सोशल मीडिया पर वायरल हुई ग्लोबल लीडर्स की फर्जी सेल्फी
आज के डिजिटल दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI का इस्तेमाल जितना रचनात्मक कार्यों के लिए हो रहा है, उतना ही इसका दुरुपयोग गलत सूचनाएं फैलाने के लिए भी किया जा रहा है। इन दिनों इंटरनेट के विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर दुनिया के ताकतवर नेताओं की एक तस्वीर चर्चा का विषय बनी हुई है। इस तस्वीर में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और दुनिया के कई अन्य बड़े नेता एक फ्रेम में सेल्फी लेते हुए नजर आ रहे हैं। इस तस्वीर को देखकर पहली नजर में किसी को भी यह असली लग सकती है, क्योंकि इसमें फिनिशिंग और लाइटिंग का काम बेहद बारीकी से किया गया है।
तस्वीर को शेयर करने वाले तमाम यूजर दावा कर रहे हैं कि यह हालिया वैश्विक सम्मेलनों के दौरान की अनौपचारिक तस्वीर है, जिसमें दुनिया के शीर्ष नेता एक साथ कैमरे के सामने पोज दे रहे हैं। कुछ मुख्यधारा के डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और सोशल मीडिया हैंडल्स ने भी बिना इसकी सत्यता की जांच किए इसे शेयर करना शुरू कर दिया, जिससे आम जनता के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो गई। हालांकि, जब इस तस्वीर की गहराई से तकनीकी और तथ्यात्मक जांच की गई, तो इसके पीछे छिपे सच से पर्दा उठ गया और यह पूरी तरह से एक मनगढ़ंत रचना साबित हुई।
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तस्वीर में छिपी हैं कई बड़ी और स्पष्ट तकनीकी खामियां
किसी भी एआई-जनरेटेड तस्वीर को पकड़ने के लिए उसकी विजुअल डिटेल्स को बारीकी से देखना जरूरी होता है। वायरल हो रही इस तथाकथित ग्लोबल सेल्फी में कई ऐसी बड़ी विसंगतियां मौजूद हैं, जो साफ इशारा करती हैं कि यह किसी कैमरे से ली गई वास्तविक तस्वीर नहीं है। सबसे बड़ा विरोधाभास इसमें ईरान के पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की मौजूदगी को लेकर है। जैसा कि सर्वविदित है, मई 2024 में एक दर्दनाक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में इब्राहिम रईसी का निधन हो गया था। इसके बावजूद, इस ताजा तस्वीर में उनका दिखना इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि इसे बनाने वाले ने इतिहास और वर्तमान की बुनियादी सच्चिताओं को नजरअंदाज कर दिया।
इसके अलावा, वर्तमान कूटनीतिक बैठकों और प्रोटोकॉल के मुताबिक भी कई देश इस शिखर सम्मेलन में अपने राष्ट्राध्यक्षों के बजाय अन्य वरिष्ठ प्रतिनिधियों के माध्यम से शामिल हो रहे हैं। उदाहरण के लिए, ब्राजील और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राष्ट्रपति इस आयोजन में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हैं, बल्कि उनके देश के अन्य प्रतिनिधि उच्च पदों पर देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इसके बावजूद एआई जनरेटर ने कल्पना के आधार पर उन सभी नेताओं को एक साथ फ्रेम में ला खड़ा किया, जो वास्तविक दुनिया की कूटनीतिक बैठकों के नियमों के बिल्कुल विपरीत है।
एआई डिटेक्शन टूल्स ने खोली फर्जी तस्वीर की पोल
जब सोशल मीडिया पर फैल रहे इस भ्रम को दूर करने के लिए तकनीकी विशेषज्ञों ने इस इमेज की फोरेंसिक जांच की, तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग की पुष्टि तुरंत हो गई। बाजार में उपलब्ध प्रमुख एआई कंटेंट डिटेक्टर टूल्स जैसे कि 'हाइव मॉडरेशन' (Hive Moderation) और 'साइटइंजन' (Sightengine) की मदद से इस फाइल को स्कैन किया गया। परिणामों ने चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे, जहां हाइव मॉडरेशन ने इसके एआई-जनरेटेड होने की संभावना 99.9 प्रतिशत तक आंकी, वहीं साइटइंजन ने भी इसे 99 प्रतिशत स्कोर दिया।
