चिकनपॉक्स का बढ़ता प्रकोप और वैश्विक आंकड़े
छोटे बच्चों में होने वाली संक्रामक बीमारियों में चिकनपॉक्स को सबसे आम माना जाता है। हालांकि इसे चेचक यानी स्मॉलपॉक्स जितना घातक नहीं कहा जा सकता, लेकिन बच्चों के स्वास्थ्य पर इसका बुरा असर पड़ सकता है। ‘वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन’ (WHO) द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर चिकनपॉक्स के मामलों की संख्या काफी अधिक है। आंकड़ों पर गौर करें तो एक वर्ष विशेष में दुनियाभर में लगभग 8.67 करोड़ लोग इस बीमारी की चपेट में आए थे।
इस संक्रमण के कारण हजारों लोगों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी थी। डब्लूएचओ के अनुसार, इस बीमारी से वैश्विक स्तर पर 13,931 लोगों की मौत दर्ज की गई थी। इन आंकड़ों से साफ है कि भले ही इस बीमारी को सामान्य मान लिया जाता है, लेकिन लापरवाही बरतने पर यह जानलेवा भी साबित हो सकती है। यही वजह है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ माता-पिता को बच्चों की सेहत को लेकर हमेशा सतर्क रहने की सलाह देते हैं।
भारत के संदर्भ में बात करें तो देश के विभिन्न हिस्सों में समय-समय पर इसके मामले सामने आते रहते हैं। उदाहरण के तौर पर, कुछ समय पहले केरल राज्य में केवल दो महीने के भीतर ही चिकनपॉक्स के 8,800 से अधिक मामले दर्ज किए गए थे, जिनमें से अधिकांश पीड़ित बच्चे ही थे। हालांकि देश भर का कोई एक केंद्रीय और सटीक राष्ट्रीय आंकड़ा हर साल उपलब्ध नहीं होता, लेकिन विभिन्न राज्यों से मिलने वाली रिपोर्टें बताती हैं कि बच्चों में यह समस्या बेहद आम है।
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विशेषज्ञ की राय: संक्रमण से बचाव क्यों है जरूरी
चिकनपॉक्स के खतरे को लेकर जयपुर के अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट (इंटरनल मेडिसिन) डॉ. रोहित शर्मा का कहना है कि इस बीमारी को लेकर किसी भी तरह की कोताही नहीं बरतनी चाहिए। बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बड़ों के मुकाबले थोड़ी कमजोर होती है, जिस वजह से वे इस वायरस की चपेट में बहुत जल्दी आ जाते हैं।
"चिकनपॉक्स बच्चों में होने वाला एक आम संक्रमण है, लेकिन अगर समय पर इसकी सही देखभाल न की जाए तो यह गंभीर रूप ले सकता है। वैक्सीनेशन और साफ-सफाई इसके बचाव का सबसे मजबूत हथियार हैं।" — डॉ. रोहित शर्मा, सीनियर कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन, अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल, जयपुर
चिकित्सकों का मानना है कि जैसे ही बच्चे के शरीर पर लाल दाणे या फफोले दिखाई दें, तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। कई बार लोग इसे मौसमी फूंसी या साधारण एलर्जी समझकर घरेलू नुस्खे अपनाने लगते हैं, जिससे बच्चे की परेशानी और बढ़ सकती है। सही समय पर मेडिकल सलाह लेने से बीमारी को नियंत्रण में लाने में मदद मिलती है।
चिकनपॉक्स के शुरुआती लक्षण और पहचान
किसी भी बीमारी से समय रहते निपटने के लिए उसके लक्षणों की पहचान होना बहुत जरूरी है। चिकनपॉक्स की शुरुआत आमतौर पर हल्के बुखार, शरीर में दर्द और थकान से होती है। इसके कुछ दिनों बाद बच्चे के चेहरे, छाती और पीठ पर छोटे-छोटे लाल दाने उभरने लगते हैं।
ये लाल दाणे धीरे-धीरे पानी से भरे फफोलों में बदल जाते हैं और उनमें तेज खुजली होती है। खुजली होने की वजह से बच्चे बार-बार उन पर हाथ लगाते हैं, जिससे फफोले फूट सकते हैं और त्वचा पर हमेशा के लिए निशान रह जाने का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, संक्रमण फैलने का डर भी रहता है।
संक्रमित बच्चे को तेज बुखार और कमजोरी महसूस हो सकती है, जिससे उसका किसी भी चीज में मन नहीं लगता। ऐसी स्थिति में बच्चे को पूरी तरह आराम की जरूरत होती है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चे के लक्षणों पर बारीकी से नजर रखें और स्थिति बिगड़ते ही अस्पताल ले जाएं।
संक्रमित बच्चे की सही देखभाल और खानपान
चिकनपॉक्स से पीड़ित बच्चे की देखभाल में साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए। चूंकि यह एक अत्यधिक संक्रामक बीमारी है, इसलिए बच्चे को दूसरे स्वस्थ बच्चों से अलग रखना चाहिए ताकि संक्रमण घर के अन्य सदस्यों में न फैले।
बच्चे के नाखून हमेशा छोटे और साफ रखें ताकि खुजली करते वक्त त्वचा पर जख्म न बने। इसके अलावा, बच्चे को ढीले और सूती कपड़े पहनाएं। कमरे का तापमान सामान्य होना चाहिए ताकि बच्चे को ज्यादा पसीना न आए, जिससे खुजली बढ़ सकती है।
खानपान की बात करें तो बच्चे को हल्का, पचने योग्य और पौष्टिक भोजन देना चाहिए। ओआरएस का घोल, नारियल पानी, फलों का ताजा जूस और पर्याप्त मात्रा में पानी पिलाते रहें ताकि शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) न हो। तैलीय और मसालेदार भोजन से पूरी तरह परहेज करना चाहिए।
वैक्सीनेशन और बचाव के अन्य कारगर उपाय
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, चिकनपॉक्स से बचाव का सबसे पक्का और सुरक्षित तरीका टीकाकरण (Vaccination) है। समय पर टीका लगवाने से बच्चों में इस बीमारी के होने का खतरा न के बराबर रह जाता है। अगर बच्चा संक्रमित हो भी जाता है, तो वैक्सिन के प्रभाव के कारण बीमारी का असर बहुत हल्का होता है।
टीकाकरण के अलावा, व्यक्तिगत स्वच्छता का पालन करना भी बेहद आवश्यक है। बच्चों को बार-बार हाथ धोने की आदत डालें। यदि परिवार में कोई व्यक्ति संक्रमित है, तो उसके इस्तेमाल किए गए तौलिए, कपड़े और बर्तनों को अलग रखना चाहिए।
निष्कर्ष के तौर पर यही कहा जा सकता है कि जरा सी जागरूकता और सतर्कता बरतकर बच्चों को चिकनपॉक्स के गंभीर प्रभावों से बचाया जा सकता है। माता-पिता की थोड़ी सी सावधानी बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा कर सकती है।








