मतदाता पुनरीक्षण और फॉर्म-6 को लेकर निर्वाचन आयोग के भीतर छिड़ी बहस
देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले निर्वाचन आयोग के भीतर इन दिनों चुनावी प्रक्रियाओं और नियमों को लेकर आंतरिक खींचतान की खबरें सुर्खियों में हैं। नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए उपयोग किए जाने वाले फॉर्म-6 के साथ एक विशेष घोषणा पत्र संलग्न करने के निर्देश को लेकर आयोग के सर्वोच्च स्तर पर मतभेद होने की चर्चाएं तेज हो गई हैं। हालांकि, इन अटकलों के बीच आयोग के भीतर से जुड़े सूत्रों ने स्पष्ट किया है कि जिन आदेशों के तहत यह प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई थी, उन्हें सभी शीर्ष अधिकारियों की सहमति से ही मंजूरी मिली थी।
लोकतंत्र के महापर्व और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता को सुनिश्चित करने के लिए समय-समय पर नियम और दिशा-निर्देश तय किए जाते हैं। हाल ही में जब देश के कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान की रूपरेखा तैयार की गई, तो उसमें कुछ नए प्रावधानों को शामिल किया गया। इन प्रावधानों को लेकर उपजे विमर्श ने राजनीतिक गलियारों के साथ-साथ प्रशासनिक हलकों में भी खासी हलचल पैदा कर दी है, जिससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या नीतिगत फैसलों पर शीर्ष अधिकारियों के बीच पूरी तरह से एकराय नहीं थी।
संबंधित खबरें
विशेष गहन पुनरीक्षण आदेशों और सर्वसम्मति का दावा
आयोग के सूत्रों से प्राप्त जानकारियों के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों ने बिहार में चलाए गए विशेष गहन पुनरीक्षण, असम के संक्षिप्त पुनरीक्षण और देश के अन्य राज्यों से जुड़े पुनरीक्षण आदेशों पर पूर्ण सहमति जताई थी। सूत्रों का कहना है कि इन सभी महत्वपूर्ण फैसलों को किसी एक व्यक्ति के निर्णय के बजाय सामूहिक रूप से विचार-विमर्श के बाद ही अंतिम रूप दिया गया था। इन आदेशों का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक त्रुटिहीन और पारदर्शी बनाना था ताकि चुनावी प्रक्रिया पर आम नागरिकों का भरोसा और अधिक मजबूत हो सके।
कानूनी और संवैधानिक प्रावधानों के दायरे में रहते हुए ही इन दिशा-निर्देशों को जमीनी स्तर पर लागू करने की रूपरेखा तैयार की गई थी। आयोग से जुड़े अधिकारियों का तर्क है कि देश के विभिन्न हिस्सों में मतदाता सूचियों की शुचिता बनाए रखने के लिए इस तरह के विशेष कदम उठाना अनिवार्य हो जाता है। यही वजह थी कि तमाम राज्यों में एक साथ पुनरीक्षण का कार्य शुरू करने से पहले प्रशासनिक स्तर पर व्यापक चर्चा की गई थी और सभी पक्षों की सहभागिता सुनिश्चित की गई थी।
एनेक्सर-डी और फॉर्म-6 में संशोधन को लेकर क्या है कानूनी स्थिति
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में वह घोषणा पत्र है जिसे नए मतदाताओं को फॉर्म-6 के साथ जमा करना अनिवार्य किया गया है। आयोग द्वारा स्पष्ट किया गया है कि यह घोषणा पत्र रिप्रेजेंटेशन ऑफ पब्लिक एक्ट, 1950 की धारा 21(3) के बिल्कुल अनुरूप है और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी इसे मान्यता प्रदान की जा चुकी है। अधिकारियों का कहना है कि यह घोषणा पत्र मौजूदा फॉर्म-6 में किसी प्रकार का बदलाव नहीं करता है, बल्कि यह एक अतिरिक्त आवश्यकता है जो आवेदक के दावों की सत्यता की पुष्टि करने में मदद करती है।
