नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — अमेरिका से एक बहुत बड़ी और चिंताजनक खबर सामने आ रही है। अमेरिकी प्रशासन ने टाटा और इंफोसिस जैसी देश की दिग्गज आईटी कंपनियों पर बड़ा शिकंजा कसा है। अमेरिका ने इन कंपनियों को ग्रीन कार्ड से जुड़े खास परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम से सस्पेंड कर दिया है। इस कार्रवाई की जद में कुल आठ बड़ी भारतीय और अमेरिकी आईटी कंपनियां आई हैं। इस फैसले के बाद अमेरिका में नौकरी कर रहे लाखों भारतीय इंजीनियरों और उनके परिवारों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं।
यह पूरा मामला अमेरिकी श्रम विभाग और आव्रजन सेवा से जुड़ा हुआ है। नियमों के कथित उल्लंघन और स्थानीय कर्मचारियों की अनदेखी के आरोपों के बाद यह सख्त कदम उठाया गया है। जिन कंपनियों पर यह गाज गिरी है, उनमें टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज और इंफोसिस के अलावा एचसीएल जैसी नामचीन कंपनियां भी शामिल हैं। जानकारों का मानना है कि इस निलंबन से इन कंपनियों के कामकाज पर सीधा असर पड़ेगा। साथ ही, अमेरिका में पक्की नागरिकता या परमानेंट रेजिडेंसी यानी ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे लोगों का सपना फिलहाल अधूरा रह सकता है。
ग्रीन कार्ड निलंबन से आईटी कंपनियों पर क्या होगा असर?
अमेरिकी सरकार के इस अचानक उठाए गए कदम से भारतीय आईटी कंपनियों की रणनीति पूरी तरह गड़बड़ा गई है। ये कंपनियां अपने दफ्तरों में काम करने वाले विदेशी कर्मचारियों को अमेरिका भेजने के लिए इस लेबर सर्टिफिकेशन का इस्तेमाल करती थीं। अब इस प्रोग्राम के सस्पेंड होने से नई फाइलिंग रुक गई है। इसका मतलब है कि नई नियुक्तियों और कर्मचारियों के वीजा रिन्यूवल पर भारी ब्रेक लग गया है। कंपनियों के शेयरों पर भी इस खबर का नकारात्मक असर देखने को मिल सकता है क्योंकि निवेशक इस अनिश्चितता से घबराए हुए हैं।
इस पूरे मामले पर कंपनियों के आधिकारिक बयानों का इंतजार किया जा रहा है। हालांकि, शुरुआती खबरों के मुताबिक, अमेरिकी एजेंसियों का कहना है कि यह जांच प्रक्रिया का हिस्सा है। पिछले कुछ समय से अमेरिका में स्थानीय नागरिकों को नौकरी देने की मांग लगातार तेज हो रही थी। इसी राजनीतिक और सामाजिक दबाव के चलते भारतीय कंपनियों को निशाना बनाया गया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह मामला जल्द नहीं सुलझा, तो आईटी सेक्टर को अरबों डॉलर का नुकसान उठाना पड़ सकता है।
यूएससीआईएस की नई ऑनलाइन प्रक्रिया और कोर्ट में मामला
एक तरफ जहां ग्रीन कार्ड प्रोग्राम सस्पेंड हुआ है, वहीं अमेरिकी आव्रजन विभाग यानी यूएससीआईएस ने कामकाज के तरीके में कुछ बदलाव किए हैं। स्टूडेंट-वर्कर्स और ग्रीन कार्ड के नए आवेदकों के लिए फाइलिंग का प्रोसेस अब पूरी तरह ऑनलाइन कर दिया गया है। सरकार का दावा है कि इससे कागजी कार्रवाई कम होगी और पारदर्शिता बढ़ेगी। लेकिन दूसरी तरफ, इन फैसलों के खिलाफ अब कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया जा चुका है। आव्रजन नियमों को लेकर अमेरिकी अदालतों में कई याचिकाएं दायर की गई हैं, जिससे स्थिति और ज्यादा उलझ गई है।
आम भारतीयों के लिए अमेरिका में वीजा और ग्रीन कार्ड पाना हमेशा से एक टेढ़ी खीर रहा है। हाल ही में एक दिल दहला देने वाला मामला भी सामने आया था, जिसमें बेटी के पास ग्रीन कार्ड होने के बावजूद उसकी बुजुर्ग मां को एयरपोर्ट से ही वापस लौटा दिया गया। आव्रजन अधिकारियों ने बिना किसी ठोस कारण के मां को सिर्फ पांच मिनट में वापस भेज दिया। इन घटनाओं से यह साफ जाहिर होता है कि अमेरिका में आव्रजन नीति कितनी सख्त और मनमानी से भरी हो गई है।
भारतीय पेशेवरों और उनके परिवारों के सामने नया संकट
अमेरिका में रह रहे भारतीय नागरिक अब खुद को बेहद असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। ग्रीन कार्ड मिलने में पहले से ही दशकों का लंबा इंतजार करना पड़ता था। अब इस तरह के निलंबन और कानूनी दांव-पेंच से यह इंतजार और ज्यादा लंबा हो गया है। कई लोग ऐसे हैं जो सालों से अमेरिका में टैक्स भर रहे हैं, लेकिन उनके हाथ अभी भी परमानेंट रेजिडेंसी नहीं लगी है। बच्चों की पढ़ाई और भविष्य को लेकर माता-पिता खासे परेशान हैं कि उन्हें बीच में ही देश न छोड़ना पड़े।
द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड पड़ताल से यह साफ है कि आने वाले दिन भारतीय आईटी सेक्टर और वहां काम करने वाले प्रवासियों के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं। न सिर्फ कंपनियों को अपनी कानूनी लड़ाई लड़नी होगी, बल्कि कर्मचारियों को भी मानसिक तनाव से जूझना पड़ेगा। भारत सरकार और उद्योग संगठनों को इस मामले में कूटनीतिक स्तर पर दखल देना चाहिए ताकि हजारों भारतीयों का भविष्य सुरक्षित हो सके।







