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चुनावी खर्च का बड़ा सच: पांच राज्यों के दंगल में बीजेपी ने झोंके 529 करोड़, कांग्रेस का खर्च आधे से भी कम

भारत निर्वाचन आयोग द्वारा सार्वजनिक किए गए चुनावी खर्च के आंकड़ों से बड़ा खुलासा हुआ है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने जहां पानी की तरह पैसा बहाया, वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस का कुल खर्च इसके मुकाबले आधे से भी कम पर सिमट गया।
The Freelance ब्यूरो
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24 सितंबर 2026 • अपडेटेड
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चुनावी खर्च का बड़ा सच: पांच राज्यों के दंगल में बीजेपी ने झोंके 529 करोड़, कांग्रेस का खर्च आधे से भी कम
📷 चुनावी खर्च का बड़ा सच: पांच राज्यों के दंगल में बीजेपी ने झोंके 529 करोड़, कांग्रेस का खर्च आधे से भी कम — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने कुल 529 करोड़ रुपये का भारी-भरकम खर्च किया।
  • मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने इन सभी चुनावों पर कुल मिलाकर 248.55 करोड़ रुपये ही खर्च किए।
  • अकेले पश्चिम बंगाल के रण में बीजेपी ने अपने कुल बजट का 50 फीसदी यानी करीब 286 करोड़ रुपये झोंक दिए।
  • चुनावी घोषणा से लेकर परिणाम आने तक के अंतराल में बीजेपी को कुल 1,473 करोड़ रुपये का चंदा मिला।
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चुनावी मैदान में पैसों की खड़खड़: किसने किस राज्य में झोंकी कितनी ताकत

देश के विभिन्न राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों का दंगल हमेशा से ही सियासी ताकतों और वित्तीय संसाधनों की बड़ी परीक्षा रहा है। हाल ही में भारत निर्वाचन आयोग ने इस साल की शुरुआत में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के आधिकारिक खर्च के ब्योरे को सार्वजनिक किया है। इन आंकड़ों के सामने आने के बाद देश की सियासत में खर्च के आंकड़ों को लेकर एक बार फिर से चर्चाएं तेज हो गई हैं। आंकड़ों के मुताबिक, सत्ताधारी दल ने इन चुनावों में अपनी पूरी ताकत झोंक दी, जिसके तहत भारी-भरकम वित्तीय संसाधन मैदान में उतारे गए। दूसरी ओर, राष्ट्रीय स्तर पर मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभाने वाली कांग्रेस पार्टी ने इन चुनावों में तुलनात्मक रूप से बेहद सीमित खर्च किया।

निर्वाचन आयोग के पास जमा कराए गए दस्तावेजों से यह साफ हो जाता है कि किस पार्टी ने किस राज्य की भौगोलिक और राजनीतिक महत्ता को देखते हुए अपनी तिजोरी के दरवाजे खोले। चुनावी प्रबंधन और मतदाताओं तक अपनी बात पहुंचाने के लिए राजनीतिक दलों द्वारा किए जाने वाले खर्च का यह पैमाना इस बात की गवाही देता है कि आज के दौर में लोकतंत्र का चुनाव लड़ना कितना महंगा सौदा बनता जा रहा है। राजनीतिक दलों के लिए हर एक बूथ, हर एक रैली और हर एक विज्ञापन पर होने वाला खर्च उनकी चुनावी रणनीति का सबसे अहम हिस्सा बन चुका है।

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असम से लेकर पश्चिम बंगाल तक: बीजेपी के खर्च का पूरा लेखा-जोखा

इस साल जिन पांच राज्यों में चुनाव संपन्न हुए, उनमें असम, तमिलनाडु, पुडुचेरी, पश्चिम बंगाल और केरल शामिल हैं। इन सभी राज्यों में चुनावी विज्ञापनों, रैलियों और उम्मीदवारों के समर्थन में भारतीय जनता पार्टी ने कुल मिलाकर 529 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च की। पार्टी की रणनीति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसने अकेले पश्चिम बंगाल के सियासी रण में 286 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम झोंक दी, जो उनके कुल चुनावी खर्च का आधे से भी अधिक हिस्सा है। बंगाल में सियासी वर्चस्व स्थापित करने के लिए पार्टी ने अपनी पूरी ताकत लगा दी थी, जिसका असर चुनावी खर्च के इन आंकड़ों में साफ तौर पर देखा जा सकता है।

इसके अलावा अन्य राज्यों की बात करें तो असम में पार्टी ने 96 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए, जहां उसे शानदार सफलता हासिल हुई और पार्टी ने सत्ता पर कब्जा जमाया। दक्षिण भारत के प्रवेश द्वार माने जाने वाले केरल में भी पार्टी ने अपनी जमीन मजबूत करने के लिए 82 करोड़ रुपये खर्च किए। तमिलनाडु में पार्टी का खर्च 51 करोड़ रुपये के आसपास रहा, जबकि पुडुचेरी में जहां एनडीए ने सरकार बनाई, वहां लगभग 11 करोड़ रुपये का खर्च आया। बीजेपी ने हर राज्य के हिसाब से अपना अलग और विस्तृत खर्च विवरण निर्वाचन आयोग को सौंपा है, जिससे उनकी हर क्षेत्र की प्राथमिकताओं का स्पष्ट आकलन किया जा सकता है।

