अखिलेश यादव का बड़ा बयान: शिक्षा के मोर्चे पर सरकार पूरी तरह विफल
देश की सियासत में इन दिनों शिक्षा व्यवस्था और रोजगार के मुद्दों पर बहस लगातार तेज होती जा रही है। इसी कड़ी में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मौजूदा भारतीय जनता पार्टी सरकार पर करारा प्रहार किया है। उनका साफ तौर पर कहना है कि देश और राज्यों में चलाई जा रही शैक्षिक नीतियां केवल दिखावा बनकर रह गई हैं। जमीनी हकीकत यह है कि आज का युवा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित होता जा रहा है और इसकी सबसे बड़ी वजह हुक्मरानों की पुरानी, दबी-कुचली और रूढ़िवादी सोच है।
राजनीतिक गलियारों में इस बयान के आने के बाद से ही सुगबुगाहट तेज हो गई है। विपक्षी दल लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि वर्तमान शासन व्यवस्था जानबूझकर शिक्षा को कमजोर कर रही है ताकि जनता सवाल पूछने की स्थिति में न रहे। अखिलेश यादव ने अपने तल्ख तेवर दिखाते हुए कहा कि जब तक समाज के हर वर्ग तक बेहतर और आधुनिक शिक्षा की पहुंच नहीं होगी, तब तक देश प्रगति के रास्ते पर आगे नहीं बढ़ सकता। केवल बड़े-बड़े दावे करने से धरातल पर बदलाव नहीं आते, बल्कि इसके लिए मजबूत इच्छाशक्ति की जरूरत होती है जो मौजूदा सरकार में नदारद दिखती है।
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रूढ़िवादी सोच से देश की युवा शक्ति हो रही है कमजोर
अपने बयानों के जरिए हमेशा मुखर रहने वाले अखिलेश यादव ने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षा किसी भी राष्ट्र की रीढ़ होती है। यदि रीढ़ ही कमजोर कर दी जाए तो पूरा ढांचा भरभरा कर गिर जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी सरकार की नीतियां आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विपरीत चल रही हैं। आज के दौर में जब दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, तकनीक और नए अनुसंधान के बल पर आगे बढ़ रही है, तब हमारे यहां युवाओं को पुरानी और संकीर्ण मान्यताओं में उलझाकर रखा जा रहा है।
सपा अध्यक्ष ने आगे कहा कि शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता को खत्म किया जा रहा है और वहां वैचारिक एजेंडे थोपे जा रहे हैं। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में स्वतंत्र चिंतन की जगह डर और दबाव का माहौल पैदा किया जा रहा है, जिससे मेधावी छात्र और शिक्षक घुटन महसूस कर रहे हैं। ऐसा माहौल किसी भी लोकतांत्रिक और प्रगतिशील देश के लिए बेहद खतरनाक संकेत है। शिक्षा के मंदिरों में जब राजनीति और संकीर्ण सोच हावी होने लगेगी, तो वहां से योग्य नागरिक कैसे निकलेंगे?
स्कूलों और विश्वविद्यालयों की बदहाली पर उठाए गंभीर सवाल
सरकारी स्कूलों और विश्वविद्यालयों की खस्ताहाल हालत का जिक्र करते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि आज ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी क्षेत्रों तक के राजकीय शिक्षण संस्थान बदहाली के आंसू रो रहे हैं। न तो वहां पर्याप्त शिक्षक हैं और न ही प्रयोगशालाओं में बुनियादी सुविधाएं बची हैं। गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चे इन स्कूलों में पढ़ने को मजबूर हैं, लेकिन सरकार का पूरा ध्यान निजीकरण को बढ़ावा देने पर है ताकि शिक्षा को एक महंगा व्यापार बनाया जा सके।
"आज की सरकार की नीतियां स्पष्ट रूप से यह दर्शाती हैं कि वे आम जनता के बच्चों को उच्च शिक्षा से दूर रखना चाहती हैं। जब तक देश में शिक्षा का अधिकार सही मायनों में लागू नहीं होगा, तब तक बराबरी का समाज नहीं बन सकता।" — अखिलेश यादव, राष्ट्रीय अध्यक्ष, समाजवादी पार्टी
उन्होंने यह भी जोड़ा कि स्मार्ट क्लासेज और डिजिटल इंडिया के नाम पर सिर्फ आंकड़ेबाजी की जा रही है, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि कई स्कूलों में पीने के पानी और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं तक मयस्सर नहीं हैं। ऐसे में डिजिटल क्रांति के दावे पूरी तरह खोखले साबित होते हैं।
रोजगार और पढ़ाई का गहरा संकट: युवाओं का भविष्य अंधकार में
शिक्षा और रोजगार का चोली-साथ का दामन होता है, लेकिन वर्तमान में डिग्रियां मिलने के बावजूद युवाओं को दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होना, भर्तियों का सालों-साल लटका रहना और परिणाम में धांधली होना अब आम बात बन चुकी है। अखिलेश यादव ने इस व्यवस्था पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार युवाओं की ऊर्जा को सही दिशा देने में पूरी तरह असफल रही है।
उन्होंने कहा कि जब शिक्षा प्रणाली ही दोषपूर्ण होगी और उसमें रूढ़िवादी व राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ेगा, तो निकलने वाले छात्रों के पास कौशल की कमी होगी। आज कंपनियां ऐसे युवाओं को तलाशती हैं जिनके पास व्यावहारिक ज्ञान हो, लेकिन हमारी यूनिवर्सिटीज और कॉलेज उन्हें सिर्फ कागजी डिग्रियां थमा रहे हैं। इस खाई को पाटने के लिए सरकार को अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव करना होगा और शिक्षा बजट में भारी इजाफा करना पड़ेगा।
विपक्ष का आक्रामक रुख और आगे की सियासी जंग
अखिलेश यादव के इस तीखे हमले के बाद आगामी दिनों में राजनीतिक पारा और अधिक चढ़ने के आसार हैं। उत्तर प्रदेश समेत देश के कई राज्यों में विपक्षी दल इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाने की तैयारी कर रहे हैं। युवाओं और छात्रों के बीच जाकर सरकार की नीतियों का कच्चा-चिट्ठा खोलने की रणनीति बनाई जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले चुनावों में शिक्षा, बेरोजगारी और महंगाई जैसे बुनियादी मुद्दे सबसे अहम भूमिका निभाएंगे।
कुल मिलाकर, अखिलेश यादव के इन तेवरों ने एक बार फिर सत्ता पक्ष को कटघरे में खड़ा कर दिया है। अब देखना यह होगा कि सरकार इन गंभीर आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया देती है और क्या देश की लचर होती शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाता है या फिर यह बहस सिर्फ जुबानी जंग बनकर रह जाती है। जनता और खासकर युवाओं की निगाहें अब पूरी तरह से इस बात पर टिकी हैं कि उनके भविष्य को सुरक्षित करने के लिए राजनेता क्या नीति अपनाते हैं।




