राजधानी दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त को भारत रत्न देने की उठी मांग
देश के मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर इस समय राजनीतिक गलियारों में हलचल काफी तेज हो गई है। एक तरफ जहां विभिन्न विपक्षी दल चुनाव आयोग के फैसलों और एसआईआर (SIR) से जुड़े मामलों को लेकर मुखर हैं और तरह-तरह के सवाल खड़े कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ राष्ट्रवादी संगठनों ने उनके समर्थन में बड़ा मोर्चा खोल दिया है। राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली के प्रमुख इलाके में स्थित हिंदू महासभा भवन के सामने विभिन्न सामाजिक और राष्ट्रवादी संगठनों ने इकट्ठा होकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से नवाजे जाने की पुरजोर मांग की है। इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया और चुनाव आयोग द्वारा उठाए गए कदमों की सराहना की।
प्रदर्शनकारियों का साफ तौर पर कहना था कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने पद की गरिमा और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देते हुए देशहित में कुछ ऐसे साहसिक फैसले लिए हैं, जो लंबे समय से लंबित थे। इस पूरे घटनाक्रम के बाद से राजनीतिक तापमान काफी बढ़ गया है और इस मुद्दे पर पक्ष-विपक्ष के बीच जुबानी जंग भी तेज होती दिखाई दे रही है।
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राष्ट्रवादी संगठनों ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को सौंपा ज्ञापन
प्रदर्शन के दौरान ग्लोबल वैश्य फेडरेशन, यूनाईटेड हिन्दू फ्रंट समेत कई अन्य राष्ट्रवादी संगठनों के प्रमुख पदाधिकारी और कार्यकर्ता भारी संख्या में मौजूद रहे। इन सभी संगठनों ने एकजुट होकर देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के नाम एक औपचारिक ज्ञापन भी सौंपा है। ज्ञापन के माध्यम से सरकार से मांग की गई है कि मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा राष्ट्र हित में दिखाए गए अदम्य साहस और कर्तव्यपालन को देखते हुए उन्हें देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया जाए।
संगठनों के प्रतिनिधियों का कहना था कि प्रशासनिक सेवा में रहते हुए जब कोई अधिकारी बिना किसी दबाव के देश की आंतरिक सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े कड़े फैसले लेता है, तो राष्ट्र को भी उसका समर्थन करना चाहिए। इस ज्ञापन के जरिए उन्होंने केंद्र सरकार से अपने इस मांग पत्र पर गंभीरता से विचार करने का आग्रह किया है ताकि भविष्य में अन्य प्रशासनिक अधिकारियों को भी निष्पक्ष और कड़े फैसले लेने की प्रेरणा मिल सके।
रोहिंग्या और अवैध प्रवासियों के नाम वोटर लिस्ट से हटाने पर घमासान
इस पूरे विवाद की जड़ में वह प्रक्रिया है जिसके तहत मतदाता सूचियों से अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों के नाम हटाए गए हैं। संगठनों के कार्यकारी अध्यक्ष जय भगवान गोयल ने प्रदर्शन के दौरान मीडिया और जनता को संबोधित करते हुए कहा कि देश की सुरक्षा और संसाधनों के लिए अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिक एक बहुत बड़ा खतरा बन चुके थे। उन्होंने आरोप लगाया कि ये लोग देश के संसाधनों पर डाका डाल रहे थे और कई प्रकार की आपराधिक गतिविधियों, ड्रग्स तस्करी तथा राष्ट्रविरोधी षड्यंत्रों में संलिप्त पाए जा रहे थे।
"मुख्य चुनाव आयुक्त ने जिस तरह से वर्षों से अवैध तरीके से भारत में रह रहे रोहिंग्या और विदेशी नागरिकों के नाम एसआईआर के माध्यम से मतदाता सूचियों से कटवाए हैं, वह देश की जनता के लिए एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक कार्य है। ऐसे सख्त और राष्ट्रहितैषी अधिकारियों को सम्मानित किया जाना चाहिए।" — जय भगवान गोयल, कार्यकारी अध्यक्ष, यूनाईटेड हिन्दू फ्रंट
संगठन के नेताओं का यह भी कहना था कि जो लोग देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे थे, उन्हें इस प्रक्रिया से बड़ा झटका लगा है और इसी वजह से आज देश का एक वर्ग चुनाव आयोग के इस कदम की सराहना कर रहा है।
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया और विपक्षी नेताओं पर तीखा हमला
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेदों की खबरों के सामने आने के बाद से ही विपक्षी दलों ने आक्रामक रुख अख्तियार कर रखा है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल समेत कई प्रमुख विपक्षी दलों के नेताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इस्तीफे तक की मांग कर डाली है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि संस्थाओं की स्वायत्तता पर असर पड़ रहा है।
हालांकि, राष्ट्रवादी संगठनों ने विपक्षी दलों के इन आरोपों पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उनका कहना है कि विपक्षी नेता अपनी लगातार चुनावी हार और राजनीतिक विफलताओं को छुपाने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त को निशाना बना रहे हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक दल अपनी वोट बैंक की राजनीति के चलते अवैध प्रवासियों के नाम कटने से बौखलाए हुए हैं और बेवजह चुनाव आयोग को बदनाम करने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं।
आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है सियासत
जिस प्रकार से एक तरफ विपक्ष चुनाव आयोग के फैसलों का विरोध कर रहा है और दूसरी तरफ राष्ट्रवादी संगठन समर्थन में सड़कों पर उतर आए हैं, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा और अधिक तूल पकड़ सकता है। चुनावी सुधारों और मतदाता सूची के पुनरीक्षण जैसे संवेदनशील विषयों पर देश की राजनीति एक बार फिर दो धड़ों में बंटी हुई नजर आ रही है।
विश्लेषकों का मानना है कि प्रशासनिक सुधारों और चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर चल रही यह बहस भारतीय लोकतंत्र के लिए एक नया अध्याय लिख रही है, जहां पारदर्शिता और राष्ट्रीय सुरक्षा सबसे बड़े केंद्र बिंदु बन गए हैं। अब देखना यह होगा कि सरकार और चुनाव आयोग इस राजनीतिक रस्साकशी के बीच अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन किस प्रकार आगे बढ़ाते हैं।



