शिक्षा के मंदिर में शुचिता और उच्च मूल्यों की बड़ी पहल
आज के दौर में जहां उच्च शिक्षा संस्थानों में व्यावसायिकता और डिग्रियां बांटने की होड़ सी मची है, वहीं कुछ ऐसे संस्थान भी हैं जो अपनी नैतिक प्रतिबद्धता और गुणवत्ता के लिए कड़े कदम उठाने से पीछे नहीं हटते। झारखंड के बाबू दिनेश सिंह विश्वविद्यालय में आयोजित प्रथम दीक्षांत समारोह के दौरान कुछ ऐसा ही कड़ा और स्पष्ट संदेश देखने को मिला। संस्थान के कुलाधिपति दिनेश प्रसाद सिंह ने अपने संबोधन में शिक्षा जगत के उन तमाम पहलुओं पर खुलकर बात की, जो आज के समय में देश के हर छात्र और अभिभावक के लिए बेहद जरूरी हैं।
दीक्षांत समारोह का यह अवसर केवल डिग्रियां बांटने का नहीं, बल्कि आने वाले कल के भारत की रूपरेखा तय करने का मंच बना। कुलाधिपति ने अपने तीखे और स्पष्ट तेवरों से यह साफ कर दिया कि इस संस्थान में किसी भी प्रकार की कोताही या फर्जीवाड़ा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उनके इस बयान ने एक तरफ जहां शिक्षा माफियाओं और लापरवाह संस्थानों को कड़ी चेतावनी दी है, वहीं दूसरी तरफ छात्रों और अभिभावकों के मन में एक गहरा भरोसा भी पैदा किया है कि यहां मिलने वाली शिक्षा पूरी तरह प्रामाणिक और मूल्यपरक है।
संबंधित खबरें
डिग्री नहीं, ज्ञान और संस्कार हैं असली पूंजी
किसी भी शिक्षण संस्थान की असली पहचान वहां से निकलने वाले छात्रों के चरित्र और उनकी कार्यकुशलता से होती है। कुलाधिपति दिनेश प्रसाद सिंह ने दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए इस बात पर विशेष जोर दिया कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल कागजी डिग्रियां देना नहीं है। उन्होंने कहा कि उनका सपना एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जहां युवा केवल किताबी कीड़े न बनकर ज्ञान, संस्कार, अनुशासन, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी से परिपूर्ण नागरिक बनें।
उन्होंने बहुत ही दो टूक शब्दों में कहा कि अगर कभी ऐसी नौबत आई कि संस्थान की गुणवत्ता से समझौता करना पड़े, तो वे विश्वविद्यालय को बंद करना पसंद करेंगे, लेकिन फर्जी डिग्रियां कभी नहीं बांटेंगे। यह बयान आज के समय में शिक्षा जगत में एक नैतिक मिसाल पेश करता है। आज जब कई जगहों पर शिक्षा के नाम पर केवल औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं, तब इस तरह का संकल्प यह साबित करता है कि उच्च शिक्षा में अभी भी ऐसे लोग मौजूद हैं जो शुचिता और गुणवत्ता को सर्वोपरि मानते हैं।
नौकरी तलाशने वाले नहीं, रोजगार देने वाले बनें युवा
देश के युवाओं के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती रोजगार की है। सरकारी नौकरियों के सीमित अवसरों और प्राइवेट सेक्टर की बदलती जरूरतों के बीच यह बहुत जरूरी हो गया है कि युवा केवल जॉब सीकर (नौकरी चाहने वाले) न बनकर जॉब क्रिएटर (रोजगार सृजक) बनें। कुलाधिपति ने इसी विजन को आगे बढ़ाते हुए छात्रों को प्रेरित किया कि वे अपने कौशल और ज्ञान का उपयोग इस तरह करें कि वे दूसरों को भी रोजगार दे सकें।
उन्होंने कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होता है जब छात्र अपनी विद्या का उपयोग समाज और मानवता के कल्याण के लिए करते हैं। किताबी ज्ञान से परे व्यावहारिक और तकनीकी ज्ञान ही आज के युग की सबसे बड़ी मांग है। विश्वविद्यालय की ओर से छात्रों को इसी दिशा में तैयार किया जा रहा है ताकि वे बदलती दुनिया की चुनौतियों का सामना डटकर कर सकें और आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने में अपना योगदान दे सकें।
ग्रामीण और कमजोर वर्ग के छात्रों के लिए वरदान बना कैंपस
झारखंड जैसे राज्यों में जहां एक बड़ा तबका आज भी उच्च शिक्षा की पहुंच से दूर है, वहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती रहा है। बाबू दिनेश सिंह विश्वविद्यालय इस दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो रहा है। लगभग 100 एकड़ में फैला यह हरा-भरा कैंपस ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा के दरवाजे खोल रहा है। यहां बिना किसी भेदभाव के हर वर्ग के छात्र को आधुनिक और उच्च कोटि की शिक्षा मिल रही है।
इस कैंपस में चिकित्सा, नर्सिंग, शिक्षा, विज्ञान, कृषि, फार्मेसी, इंजीनियरिंग, सूचना प्रौद्योगिकी, प्रबंधन और कानून जैसे विभिन्न महत्वपूर्ण क्षेत्रों में पढ़ाई कराई जा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य यही है कि राज्य के दूर-दराज के गांवों से आने वाले छात्र भी महानगरों के छात्रों के साथ कंधे से कंधا मिलाकर चल सकें। शिक्षा का यह लोकतंत्रीकरण ही देश की असली ताकत है, जिसे यह विश्वविद्यालय जमीनी स्तर पर उतार रहा है.