इसके बावजूद, मीडिया में आई कुछ रिपोर्टों में यह दावा किया गया था कि आयोग के कुछ वरिष्ठ सदस्यों ने ऑनलाइन फॉर्म में इस प्रकार के बदलाव किए जाने पर आपत्ति दर्ज कराई थी। इन रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ अधिकारियों का मानना था कि जब तक विधिवत रूप से मतदाता पंजीकरण नियमों में संशोधन नहीं किया जाता, तब तक इस तरह के अतिरिक्त प्रावधानों को लागू करना कानूनी रूप से उचित नहीं होगा। हालांकि, निर्वाचन आयोग ने इन तमाम अटकलों को खारिज करते हुए अपनी स्थिति को पूरी तरह साफ कर दिया है।
पूर्व चुनाव अधिकारियों की आपत्तियां और आयोग का आधिकारिक रुख
इस आंतरिक चर्चा के दौरान देश के कई पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों और पूर्व चुनाव आयुक्तों के नाम भी सामने आए, जिन्होंने कथित तौर पर नियमों की अनदेखी किए जाने पर चिंता जताई थी। जानकारों का कहना है कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और नियमों की कड़ाई से पालना को लेकर इस तरह के मतभेद अतीत में भी सामने आते रहे हैं। पूर्व अधिकारियों का एक वर्ग यह मानता है कि वैधानिक नियमों में बदलाव किए बिना किसी भी प्रकार की अतिरिक्त औपचारिकता को अनिवार्य नहीं बनाया जाना चाहिए।
दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग ने अपने स्पष्टीकरण में बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि मूल फॉर्म-6 के स्वरूप के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है। आयोग के निर्देशों के मुताबिक, यह अतिरिक्त घोषणा पत्र जिसे 'एनेक्सर-डी' कहा गया है, सिर्फ दावों के समर्थन के लिए एक अलग दस्तावेज के तौर पर लिया जा रहा है। इसी प्रकार, जो मतदाता अपना निर्वाचन क्षेत्र बदलते हैं, उन्हें फॉर्म-8 भरना होता है। आयोग का यह रुख यह साबित करने का प्रयास करता है कि पूरी प्रक्रिया पूरी तरह से कानूनी दायरे के भीतर ही संचालित हो रही है।
लोकतांत्रिक शुचिता और मतदाता सूचियों की पारदर्शिता का महत्व
किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी निष्पक्ष और त्रुटिहीन मतदाता सूची होती है। जब भी निर्वाचन आयोग द्वारा सूचियों के पुनरीक्षण जैसे बड़े कदम उठाए जाते हैं, तो उसमें प्रशासनिक सजगता और राजनीतिक संवेदनशीलता दोनों की आवश्यकता होती है। नए मतदाताओं के पंजीकरण की प्रक्रिया को जितना सरल और सुगम बनाया जाता है, उतना ही यह भी जरूरी होता है कि उसमें किसी भी प्रकार की फर्जीवाड़े की गुंजाइश न बचे।
यही कारण है कि आयोग द्वारा उठाए गए इन कदमों पर देश भर के राजनीतिक दलों और कानूनी विशेषज्ञों की पैनी नजर बनी रहती है। आंतरिक स्तर पर भले ही प्रशासनिक मतभेदों की खबरें बाहर आई हों, लेकिन अंततः संवैधानिक संस्थाओं का यह दायित्व होता है कि वे पूरी पारदर्शिता के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस तरह के विमर्श चुनावी सुधारों की दिशा में किस प्रकार के नए रास्ते खोलते हैं।
"मतदाता सूचियों की शुद्धता और पारदर्शिता हमारी प्राथमिकता है, और सभी नियम कानूनी दायरे के तहत ही लागू किए जाते हैं।" — निर्वाचन आयोग, आधिकारिक बयान




