सपा के मंच से नीतू मैम का तीखा प्रहार
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों शिक्षा और रोजगार के मुद्दों को लेकर सरगर्मी तेज हो गई है। हाल ही में समाजवादी पार्टी के एक प्रमुख कार्यक्रम के दौरान मशहूर शिक्षिका नीतू मैम ने सूबे की मौजूदा शैक्षणिक और कामकाजी हालत पर बेहद तीखे शब्दों में तंज कसा। उन्होंने मंच से सीधे तौर पर यह सवाल उठाया कि आज के दौर में युवाओं की राह किस दिशा में जा रही है। उनके इस बयान ने राजनीतिक गलियारों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी खासी चर्चा छेड़ दी है।
कार्यक्रम में मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए नीतू मैम ने कहा कि उन्होंने साल 2013 के आसपास समाजवादी पार्टी की सरकार के कार्यकाल में छात्रों को लैपटॉप वितरित होते देखा था। उस वक्त सरकार का विजन कुछ और था, लेकिन आज का परिदृश्य बिल्कुल बदल चुका है। उन्होंने वर्तमान हालात पर चिंता जताते हुए कहा कि आज की पीढ़ी को सही दिशा दिखाने के बजाय स्थितियां उन्हें भटकाने वाली बन चुकी हैं।
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'पर्ची वाले बाबा' और पाखंड के चक्रव्यूह में फंसता युवा
अपने संबोधन के दौरान नीतू मैम ने आज के दौर के अंधविश्वास और पाखंड पर करारा प्रहार किया। उन्होंने बेहद कड़े शब्दों में कहा कि आज समाज में चमत्कार और पाखंड का बोलबाला इस कदर बढ़ गया है कि अब 'पर्ची वाले बाबा' युवाओं का भविष्य तय करते नजर आ रहे हैं। इस स्थिति के कारण देश और प्रदेश का युवा पूरी तरह से भ्रमित और निराश हो चुका है।
उन्होंने पिछले एक दशक के हालातों का जिक्र करते हुए कहा कि उनके दो दशकों के लंबे शिक्षण अनुभव में उन्होंने कभी ऐसा दौर नहीं देखा, जहां छात्रों का जोश और शारीरिक स्टैमिना इस हद तक निराशा में बदल गया हो। युवा वर्ग रोजगार की तलाश में भटक रहा है, लेकिन उसे ठोस उम्मीद के बजाय केवल वादे और दिखावा मिल रहा है, जो उनके भविष्य के साथ एक बड़ा खिलवाड़ है।
यूपीटेट और यूपीएसआई परीक्षाओं पर गंभीर सवाल
शिक्षिका नीतू मैम ने केवल जुबानी जमाखर्च करने के बजाय सरकारी परीक्षाओं की कार्यप्रणाली की पोल भी खोली। उन्होंने उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा (यूपीटेट) और उत्तर प्रदेश सब-इंस्पेक्टर (यूपीएसआई) भर्ती का विशेष रूप से जिक्र किया। उन्होंने बताया कि किस तरह छोटी-छोटी तकनीकी खामियों और नियमों के फेर में हजारों की संख्या में योग्य छात्र परीक्षा प्रक्रिया से बाहर हो जाते हैं।
नीतू मैम ने कहा, "करीब 4 हजार बच्चे सीधे आउट हुए, ओएमआर और नॉर्मलाइजेशन के कारण लगभग 1 लाख बच्चे प्रभावित हुए। यह सिर्फ क्वालिफाइंग परीक्षा है, फिर भी नॉर्मलाइजेशन लगा दिया गया। यूपीएसआई परीक्षा फिर कोर्ट में फंस गई है। साल दर साल यही सिलसिला चल रहा है।" उनके अनुसार, इन खामियों का खामियाजा सीधे तौर पर मेहनतकश और गरीब परिवारों के उन युवाओं को भुगतना पड़ता है जो सालों-साल कड़ी मेहनत करते हैं।
भर्ती बोर्ड और आयोगों की कार्यप्रणाली पर फूटा गुस्सा
भर्ती बोर्डों और चयन आयोगों के काम करने के तरीके को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने कहा कि परीक्षाओं की आंसर की यानी उत्तर कुंजियों में विरोधाभास होना आम बात हो गई है। आयोगों द्वारा जारी होने वाले नोटिसों में लगातार गलतियां पाई जाती हैं, जिन्हें बाद में मात्र 'मानवीय भूल' कहकर टाल दिया जाता है। इसके विपरीत, यदि किसी छात्र से फॉर्म भरते समय या परीक्षा के दौरान कोई छोटी सी चूक हो जाए, तो उसे इतनी कड़ी सजा भुगतनी पड़ती है कि उसका पूरा भविष्य अंधकारमय हो जाता है।
यह दोहरा रवैया आयोगों की नीयत पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। उन्होंने साफ कहा कि जब तक चयन प्रक्रिया पारदर्शी और त्रुटिहीन नहीं होगी, तब तक युवाओं का सिस्टम से भरोसा पूरी तरह उठता रहेगा।
युवाओं से अपील: हक के लिए खुद मैदान में उतरना होगा
कार्यक्रम के अंत में नीतू मैम ने सिर्फ सरकारों और आयोगों की कमियां गिनाने के बजाय युवाओं को खुद एकजुट होने का संदेश दिया। उन्होंने अपील की कि छात्र केवल ऑनलाइन माध्यमों पर अपनी आवाज उठाने तक सीमित न रहें, बल्कि अपनी फिजिकल मौजूदगी को भी बढ़ाएं। घर की चारदीवारी में बैठकर निराशा पालने से कुछ हासिल नहीं होने वाला है, बल्कि अपने रोजगार के संवैधानिक अधिकार के लिए खुद सड़कों पर उतरकर लड़ना होगा।
"पहले पेट पूजा, फिर काम दूजा। जब तक पेट नहीं भरेगा, देश के भले के लिए कैसे काम करेंगे? रोजगार आपका अधिकार है, उसके लिए लड़ना पड़ेगा।" — नीतू मैम, शिक्षिका
उन्होंने इस दौरान सपा प्रमुख अखिलेश यादव का आभार भी जताया कि उन्होंने इस मंच के माध्यम से शिक्षा और रोजगार जैसे गंभीर मुद्दों पर चर्चा करने का अवसर दिया। कार्यक्रम में मौजूद अन्य शिक्षकों ने भी इस बात पर जोर दिया कि यदि देश के युवाओं को बचाना है, तो सबसे पहले शिक्षा और रोजगार की नीतियों में आमूल-चूल सुधार करना अनिवार्य होगा।




