बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने की दिशा में नीतीश-सम्राट सरकार ने एक बेहद कड़ा और बड़ा कदम उठाया है। राज्य सरकार ने यह फैसला किया है कि पिछले कुछ महीनों के दौरान सरकारी कामकाज के लिए जारी किए गए भारी भरकम बजट वाले टेंडरों की तकनीकी जांच कराई जाएगी। इस उच्चस्तरीय जांच के दायरे में स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार के विभाग से लेकर नगर विकास मंत्री नीतीश मिश्रा के विभाग तक, कई अति संवेदनशील और बड़े विकास कार्यों वाले मंत्रालय आ रहे हैं। सरकार की इस पहल से उन तमाम ठेकेदारों और अधिकारियों में हड़कंप मच गया है जिन्होंने नियमों को ताक पर रखकर टेंडर हासिल करने की कोशिश की होगी।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस पूरी जांच का दायरा कुल नौ महत्वपूर्ण विभागों तक फैला हुआ है। इसमें नगर विकास एवं आवास विभाग, पथ निर्माण विभाग, पर्यटन विभाग, ग्रामीण कार्य विभाग और ऊर्जा विभाग जैसे बुनियादी ढांचे को मजबूती देने वाले महकमे शामिल हैं। इसके अलावा लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग यानी PHED, भवन निर्माण विभाग, लघु जल संसाधन विभाग और स्वास्थ्य विभाग के वे सभी टेंडर इस विशेष जांच के घेरे में रहेंगे जिनकी अनुमानित लागत या वित्तीय मूल्य पांच करोड़ रुपये या उससे अधिक का है। सरकार का यह कदम साफ संकेत देता है कि सार्वजनिक धन के दुरुपयोग को रोकने के लिए प्रशासन अब किसी भी स्तर पर ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है।
निगरानी विभाग का टेक्निकल एक्जामिनर सेल करेगा दस्तावेजों की चीरफाड़
इन तमाम पांच करोड़ से ऊपर के टेंडरों की तकनीकी और वित्तीय जांच की कमान राज्य के निगरानी विभाग के तहत आने वाले टेक्निकल एक्जामिनर सेल को सौंपी गई है। इस विशिष्ट सेल में उच्च तकनीकी शिक्षा प्राप्त और अनुभवी इंजीनियरों की तैनाती की जाती है। यही तकनीकी विशेषज्ञों की टीम इस बात की गहनता से पड़ताल करेगी कि क्या संबंधित विभागों में टेंडर जारी करने से लेकर अंतिम परिणाम घोषित करने तक की पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बरती गई थी या नहीं। दस्तावेजों के पन्नों को खंगालकर यह देखा जाएगा कि नियमों से हटकर कोई मनमाना फैसला तो नहीं लिया गया।
"सरकारी खजाने के एक-एक पाई का सदुपयोग सुनिश्चित करना हमारी प्राथमिकता है। बड़े पैमाने पर हो रहे विकास कार्यों में किसी भी तरह की गड़बड़ी या नियमों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जो भी अनियमितता सामने आएगी, उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई तय है।" — प्रशासनिक सूत्र, बिहार सरकार
विशेषज्ञों का मानना है कि टेक्निकल एक्जामिनर सेल की यह जांच केवल कागजी खानापूर्ति नहीं होगी, बल्कि यह टेंडर प्रक्रिया के हर एक चरण की वैज्ञानिक और तकनीकी समीक्षा करेगी। सेल के अधिकारी यह देखेंगे कि टेंडर की प्रक्रिया के दौरान क्या किसी खास एजेंसी को फायदा पहुंचाने के लिए मानकों के साथ खिलवाड़ किया गया था। इस तरह की पारदर्शी और कड़ी छानबीन से ठेका हासिल करने वाली कंपनियों के तौर-तरीकों पर भी पैनी नजर रखी जा सकेगी।
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टेंडर की अनुमानित लागत और अंतिम नतीजों के बीच के अंतर की होगी पड़ताल
इस व्यापक जांच अभियान के तहत संबंधित विभागों को केवल सतही जानकारी देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि हर एक टेंडर का मुकम्मल कच्चा-चिट्ठा निगरानी सेल के समक्ष पेश करना होगा। विभागों से स्पष्ट रूप से यह मांगा गया है कि वे टेंडर जारी करने की सटीक तारीख और संबंधित परियोजना का पूरा नाम साझा करें। इसके साथ ही, उस विशिष्ट कार्य के लिए विभाग द्वारा पूर्व में कितनी अनुमानित राशि तय की गई थी, इसका भी पूरा ब्योरा देना अनिवार्य किया गया है। इसके अलावा वर्तमान समय में उस टेंडर की क्या स्थिति है, इस बात की भी पूरी रिपोर्ट मांगी गई है।
जांच का एक और सबसे दिलचस्प और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि टेंडर की अनुमानित लागत और उसके अंतिम परिणाम यानी अलॉटमेंट के बीच कितना अंतर रहा है, इसकी भी शत-प्रतिशत गणना की जाएगी। विभागों से यह पूछा गया है कि क्या अंतिम परिणाम तय किए गए वित्तीय अनुमान से कम पर फाइनल हुआ या फिर अनुमान से ज्यादा का भुगतान किया गया। इस लागत के अंतर को प्रतिशत के रूप में भी दर्ज करके देना होगा ताकि यह पता चल सके कि कहीं वित्तीय अनियमिताओं के जरिए सरकारी धन का हेरफेर तो नहीं किया गया है।
जनवरी 2026 से अब तक के सभी बड़े टेंडर होंगे स्कैन
इस पूरी तकनीकी जांच की समयसीमा भी तय कर दी गई है। जांच का दायरा मुख्य रूप से जनवरी 2026 से शुरू होकर अब तक के अंतराल को कवर करेगा। इस तय अवधि के भीतर जिन विभागों ने भी पांच करोड़ रुपये या उससे अधिक मूल्य के टेंडर विज्ञापित किए हैं या प्रक्रिया पूरी की है, उन सभी फाइलों को खंगाला जाएगा। सरकार ने सभी नौ संबंधित विभागों को कड़े निर्देश दिए हैं कि वे बिना किसी हीले-हवा के सारे दस्तावेज और रिकॉर्ड समय पर निगरानी विभाग के सुपुर्द करें, ताकि जांच प्रक्रिया में किसी प्रकार की अनावश्यक देरी न हो सके।
राज्य में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं, ऐसे में इस प्रकार की तकनीकी ऑडिट और जांच प्रक्रिया का होना बेहद जरूरी माना जा रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने से लेकर सड़कों के निर्माण, ग्रामीण विकास और शहरी आधारभूत संरचनाओं को गति देने वाले इन नौ विभागों के कामकाज पर अब जनता की भी नजरें टिकी हुई हैं। इस पूरी कार्रवाई का मुख्य उद्देश्य भ्रष्टाचार पर प्रभावी लगाम लगाना और यह सुनिश्चित करना है कि राज्य के विकास कार्यों में पारदर्शिता का पूरी तरह से पालन हो।