कांग्रेस पार्टी की वित्तीय स्थिति: आधा खर्च और अलग रिपोर्टिंग का पैटर्न

एक तरफ जहां सत्ताधारी दल ने हर राज्य के लिए अलग-अलग विस्तृत चुनावी खर्च का ब्योरा दिया, वहीं कांग्रेस पार्टी ने एक अलग ही रास्ता अपनाया। कांग्रेस ने पांचों राज्यों के चुनावों का पूरा खर्च एक साथ समेकित करके निर्वाचन आयोग के सामने पेश किया। आंकड़ों के अनुसार, इन सभी पांच राज्यों के चुनावी संग्राम में कांग्रेस ने कुल 248.55 करोड़ रुपये खर्च किए, जो कि बीजेपी के कुल खर्च के आधे से भी काफी कम है। राष्ट्रीय स्तर पर संसाधनों की कमी और क्षेत्रीय दलों के साथ गठजोड़ के समीकरणों का असर कांग्रेस के इस चुनावी खर्च पर साफ तौर पर दिखाई दिया।

राज्यवार खर्च की बात करें तो कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करने के लिए अलग-अलग रणनीतियां अपनाईं। केरल में पार्टी ने प्रति उम्मीदवार सबसे ज्यादा पैसा खर्च किया, जहां हर प्रत्याशी को औसतन 30 लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता पहुंचाई गई। इसके विपरीत, असम जैसे राज्यों में कुछ चुनिंदा उम्मीदवारों को 10 लाख रुपये तक की राशि ही दी गई। संसाधनों के मोर्चे पर जूझ रही कांग्रेस पार्टी के लिए यह चुनाव अपनी राजनीतिक जमीन बचाने और सहयोगियों के साथ मिलकर सरकार बनाने की जद्दोजहद से भरा रहा था।

क्षेत्रीय दलों का जलवा: डीएमके और अन्नाद्रमुक ने भी बहाया पानी की तरह पैसा

राष्ट्रीय दलों के अलावा दक्षिण भारत के कद्दावर क्षेत्रीय दलों ने भी चुनावी खर्च के मामले में किसी को पीछे नहीं छोड़ा। तमिलनाडु और पुडुचेरी के राजनीतिक मैदान में उतरी द्रविड़ मुनेत्र कषगम यानी डीएमके ने इन चुनावों पर कुल 197 करोड़ रुपये खर्च किए। डीएमके के इस खर्च में एक दिलचस्प पहलू यह रहा कि उन्होंने पार्टी के सामान्य प्रचार पर लगभग 149 करोड़ रुपये खर्च किए, जबकि उम्मीदवारों के खाते में सीधे तौर पर 47 करोड़ रुपये से कुछ अधिक की राशि ही गई। इससे यह साबित होता है कि क्षेत्रीय दल आज भी सामूहिक प्रचार और जनसभाओं के माध्यम से जनता तक अपनी बात पहुंचाने पर सबसे अधिक जोर देते हैं।

दूसरी ओर, मुख्य प्रतिद्वंद्वी ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम ने तमिलनाडु, पुडुचेरी और केरल के चुनावों के लिए अपनी संयुक्त खर्च रिपोर्ट दाखिल की। पार्टी ने इन तीनों राज्यों में कुल मिलाकर 112 करोड़ रुपये खर्च किए, जिसमें से अधिकांश हिस्सा पार्टी के प्रचार-प्रसार पर ही खर्च हुआ। जानकारों का मानना है कि इस खर्च का लगभग पूरा हिस्सा तमिलनाडु के खाते में ही गया होगा, क्योंकि पार्टी ने केरल में अपना कोई भी उम्मीदवार नहीं उतारा था और पुडुचेरी में भी उसने केवल दो सीटों पर ही अपने प्रत्याशी खड़े किए थे। क्षेत्रीय दलों की यह वित्तीय ताकत यह दिखाती है कि वे अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में राष्ट्रीय दलों को कड़ी टक्कर देने का माद्दा रखते हैं।

चंदे का भारी अंतर और चुनावी चक्कार: आंकड़ों की जुबानी

चुनावी खर्च के इन आधिकारिक आंकड़ों के साथ-साथ एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है, जो राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे से जुड़ा है। चुनावी घोषणा होने से लेकर चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह संपन्न होने तक के अंतराल में भारतीय जनता पार्टी को विभिन्न स्रोतों से कुल 1,473 करोड़ रुपये का भारी चंदा प्राप्त हुआ। इसके मुकाबले, इसी समान अवधि में कांग्रेस पार्टी को केवल 207 करोड़ रुपये ही चंदे के रूप में मिल सके। चंदे की राशि में यह विशाल अंतर इस बात को स्पष्ट करता है कि राजनीतिक दलों के वित्तीय संसाधनों में कितना बड़ा फर्क आ चुका है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के आंकड़े हमारे देश की चुनावी प्रणाली में पारदर्शिता लाने की दिशा में एक बहुत महत्वपूर्ण कदम हैं। निर्वाचन आयोग द्वारा हर पार्टी के आय और व्यय के ब्योरे को सार्वजनिक किए जाने से आम जनता को यह समझने का मौका मिलता है कि लोकतंत्र के इस महापर्व में कौन सी पार्टी किस ताकत के साथ मैदान में उतरी थी। आने वाले दिनों में इन आंकड़ों पर सियासत गरमाना तय है, क्योंकि चुनावी खर्च की यह जंग हमेशा से ही राजनीतिक बहसों के केंद्र में रही है।

"लोकतंत्र के इस सबसे बड़े उत्सव में पारदर्शिता ही सबसे बड़ा हथियार है। जब तक राजनीतिक दलों के वित्तीय स्रोतों और खर्च का एक-एक हिसाब जनता के सामने नहीं आएगा, तब तक चुनावी शुचिता की बात अधूरी ही रहेगी।" — वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक
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