनी लड़ाई की तैयारी कर रही हैं। हमारी टीम इस पूरे मामले पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है और जैसे ही कोई नया अपडेट आएगा, हम सबसे पहले आप तक पहुंचाएंगे।








