बाकू/द फ्रीलान्स ब्यूरो — यूरोप और एशिया के चौराहे पर बसे मुस्लिम बहुल देश अजरबैजान से एक बड़ी और संवेदनशील खबर सामने आ रही है। यहां के सरकारी स्कूलों में हिजाब पहनने को लेकर चल रहा विवाद अब सड़कों पर आ गया है। पिछले कुछ दिनों से स्कूली छात्रों को स्कूल के मुख्य गेट से ही वापस लौटाया जा रहा है, क्योंकि प्रशासनिक नियमों के तहत कक्षाओं के अंदर धार्मिक पोशाक पहनने की अनुमति नहीं दी जा रही है। इस अचानक हुई सख्ती के बाद छात्रों और उनके अभिभावकों में भारी रोष देखा जा रहा है। देश के कई हिस्सों में इस फैसले के खिलाफ लोगों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं, जिससे प्रशासन की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स और जमीनी पड़ताल से यह बात सामने आई है कि अजरबैजान सरकार लंबे समय से सरकारी संस्थानों और शैक्षणिक परिसरों में धर्मनिरपेक्षता के नियमों का सख्ती से पालन कराती आ रही है। हालांकि, हालिया शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही स्कूलों में यूनिफॉर्म के नियमों को और अधिक कड़ा कर दिया गया है। इसी कड़ाई के तहत जब छात्राओं को हिजाब पहनकर स्कूल में प्रवेश करने से रोका गया, तो मामला बिगड़ गया। कई जगहों पर स्कूल प्रशासनों और छात्रों के परिजनों के बीच तीखी नोकझोंक भी देखने को मिली है, जिसके वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं।
अजरबैजान के स्कूलों में अचानक क्यों तेज हुआ हिजाब विवाद?
अजरबैजान एक ऐसा देश है जहां की आबादी का बड़ा हिस्सा मुस्लिम है, लेकिन देश का संविधान और शासन प्रणाली पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष ढांचे पर आधारित है। सोवियत संघ के विघटन के बाद से ही यहां सार्वजनिक जीवन में धार्मिक प्रतीकों के प्रदर्शन को लेकर बेहद सख्त और स्पष्ट कानून रहे हैं। स्कूली शिक्षा प्रणाली में यूनिफॉर्म का एक समान नियम लागू है, जिसके तहत किसी भी तरह के धार्मिक वस्त्र या प्रतीक को पहनने की अनुमति नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में इन नियमों में थोड़ी ढील जैसी स्थिति दिखती थी, लेकिन इस बार स्थानीय प्रशासन ने जिला स्तर पर औचक निरीक्षण बढ़ाकर नियमों का पालन कराने में पूरी सख्ती दिखाई है, जिसकी वजह से यह चिंगारी फिर से भड़क उठी है।
स्कूलों के बाहर जमा हुए अभिभावकों का कहना है कि शिक्षा हासिल करना हर बच्चे का मौलिक अधिकार है और पोशाक के नाम पर उनके बच्चों को कक्षाओं से बाहर रखना सरासर अन्याय है। प्रदर्शनकारियों का यह भी तर्क है कि यह फैसला उनकी धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर सीधा हमला है। दूसरी ओर, स्कूल प्रशासन और शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों का पक्ष है कि वे केवल राष्ट्रीय शिक्षा नीति और देश के संविधान में तय किए गए नियमों का पालन कर रहे हैं। अधिकारियों का साफ कहना है कि शैक्षणिक संस्थानों में समानता और अनुशासन बनाए रखने के लिए सभी छात्रों को तय ड्रेस कोड का ही पालन करना होगा, जिसमें किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत छूट संभव नहीं है।
सड़कों पर उतरी जनता और पुलिस प्रशासन की कड़ी चौकसी
जैसे-जैसे स्कूलों के गेट से छात्रों को लौटाए जाने की तस्वीरें सामने आईं, राजधानी बाकू और आसपास के प्रमुख शहरों में तनाव का माहौल बन गया है। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए स्थानीय पुलिस बल को भी स्कूलों के बाहर तैनात करना पड़ा है। कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हल्की झड़पें भी हुईं, हालांकि सुरक्षा बलों ने स्थिति को बिगड़ने से रोकने के लिए संयम से काम लिया है। मानवाधिकार संगठनों ने इस पूरे घटनाक्रम पर गहरी चिंता जताई है और सरकार से अपील की है कि इस संवेदनशील मुद्दे को बलपूर्वक सुलझाने के बजाय बातचीत और संवाद का रास्ता अपनाया जाए ताकि बच्चों की पढ़ाई का नुकसान न हो।
इस अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम के बीच यह भी गौर करने वाली बात है कि हाल ही में यूरोप के अन्य देशों जैसे स्पेन और पुर्तगाल में भी सार्वजनिक स्थलों और शिक्षण संस्थानों में बुर्के या चेहरे को ढकने वाले वस्त्रों पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी तेज हो गई है। वैश्विक स्तर पर धर्मनिरपेक्षता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच चल रही इस बहस का असर अब अजरबैजान की स्कूली शिक्षा व्यवस्था पर साफ तौर पर दिखाई दे रहा है। 'द फ्रीलान्स' की टीम इस पूरे मामले पर पैनी नजर बनाए हुए है और जैसे ही स्थानीय प्रशासन या सरकार की तरफ से कोई नया आधिकारिक बयान जारी होता है, हम अपने पाठकों तक सबसे पहले सटीक अपडेट पहुंचाएंगे।
भविष्य की सुगबुगाहट और ग्राउंड पर हालात का पूरा जायजा
फिलहाल अजरबैजान के कई स्कूलों में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। कई अभिभावकों ने अपने बच्चों को फिलहाल स्कूल भेजना बंद कर दिया है, तो कुछ छात्र प्रशासन से गुहार लगा रहे हैं कि उन्हें परीक्षा के दिनों में कम से कम छूट दी जाए। विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार ने इस मुद्दे पर समय रहते कोई बीच का रास्ता नहीं निकाला, तो यह आंदोलन देश के अन्य हिस्सों में भी फैल सकता है। 'द फ्रीलान्स' के फील्ड रिपोर्टर लगातार स्थिति पर नजर रखे हुए हैं और यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि हमारे पाठकों तक बिना किसी सनसनी के पूरी और सच्ची खबर पहुंचे।








