'द फ्रीलांस' की ऑन-द-ग्राउंड पड़ताल में यह चौंकाने वाला सच सामने आया है कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मोबाइल स्क्रीन हमारा सबसे बड़ा वक्त और ध्यान चुरा रही है। ग्लोबल डिजिटल रिसर्च प्लेटफॉर्म 'डेटा रेपोर्टल' की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में सोशल मीडिया यूजर्स की संख्या बढ़कर 5.66 अरब हो चुकी है। एक एक्टिव यूजर हफ्ते में औसतन 18 घंटे 36 मिनट यानी रोजाना लगभग 2 घंटे 39 मिनट वर्चुअल दुनिया में गुजार रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि हम अपने साल के पूरे 40 दिन सिर्फ रील्स और स्क्रॉलिंग में झोंक रहे हैं। जब आप किसी जरूरी काम के लिए फोन उठाते हैं और सिर्फ 'पांच मिनट' के लिए इंस्टाग्राम खोलते हैं, तो वह आधा या एक घंटा कब बीत जाता है, आपको इसका अहसास भी नहीं होता। यह साधारण आदत नहीं, बल्कि एक गंभीर 'रील्स एडिक्शन' का रूप ले चुकी है।
दिमाग की कैमिकल लोच और एडिक्शन का खतरनाक जाल
इस विषय पर विस्तार से बात करते हुए कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल, मुंबई के कंसलटेंट साइकेट्रिस्ट डॉ. शौनक अजिंक्य बताते हैं, "जब कोई व्यक्ति लगातार रील्स देखता है, तो उसका ब्रेन तेजी से बदलते कंटेंट और छोटे वीडियो का आदी हो जाता है। इससे व्यक्ति के भीतर डोपामाइन का सीक्रेशन होता है, जो उसे बार-बार फोन उठाने के लिए मजबूर करता है। रील्स की लत तब गंभीर मानी जाती है जब इनके बिना बेचैनी या चिड़चिड़ापन होने लगे और जरूरी काम छोड़कर व्यक्ति स्क्रीन को प्राथमिकता देने लगे।"
- फोकस और एकाग्रता पर प्रहार: लगातार छोटे वीडियो देखने से दिमाग की गहराई से सोचने की क्षमता कम होती है। पढ़ाई, दफ्तर के काम या आम बातचीत के दौरान भी बार-बार फोन देखने की इच्छा पैदा होती है।
- शारीरिक और मानसिक नुकसान: गर्दन और कंधे में लगातार दर्द रहना, आंखों की रोशनी कमजोर होना, मूड स्विंग्स, एंग्जाइटी और स्लीप क्वालिटी का खराब होना इसके आम दुष्परिणाम हैं।
- बच्चों और किशोरों पर बड़ा खतरा: चूंकि किशोरों का मस्तिष्क अभी विकसित हो रहा होता है, इसलिए यह लत उनके व्यवहार, शैक्षणिक प्रदर्शन और मानसिक संतुलन को बुरी तरह प्रभावित करती है। देर रात तक रील्स देखने से मेलाटोनिन हार्मोन प्रभावित होता है, जिससे नींद उड़ जाती है और अगला दिन थकान से भरा होता है।
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इस डिजिटल लत से कैसे पाएं मुक्ति?
डॉ. शौनक अजिंक्य सलाह देते हैं कि इस लत को रातों-रात नहीं छोड़ा जा सकता, बल्कि इसके लिए एक अनुशासित शुरुआत की जरूरत है। सबसे पहले अपने फोन के स्क्रीन टाइम की मॉनिटरिंग करें और धीरे-धीरे इस अवधि को घटाएं। सोते समय फोन को अपने बिस्तर से दूर रखें, सोशल मीडिया ऐप के नोटिफिकेशन बंद कर दें और अपना ध्यान ऑफलाइन गतिविधियों, जैसे किताबें पढ़ने, खेलकूद या परिवार के साथ वक्त बिताने में लगाएं। 'द फ्रीलांस' की यह पड़ताल साफ संदेश देती है कि तकनीक हमारी सुविधा के लिए है, न कि हमें उसका गुलाम बनाने के लिए। अपने समय और मानसिक शांति का नियंत्रण वापस अपने हाथों में लें।







