चंडीगढ़ शिक्षा विभाग में गहराता भर्ती संकट
चंडीगढ़ के सरकारी स्कूलों में शिक्षण व्यवस्था इन दिनों एक गंभीर दौर से गुजर रही है। शिक्षा विभाग के भीतर शिक्षकों के सैकड़ों पद खाली पड़े हैं और उन्हें भरने के लिए कोई अधिकृत रिक्रूटमेंट एजेंसी आगे नहीं आ रही है। इस प्रशासनिक गतिरोध के कारण न केवल स्कूलों की शैक्षणिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं, बल्कि स्थानीय कैडर के शिक्षकों के हक और अधिकारों पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। हालात इतने नाज़ुक हो चुके हैं कि मामले की गूंज अब सीधे देश की राजधानी दिल्ली स्थित केंद्रीय गृह मंत्रालय तक जा पहुंची है।
विभिन्न कर्मचारी यूनियनों ने इस पूरे मामले में केंद्र सरकार के दखल की मांग की है। उनका कहना है कि मौजूदा व्यवस्था स्कूल प्रणाली को सुचारू रूप से चलाने में पूरी तरह विफल साबित हो रही है। अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच समन्वय की कमी और भर्ती प्रक्रियाओं के ठप होने से शिक्षण कार्य बुरी तरह बाधित हो रहा है। ऐसे में केंद्रीय स्तर पर हस्तक्षेप कर नीतिगत बदलाव करने की सख्त जरूरत महसूस की जा रही है ताकि आने वाले दिनों में शिक्षा का स्तर और अधिक न गिरे।
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स्पेशल रिक्रूटमेंट कमेटी के खिलाफ मुखर हुईं यूनियनें
कर्मचारी संगठनों का मुख्य विरोध पंजाब के राज्यपाल द्वारा गठित स्पेशल रिक्रूटमेंट कमेटी को लेकर है। यूनियनों का तर्क है कि जब से केंद्रीय सेवा नियम (CSR) चंडीगढ़ में लागू किए गए हैं, तब से इस प्रकार की विशेष समितियों के जरिए कामकाज चलाना व्यावहारिक नहीं रहा है। इन संगठनों ने मांग की है कि इस कमेटी को तत्काल प्रभाव से भंग किया जाए और पुरानी व्यवस्था के तहत स्टाफ सिलेक्शन कमीशन (SSC) के माध्यम से ही भविष्य की सभी भर्तियां सुनिश्चित की जाएं।
यूनियनों ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को ईमेल और आधिकारिक पोर्टल के माध्यम से अपनी विस्तृत शिकायत भेजी है। उनका साफ कहना है कि एसएससी के जरिए पारदर्शी और नियमित परीक्षाएं होती थीं, जिससे योग्य उम्मीदवारों को निष्पक्ष मौका मिलता था। लेकिन मौजूदा स्पेशल कमेटी के कामकाज के तरीके ने पूरी प्रक्रिया को पेचीदा बना दिया है, जिससे विभाग के भीतर भारी असंतोष पनप रहा है।
खाली पड़े 532 पद और डेपुटेशन की मजबूरी
भर्ती एजेंसी के अभाव में चंडीगढ़ के विद्यालयों में शिक्षकों के 532 पद रिक्त पड़े हैं, जिन्हें समय पर भरा जाना असंभव सा हो गया है। आगामी शैक्षणिक सत्र और जुलाई माह की समय-सीमा नजदीक होने के बावजूद विभाग के हाथ बंधे हुए हैं। इन खाली पदों को भरने का कोई ठोस विकल्प न मिलने के कारण मजबूरन वैकल्पिक व्यवस्था का सहारा लिया जा रहा है।
स्कूलों का संचालन सुचारू बनाए रखने के लिए विभाग ने आनन-फानन में 94 शिक्षकों और प्राचार्यों को डेपुटेशन पर बुलाया है। इन शिक्षकों के साक्षात्कार की प्रक्रिया भी तय कर ली गई है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि डेपुटेशन की यह नीति लंबे समय का समाधान नहीं हो सकती और इससे मूल स्कूलों की व्यवस्था भी चरमरा जाती है।
स्थानीय शिक्षकों की रुकी पदोन्नति और बढ़ता असंतोष
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे नकारात्मक असर चंडीगढ़ कैडर के नियमित शिक्षकों पर पड़ रहा है। नियमानुसार कैडर के शिक्षकों को समय पर पदोन्नति मिलनी चाहिए, लेकिन बाहरी या डेपुटेशन पर आए शिक्षकों को प्राथमिकता मिलने के कारण स्थानीय शिक्षकों का हक मारा जा रहा है। स्थिति यह हो गई है कि सैकड़ों शिक्षक बिना किसी प्रमोशन का लाभ पाए अपनी तीन दशक लंबी सेवा पूरी करके सेवानिवृत्त हो रहे हैं।
संघर्षरत शिक्षकों और यूनियनों का कहना है कि वे अपने वैध अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। यदि समय रहते प्रशासनिक अमले ने उनकी मांगों पर संज्ञान नहीं लिया, तो विरोध के सुर और अधिक तेज हो सकते हैं। शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में इस तरह की अव्यवस्था छात्रों के भविष्य के लिए भी चिंता का विषय बनती जा रही है।
"चंडीगढ़ कैडर के शिक्षकों के अधिकारों की लगातार अनदेखी हो रही है। बिना प्रमोशन के शिक्षक रिटायर हो रहे हैं और बाहर से डेपुटेशन पर लोग लाए जा रहे हैं। हम चाहते हैं कि स्पेशल रिक्रूटमेंट कमेटी को खत्म कर तुरंत एसएससी की बहाली की जाए।" — कर्मचारी यूनियन प्रतिनिधि, चंडीगढ़
निष्कर्ष और आगे की राह
चंडीगढ़ के सरकारी स्कूलों में शिक्षक भर्ती और प्रमोशन का यह मामला प्रशासनिक सुस्ती और नीतिगत पशोपेश का जीता-जागता उदाहरण है। जब तक केंद्रीय गृह मंत्रालय इस मामले में हस्तक्षेप कर कोई स्थायी और पारदर्शी नीति निर्धारित नहीं करता, तब तक कर्मचारियों का असंतोष थमने वाला नहीं है। छात्रों के भविष्य और शिक्षकों के अधिकारों के संतुलन के लिए यह जरूरी है कि जल्द से जल्द एसएससी जैसी स्थापित संस्थाओं के माध्यम से निष्पक्ष भर्ती प्रक्रिया को दोबारा पटरी पर लाया जाए।








