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बदलते मौसम में डेंगू और मलेरिया का जानलेवा हमला: बुखार उतरने के बाद भी क्यों बना रहता है खतरा? जानें बचाव के उपाय

मौसम बदलते ही देश भर में डेंगू और मलेरिया जैसी वेक्टर जनित बीमारियों का खतरा तेजी से मंडराने लगा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, बुखार उतरने के बाद भी शरीर में हफ्तों तक थकान और कमजोरी बनी रह सकती है, जो आगे चलकर एनीमिया का रूप ले सकती है।
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नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•30 सितंबर 2026 • अपडेटेड•39
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बदलते मौसम में डेंगू और मलेरिया का जानलेवा हमला: बुखार उतरने के बाद भी क्यों बना रहता है खतरा? जानें बचाव के उपाय
📷 बदलते मौसम में डेंगू और मलेरिया का जानलेवा हमला: बुखार उतरने के बाद भी क्यों बना रहता है खतरा? जानें बचाव के उपाय — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • डेंगू का बुखार किसी इंसान से दूसरे इंसान में नहीं फैलता, यह एडीज एजिप्टी मच्छर के काटने से होता है जो मुख्य रूप से दिन के समय काटता है।
  • बुखार कम होने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि खतरा टल गया है; बीमारी के तीसरे से सातवें दिन गंभीर लक्षण उभर सकते हैं।
  • मलेरिया और डेंगू के संक्रमण से लाल रक्त कोशिकाओं और प्लेटलेट्स पर बुरा असर पड़ता है, जिससे शरीर में गंभीर कमजोरी और एनीमिया की शिकायत हो सकती है।

मौसम बदलते ही क्यों बढ़ जाता है डेंगू और मलेरिया का प्रकोप?

जैसे ही मौसम में करवट आती है, हमारे आसपास का वातावरण कई तरह की स्वास्थ्य चुनौतियों का गढ़ बन जाता है। खासकर बारिश के बाद जलजमाव की स्थिति मच्छरों के प्रजनन के लिए सबसे अनुकूल माहौल तैयार करती है। इन दिनों देश के तमाम हिस्सों में डेंगू और मलेरिया के मामलों में उछाल देखा जा रहा है। चिकित्सा विशेषज्ञों का साफ तौर पर कहना है कि थोड़ी सी लापरवाही मरीजों के लिए भारी पड़ सकती है। इन बीमारियों का मुख्य कारण जमे हुए पानी में पनपने वाले खतरनाक मच्छर हैं, जो देखते ही देखते पूरे परिवार को अपनी चपेट में ले लेते हैं।

आम तौर पर लोग यह मानते हैं कि वायरल बुखार कुछ दिनों की दवा से ठीक हो जाता है, लेकिन डेंगू और मलेरिया का मिजाज थोड़ा अलग और ज्यादा खतरनाक होता है। यह सिर्फ एक आम संक्रमण नहीं है, बल्कि शरीर के अंदरूनी तंत्र पर गहरा वार करता है। इसलिए जैसे ही मौसम बदले, हमें अपने आसपास साफ-सफाई को लेकर अत्यधिक सतर्क हो जाने की जरूरत है, ताकि मच्छरों को पनपने का मौका ही न मिले।

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एड़ीस एजिप्टी मच्छर का सच: कैसे फैलता है डेंगू और चिकनगुनिया?

बहुत से लोग इस गलतफहमी में रहते हैं कि डेंगू का बुखार संक्रामक है और एक मरीज से दूसरे स्वस्थ व्यक्ति के संपर्क में आने से फैलता है। लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। डेंगू का प्रसार मुख्य रूप से 'एड़ीस एजिप्टी' नामक मादा मच्छर के काटने से होता है। यही मच्छर डेंगू के साथ-साथ चिकनगुनिया जैसी दर्दनाक बीमारियों को भी बढ़ावा देता है। जब यह मच्छर किसी पहले से संक्रमित व्यक्ति का खून चूसता है, तो वायरस इसके शरीर में चला जाता है और फिर जब यह किसी स्वस्थ इंसान को काटता है, तो उसे भी संक्रमित कर देता है।

इस मच्छर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह रात के बजाय मुख्य रूप से दिन के उजाले में, विशेषकर सुबह और शाम के वक्त सक्रिय रहता है। मच्छर के काटने के लगभग चार से पांच दिन बाद इंसानी शरीर में इसके लक्षण नजर आने शुरू होते हैं। चूंकि यह घरों के आसपास कूलर, जीमेल, टूटे बर्तनों या गमलों में जमे साफ पानी में पनपता है, इसलिए इनसे बचाव के लिए घरेलू स्तर पर खास सावधानी बरतनी बेहद जरूरी हो जाती है।

बुखार उतरने के बाद भी क्यों बनी रहती है हफ्तों तक थकान?

