बिहार विधान परिषद चुनाव में बिखरा महागठबंधन का कुनबा
बिहार की राजनीति में एक बार फिर विपक्षी दलों के राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और कांग्रेस के बीच आपसी खींचतान खुलकर सामने आ गई है। आगामी बिहार विधान परिषद के द्विवार्षिक चुनावों को लेकर दोनों दलों के बीच सीट बंटवारे के मामले पर सहमति नहीं बन पाई है। स्थिति यह हो गई है कि एक बार फिर से 'फ्रेंडली फाइट' यानी दोस्ताना मुकाबले के आसार बन चुके हैं, जो भविष्य के सियासी गठजोड़ के लिए बड़ा सवालिया निशान खड़े कर रहे हैं।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि लालटेन और हाथ के पंजे के बीच तालमेल की कमी का यह ताजा एपिसोड जमीनी स्तर पर विपक्षी एकता को तगड़ा झटका दे सकता है। खास तौर पर तब जब राज्य में आगामी राजनीतिक चुनौतियों से निपटने के लिए एकजुटता को सबसे बड़ा हथियार माना जा रहा था। कांग्रेस के इस ताजा कदम से राजनीतिक विश्लेषक भी हैरान हैं, क्योंकि दोनों दल मिलकर एनडीए को घेरने की रणनीति पर काम कर रहे थे।
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राजद की तरफ से बिना चर्चा के उम्मीदवारों के ऐलान से बढ़ी नाराजगी
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब राष्ट्रीय जनता दल के नेतृत्व ने कांग्रेस को भरोसे में लिए बिना ही अपने उम्मीदवारों के नामों का सार्वजनिक ऐलान कर दिया। सूत्रों के अनुसार, राजद ने सीटों के बंटवारे पर किसी भी तरह की औपचारिक चर्चा किए बिना ही अपने प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी थी। पार्टी ने अपनी रणनीति के तहत पहले ही छह सीटों पर उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर दी थी, जिससे कांग्रेस खेमे में गहरी नाराजगी फैल गई।
कांग्रेस पार्टी का तर्क था कि एक बड़े गठबंधन के तौर पर चुनाव लड़ते समय साझीदार दलों से विचार-विमर्श करना अनिवार्य होता है। लेकिन राजद के एकतरफा रवैये ने कांग्रेस को कड़ा कदम उठाने पर मजबूर कर दिया। इसी नाराजगी के परिणाम स्वरूप पार्टी आलाकमान ने भी बिना किसी समझौते के अपने स्तर पर उम्मीदवारों को मैदान में उतारने का अंतिम निर्णय लिया, जिससे दोनों दलों के बीच दूरियां और अधिक बढ़ गई हैं।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की मुहर के बाद जारी हुई सूची
बिहार विधान परिषद चुनाव-2026 के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) की तरफ से एक आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई है। इसके अनुसार, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने ग्रेजुएट्स और टीचर्स निर्वाचन क्षेत्रों के लिए होने वाले इन महत्वपूर्ण चुनावों के वास्ते पार्टी उम्मीदवारों के नामों को अपनी हरी झंडी दे दी है। कांग्रेस ने राज्य की कुल पांच एमएलसी सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने का विधिवत ऐलान कर दिया है।
इस सूची के सामने आने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि कम से कम चार सीटें ऐसी हैं जिन पर राजद और कांग्रेस के प्रत्याशी आमने-सामने होंगे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस तरह के दोस्ताना मुकाबले अक्सर जमीनी स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं को असमंजस में डाल देते हैं और इसका सीधा फायदा सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन को मिल सकता है।
किन-किन सीटों पर देखने को मिलेगा दोस्ताना मुकाबला?