विस्तार और भविष्य की बड़ी योजनाएं
विश्वविद्यालय अपनी स्थापना के महज तीन वर्षों के भीतर ही तेजी से विकास के पथ पर अग्रसर है। इसके अंतर्गत वनांचल डेंटल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, देवकी महावीर होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एंड रिसर्च हॉस्पिटल, फैकल्टी ऑफ एजुकेशन, योग, स्पोर्ट्स साइंस एंड फिजिकल एजुकेशन, वनांचल कॉलेज ऑफ साइंस, वनांचल कॉलेज एवं स्कूल ऑफ नर्सिंग, फैकल्टी ऑफ एग्रीकल्चर, डिपार्टमेंट ऑफ फार्मेसी, इंजीनियरिंग एवं टेक्नोलॉजी, फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट, फैकल्टी ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी तथा डिपार्टमेंट ऑफ लॉ जैसे प्रतिष्ठित संस्थान सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं।
संस्थान यहीं नहीं रुका है, बल्कि भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए लगातार नए कोर्स भी जोड़ रहा है। कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय, भारत सरकार की अनुमति मिलने के बाद वर्ष 2026 से आईटीआई के 10 अलग-अलग ट्रेडों में भी प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए जा चुके हैं। इसके अलावा, चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में एक और बड़ा कदम उठाते हुए शैक्षणिक सत्र 2027 या 2028 से एमबीबीएस की कक्षाएं भी शुरू किए जाने की पूरी तैयारी है।
अत्याधुनिक अस्पताल और चिकित्सा शिक्षा का प्रसार
स्वास्थ्य और शिक्षा एक-दूसरे के पूरक हैं। बाबू दिनेश सिंह विश्वविद्यालय इस बात को भली-भांति समझता है। यही वजह है कि मेडिकल और पैरामेडिकल की पढ़ाई के साथ-साथ चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार पर भी भारी निवेश किया जा रहा है। वर्तमान में विश्वविद्यालय का लगभग 70 प्रतिशत शैक्षणिक और भौतिक बुनियादी ढांचा पूरी तरह तैयार हो चुका है।
चिकित्सा शिक्षा को और अधिक व्यावहारिक और मजबूत बनाने के लिए परिसर में 700-बेड वाले एक अत्याधुनिक अस्पताल का निर्माण कार्य युद्ध स्तर पर चल रहा है। यह अस्पताल न केवल मेडिकल छात्रों को प्रैक्टिकल ट्रेनिंग का बेहतरीन मंच देगा, बल्कि आसपास के ग्रामीण इलाकों के गरीब मरीजों के लिए संजीवनी साबित होगा। दीक्षांत समारोह में मौजूद छात्रों और उनके अभिभावकों ने इन तमाम योजनाओं का स्वागत किया और इसे अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की गारंटी माना।
"हम विश्वविद्यालय बंद कर देंगे, लेकिन फर्जी डिग्री नहीं बाटेंगे। हमारा उद्देश्य छात्रों को केवल रोजगार प्राप्त करने वाला नहीं, बल्कि रोजगार का सृजन करने वाला बनाना है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा जब ज्ञान का उपयोग समाज कल्याण के लिए हो।" — दिनेश प्रसाद सिंह, कुलाधिपति, बाबू दिनेश सिंह विश्वविद्यालय
अंत में, कुलाधिपति ने सभी पास आउट होने वाले विद्यार्थियों को अपनी शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह डिग्री उनकी मंजिल नहीं है, बल्कि एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी की शुरुआत है। वे जीवन में जहां भी जाएं, अपनी ईमानदारी, कर्मनिष्ठा और चरित्र से अपने संस्थान, समाज और पूरे राष्ट्र का नाम ऊंचा करें। यह दीक्षांत समारोह महज़ एक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय उच्च शिक्षा जगत में शुचिता और संकल्प का एक जीवंत उदाहरण बनकर सामने आया है।






