बिहार पुलिस के सर्वोच्च पद यानी पुलिस महानिदेशक (DGP) की कुर्सी पर नियुक्ति को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। राज्य के अगले पुलिस कप्तान के चयन की प्रक्रिया में एक बार फिर पेंच फंस गया है, जिसके चलते सरकार ने संघ लोकसेवा आयोग (UPSC) को योग्य और वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों के नामों की सूची भेजने की प्रक्रिया को रोक दिया है। जब तक राज्य सरकार की ओर से यह पैनल यूपीएससी को नहीं भेजा जाता, तब तक आयोग द्वारा अंतिम तीन नामों के चयन की प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकती है। इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासनिक हलकों में कई तरह की चर्चाओं को जन्म दे दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के तय नियमों के तहत होती है डीजीपी की नियुक्ति
देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा डीजीपी की नियुक्ति को लेकर बेहद स्पष्ट और कड़े दिशा-निर्देश तय किए गए हैं। इन नियमों के मुताबिक, किसी भी राज्य में पुलिस महानिदेशक के पद के लिए राज्य सरकार सबसे पहले अपने यहां तैनात सबसे वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों के नामों का एक पैनल तैयार करती है। इस शॉर्टलिस्टेड सूची को आगे की कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया के लिए संघ लोकसेवा आयोग के पास भेजा जाता है।
यूपीएससी इस सूची का बारीकी से परीक्षण करने के बाद अपनी ओर से शीर्ष तीन सबसे योग्य और वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों के नामों का फाइनल पैनल बनाकर वापस संबंधित राज्य सरकार को भेजता है। इसके बाद राज्य सरकार उस पैनल में शामिल तीन अधिकारियों में से किसी एक को राज्य का पुलिस प्रमुख नियुक्त करती है। लेकिन बिहार के मामले में सरकार अभी इस पहली सीढ़ी यानी यूपीएससी को नाम भेजने के चरण पर ही अटक गई है, जिससे चयन प्रक्रिया ठंडे बस्ते में जाती दिख रही है.
पूर्व डीजीपी के वीआरएस लेने के बाद से यह पद खाली चल रहा है और प्रशासनिक कामकाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए फिलहाल कार्यवाहक व्यवस्था के तहत काम किया जा रहा है, लेकिन स्थाई डीजीपी की नियुक्ति न होने से महकमे में नीतिगत फैसलों पर असर पड़ रहा है।
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कार्यवाहक व्यवस्था के सहारे चल रहा है बिहार पुलिस महकमा
बिहार पुलिस के मुखिया की कुर्सी पिछले कई हफ्तों से खाली पड़ी है। पूर्व आईपीएस अधिकारी विनय कुमार के स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति यानी वीआरएस (VRS) लेने के बाद से ही यह महत्वपूर्ण पद रिक्त चल रहा है। इस खालीपन को भरने के लिए सरकार ने फिलहाल अंतरिम व्यवस्था अपनाई है।
वर्तमान समय में 1991 बैच की वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी प्रीता वर्मा को कार्यवाहक डीजीपी की जिम्मेदारी सौंपी गई है। वे पुलिस महकमे के रोजमर्रा के कामकाज को संभाल रही हैं और कानून-व्यवस्था की स्थिति की निगरानी कर रही हैं। हालांकि, एक कार्यवाहक प्रमुख के पास नीतिगत मामलों और दीर्घकालिक पुलिस सुधारों को लेकर निर्णय लेने की सीमित क्षमता होती है, इसलिए महकमे के भीतर जल्द से जल्द एक पूर्णकालिक और स्थाई डीजीपी की नियुक्ति की मांग लगातार उठ रही है।
वरिष्ठ अधिकारियों और पुलिस संघों का मानना है कि राज्य में अपराध नियंत्रण और पुलिस आधुनिकीकरण जैसे अहम मुद्दों पर तेजी से फैसले लेने के लिए एक स्थाई पुलिस महानिदेशक का होना बेहद जरूरी है, लेकिन प्रशासनिक और राजनीतिक समीकरणों के चलते यह मामला लगातार उलझता जा रहा है.
जितेंद्र सिंह गंगवार और बी. श्रीनिवासन की दावेदारी से उलझा समीकरण
सूत्रों से मिल रही जानकारी के मुताबिक, बिहार के अगले डीजीपी की रेस में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों के बीच अचानक पैदा हुई प्रतिस्पर्धा ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पहले यह चर्चा थी कि राज्य सरकार बदली हुई परिस्थितियों और प्रशासनिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए 1993 बैच के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी जितेंद्र सिंह गंगवार को नया पुलिस महानिदेशक बनाने का मन बना चुकी थी।
जितेंद्र सिंह गंगवार लंबे समय तक केंद्रीय प्रतिनियुक्ति (Central Deputation) पर दिल्ली में अपनी सेवाएं दे रहे थे और उनका नाम लगभग तय माना जा रहा था। इसी बीच, केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर तैनात एक अन्य वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी बी. श्रीनिवासन ने भी बिहार लौटकर डीजीपी पद के लिए अपनी प्रबल इच्छा जता दी।
"प्रशासनिक नियुक्तियों में वरिष्ठता और योग्यता के साथ-साथ कई अन्य व्यावहारिक पहलुओं को भी ध्यान में रखना होता है, जिससे निर्णय प्रक्रिया में थोड़ा समय लग सकता है।"— वरिष्ठ प्रशासनिक सूत्र
बी. श्रीनिवासन की इस अचानक आई दावेदारी ने समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया। चूँकि दोनों ही अधिकारी वरिष्ठता सूची में बेहद मजबूत स्थिति में हैं, इसलिए सरकार के सामने यह असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है कि किसे प्राथमिकता दी जाए। इसी खींचतान के कारण नामों की सूची को अंतिम रूप देने का काम रोक दिया गया है।
सरकार का प्लान-बी और आगे की राजनीतिक व प्रशासनिक राह
दोनों वरिष्ठ अधिकारियों के आमने-सामने आने और अपनी दावेदारी पेश करने के बाद बिहार सरकार ने एहतियात के तौर पर अपनी पुरानी योजना को फिलहाल होल्ड पर डाल दिया है। सूत्रों की मानें तो सरकार अब इस पेच को सुलझाने के लिए 'प्लान-बी' पर काम कर रही है ताकि किसी भी तरह के प्रशासनिक विवाद या असंतोष से बचा जा सके।
कानूनी जानकारों का कहना है कि संघ लोकसेवा आयोग को पैनल भेजने से पहले राज्य सरकार सभी कानूनी पहलुओं और वरिष्ठता क्रम का गहराई से अध्ययन कर रही है। यदि केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर चल रहे अधिकारियों की वापसी और उनकी पात्रता को लेकर कोई तकनीकी अड़चन आती है, तो सरकार अन्य विकल्पों पर भी गंभीरता से विचार कर सकती है।
आने वाले कुछ दिनों में इस बात का फैसला होने की उम्मीद है कि सरकार किस नाम पर मुहर लगाती है और यूपीएससी को कब तक अंतिम सूची भेजी जाती है। तब तक बिहार पुलिस के शीर्ष पद को लेकर चल रही चर्चाएं और अटकलों का बाजार गर्म रहेगा.



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