आज के दौर में बच्चों की दुनिया सिर्फ खेलकूद और पढ़ाई तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि उनकी मानसिक सेहत पर भी एक बड़ा संकट मंडरा रहा है। हाल ही में सामने आए एक सर्वे ने माता-पिता और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है। इस सर्वे के अनुसार, बच्चों में डिप्रेशन, एंग्जायटी और न्यूरो डेवलपमेंटल डिसऑर्डर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, जिन्हें अक्सर परिवार वाले बच्चों का साधारण अकेलापन या जिद समझकर नजरअंदाज कर देते हैं।
बेंगलुरु के NIMHANS और स्थानीय संस्थानों का संयुक्त सर्वे
बेंगलुरु के प्रतिष्ठित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज (NIMHANS) ने उत्तराखंड स्टेट मेंटल हेल्थ अथॉरिटी और गवर्नमेंट दून मेडिकल कॉलेज के सहयोग से एक व्यापक सर्वे किया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में 0 से 17 साल की उम्र के करीब 35,746 बच्चों में ऑटिज्म, अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (ADHD), एंग्जायटी या डिप्रेशन जैसी समस्याएं होने का अनुमान लगाया गया है। हालांकि यह संख्या सर्वे और आबादी के अनुमानों पर आधारित है, लेकिन यह बच्चों की बदलती मानसिक स्थिति की एक डरावनी तस्वीर पेश करती है।
सर्वे में यह भी पाया गया कि लगभग 14,790 बच्चों और किशोरों में न्यूरो डेवलपमेंट से संबंधित समस्याएं हैं, जबकि 5,067 बच्चों में एंग्जायटी या डिप्रेशन, 2,445 में ऑटिज्म और 1,075 बच्चों में ADHD होने की आशंका जताई गई है।
जागरूकता की कमी और माता-पिता की अनदेखी
इस पूरी रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अधिकांश माता-पिता को बच्चों की इन मानसिक बीमारियों के बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं है। सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, डिप्रेशन के बारे में तो लगभग 78.16 फीसदी लोगों ने सुना था, लेकिन सही न्यूरो डेवलपमेंट न होने के बारे में केवल 12.15 फीसदी और ADHD के बारे में सिर्फ 5.40 फीसदी लोग ही जानते थे। जानकारी के अभाव में बच्चे समय पर डॉक्टर के पास नहीं पहुंच पाते, जिससे उनकी स्थिति और गंभीर हो जाती है।
बच्चों के व्यवहार में इन बदलावों को न करें नजरअंदाज
मनोरोग विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आपका बच्चा लगातार डरा हुआ रहता है, अत्यधिक उदास रहता है, पढ़ाई में मन नहीं लगा पा रहा है या उसे किसी चीज पर ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई हो रही है, तो इसे केवल उसका स्वभाव न समझें। यह किसी अंदरूनी मानसिक स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकता है। समय रहते बच्चों के व्यवहार में आ रहे इन बदलावों को पहचानना और किसी विशेषज्ञ से परामर्श लेना बेहद जरूरी है।
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