तकनीकी जांच में यह भी संकेत मिले कि इस तस्वीर को बनाने के लिए ओपनएआई (OpenAI) के लोकप्रिय टूल्स का इस्तेमाल किया गया था। इसके बाद जब इसे OpenAI के आधिकारिक 'वेरीफाई' (Verify) टूल के माध्यम से परखा गया, तो यह स्पष्ट हो गया कि यह तस्वीर किसी कैमरे के लेंस से नहीं, बल्कि कंप्यूटर के एल्गोरिदम और प्रॉम्प्ट्स के जरिए गढ़ी गई है। इस तरह के मामलों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि सोशल मीडिया पर दिखने वाली हर चमकती हुई चीज सच नहीं होती और किसी भी वायरल कंटेंट को आंख मूंदकर भरोसा करने से पहले उसकी सत्यता परखना बेहद जरूरी है।
इंटरनेट के इस दौर में डीपफेक और फेक न्यूज से कैसे बचें
आज के समय में डीपफेक और एआई जनरेटेड तस्वीरें इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुकी हैं। तकनीक इतनी उन्नत हो गई है कि कोई भी व्यक्ति कुछ ही सेकंड में किसी भी नामी हस्ती की फर्जी तस्वीर, वीडियो या ऑडियो तैयार कर सकता है। ऐसे में यह हर जागरूक नागरिक की जिम्मेदारी बन जाती है कि वह किसी भी सनसनीखेज या अनूठी तस्वीर को फॉरवर्ड करने से पहले उसकी प्रामाणिकता की जांच अवश्य करे। सरकारी एजेंसियों, पीआईबी (PIB) फैक्ट चेक या प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों द्वारा जारी किए गए आधिकारिक बयानों और तस्वीरों पर ही भरोसा किया जाना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की भ्रामक सामग्री का मुख्य उद्देश्य सोशल मीडिया पर सनसनी फैलाना और लाइक्स या शेयर बटोरना होता है। कई बार राजनीतिक या कूटनीतिक माहौल को प्रभावित करने के लिए भी ऐसे हथकंडों का इस्तेमाल किया जाता है। आम नागरिकों को चाहिए कि वे ऐसी तस्वीरों के झांसे में न आएं और इनकी सच्चाई जानने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचें। तकनीक के इस दौर में सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव है।
निष्कर्ष और आधिकारिक स्रोतों की महत्ता
कुल मिलाकर, सोशल मीडिया पर वायरल हो रही ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की यह तथाकथित सेल्फी पूरी तरह से एक एआई-जनरेटेड कल्पना है, जिसका वास्तविक घटनाओं से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। इस तरह की फर्जी खबरों से बचने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि किसी भी बड़े कूटनीतिक आयोजन की आधिकारिक तस्वीरें केवल प्रधानमंत्री कार्यालय, विदेश मंत्रालय या संबंधित अंतरराष्ट्रीय संगठनों के सत्यापित सोशल मीडिया अकाउंट्स से ही ली जाएं। स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता का उद्देश्य हमेशा पाठकों तक सच पहुंचाना होता है, और ऐसे में एआई के दौर में डिजिटल साक्षरता का होना और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
"डिजिटल युग में फेक न्यूज और एआई जनरेटेड डीपफेक हमारी लोकतांत्रिक और सामाजिक ताने-बाने के लिए एक बड़ी चुनौती हैं। किसी भी वायरल तस्वीर या दावे को आगे बढ़ाने से पहले उसकी सत्यता की जांच करना हर जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य है।" — डिजिटल मीडिया विशेषज्ञ और तकनीकी विश्लेषक