कांग्रेस पार्टी द्वारा जारी की गई सूची के मुताबिक, पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से संजय यादव को उम्मीदवार बनाया गया है, जहां उनका मुकाबला राजद के अधिकृत प्रत्याशी संजीव कुमार सिंह से होगा। वहीं, पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र पर कांग्रेस ने असदुल्लाह खान पर दांव खेला है, जिनका सामना राजद के उम्मीदवार दिलीप कुमार से होना तय माना जा रहा है।
इसके अलावा, कोसी स्नातक सीट पर कांग्रेस के टिकट पर मनोज कुमार जायसवाल ताल ठोक रहे हैं, जबकि इस सीट पर राजद ने नितेश कुमार को मैदान में उतारा है। दरभंगा स्नातक सीट की बात करें तो यहां भी दोनों घटक दलों के बीच सीधी टक्कर देखने को मिलेगी, जहां कांग्रेस के रजनीकांत पाठक का मुकाबला राजद के अनिल कुमार झा के साथ होना तय हुआ है।
दरभंगा शिक्षक सीट पर मदन मोहन झा को दोबारा मिला टिकट
इन तमाम राजनीतिक उठापटक के बीच दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस ने अपने वरिष्ठ नेता और बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष मदन मोहन झा को एक बार फिर से चुनावी मैदान में उतारा है। खास बात यह है कि इस विशेष सीट पर राजद ने अपना कोई भी उम्मीदवार नहीं उतारा था, जिससे कांग्रेस के लिए यहां मुकाबला थोड़ा सहज नजर आ रहा है।
मदन मोहन झा का मुकाबला इस सीट पर जनता दल यूनाइटेड (JDU) के घनश्याम राय के साथ-साथ प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के प्रत्याशी एसपी राय से भी होगा। राजनीतिक हलकों में मदन मोहन झा की उम्मीदवारी को काफी अहम माना जा रहा है, क्योंकि वे क्षेत्र में मजबूत पकड़ रखते हैं।
विधानसभा चुनाव के बाद से ही जारी है सीटों पर तकरार
यह कोई पहला मौका नहीं है जब बिहार में राजद और कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर इस तरह की स्थिति पैदा हुई हो। पिछले साल संपन्न हुए विधानसभा चुनावों के दौरान भी दोनों दलों के बीच सीटों के तालमेल को लेकर आखिरी समय तक पेंच फंसा रहा था। कई सीटों पर सहमति न बन पाने के कारण दोनों दलों ने एक-दूसरे के खिलाफ अपने उम्मीदवार उतारे थे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बार-बार इस तरह की स्थितियां पैदा होना इस बात का प्रमाण है कि महागठबंधन के भीतर आपसी समन्वय की भारी कमी है। यदि समय रहते शीर्ष नेतृत्व ने इस आंतरिक कलह को नहीं सुलझाया, तो आने वाले समय में विपक्षी दलों के लिए एकजुट होकर राजनीतिक लड़ाइयां लड़ना बेहद मुश्किल साबित हो सकता है।
निष्कर्ष और आगे की राजनीतिक राह
बिहार विधान परिषद के इन चुनावों में कांग्रेस और राजद की राहें जुदा होना राज्य की राजनीति में एक नए घटनाक्रम को जन्म दे रहा है। एक तरफ जहां सभी दल अपनी सियासी जमीन मजबूत करने में जुटे हैं, वहीं विपक्षी खेमे में आपसी फूट का लाभ उठाने के लिए सत्ताधारी गठबंधन पूरी तरह तैयार बैठा है। अब देखना यह होगा कि मतदान की तारीख नजदीक आने पर क्या दोनों दल आपसी बातचीत से कोई बीच का रास्ता निकालते हैं या फिर यह दोस्ताना संघर्ष अंतिम समय तक जारी रहता है।
"बिहार विधान परिषद चुनाव में हमारे नेतृत्व ने जमीनी परिस्थितियों और कार्यकर्ताओं की मांग को ध्यान में रखते हुए अपने उम्मीदवारों को मैदान में उतारने का स्पष्ट और दृढ़ निर्णय लिया है। पार्टी अपने दम पर मजबूत प्रदर्शन करने के लिए पूरी तरह तैयार है।" — कांग्रेस पार्टी का आधिकारिक बयान