अक्सर लोगों की यह धारणा होती है कि एक बार बुखार उतर गया और थर्मामीटर में तापमान नॉर्मल आ गया, तो समझो जंग जीत ली गई। लेकिन मेडिकल साइंस इससे इत्तेफाक नहीं रखता। डेंगू और मलेरिया से रिकवरी का सफर काफी लंबा होता है। बीमारी के दौरान शरीर की ऊर्जा का स्तर बहुत नीचे गिर जाता है और आंतरिक अंगों पर काफी दबाव पड़ता है। यही वजह है कि बुखार ठीक होने के बाद भी मरीजों को कई हफ्तों तक भारी थकान, बदन दर्द और कमजोरी महसूस होती रहती है।

मलेरिया के मामले में तो स्थिति और भी गंभीर हो सकती है, क्योंकि यह परजीवी संक्रमण सीधे लाल रक्त कोशिकाओं (RBCs) को निशाना बनाता है। कोशिकाओं के टूटने और हीमोग्लोबिन की मात्रा कम होने से शरीर में ऑक्सीजन का संचार बाधित हो जाता है। परिणाम यह होता है कि मरीज धीरे-धीरे एनीमिया यानी खून की कमी का शिकार हो जाता है, जिससे चक्कर आना और सांस फूलने जैसी परेशानियां लंबे समय तक पीछा नहीं छोड़तीं।

बुखार कम होने के बाद के 3 से 7 दिन होते हैं सबसे ज्यादा खतरनाक

स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चेतावनी के अनुसार, डेंगू के मरीजों के लिए बीमारी का तीसरा से सातवां दिन सबसे ज्यादा संवेदनशील और जोखिम भरा होता है। इस दौरान कई बार मरीजों का शरीर का तापमान तो सामान्य होने लगता है, लेकिन अंदर ही अंदर प्लेटलेट्स तेजी से गिरने लगते हैं और रक्त वाहिकाओं से प्लाज्मा लीक होने का खतरा पैदा हो जाता है। यदि इस अवधि के दौरान मरीज या उसके परिजन लापरवाह हो जाएं, तो स्थिति जानलेवा भी साबित हो सकती है।

इस नाजुक दौर में कुछ विशेष लक्षणों पर पैनी नजर रखना अनिवार्य है। यदि मरीज को पेट में अचानक तेज दर्द शुरू हो जाए, लगातार उल्टी आने लगे, सांस बहुत तेजी से चलने लगे या फिर मसूड़ों और नाक से खून आने के संकेत मिलें, तो एक पल भी गंवाए बिना तुरंत अस्पताल का रुख करना चाहिए। खुद से मेडिकल स्टोर से पेनकिलर या एंटीबायोटिक दवाएं लेना इस स्थिति में जहर के समान साबित हो सकता है।

"बदले हुए मौसम में किसी भी तरह के वायरल बुखार को सामान्य समझकर नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। डेंगू और मलेरिया के मामलों में प्लेटलेट्स की गिरावट और आंतरिक कमजोरी से निपटने के लिए संतुलित आहार, भरपूर आराम और समय पर डॉक्टर की सलाह ही सबसे कारगर उपाय है।" — डॉ. आलोक रंजन, वरिष्ठ फिजिशियन

प्लेटलेट्स बढ़ाने के घरेलू नुस्खे और सही खानपान की अहमियत

जब किसी व्यक्ति को डेंगू होता है, तो उसके शरीर में प्लेटलेट्स की संख्या तेजी से घटने लगती है। प्लेटलेट्स का स्तर एक निश्चित सीमा से नीचे जाने पर ब्लीडिंग का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में पारंपरिक रूप से पपीते के पत्तों का जूस पीने की जोरदार सलाह दी जाती है। वैज्ञानिक अनुसंधानों से भी यह बात सामने आई है कि पपीते के पत्तों के अर्क में प्लेटलेट्स काउंट को गिरने से रोकने और उन्हें तेजी से रिकवर करने की अद्भुत क्षमता होती है।

इसके अलावा, मरीज को अपनी डाइट में हाइड्रेशन यानी तरल पदार्थों की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए। नारियल पानी, ओआरएस का घोल, ताजे फलों का जूस और नींबू पानी शरीर में पानी की कमी नहीं होने देते। भारी भोजन के बजाय हल्का और सुपाच्य पौष्टिक आहार लें। पूरी नींद लें और शरीर को मानसिक तथा शारीरिक रूप से रिकवर होने के लिए पर्याप्त समय दें, ताकि संक्रमण का कोई दीर्घकालिक दुष्प्रभाव शरीर पर न रह जाए।

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