नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के मुख्य चुनाव आयोग के भीतर फैसलों को लेकर चल रही खींचतान अब खुलकर सामने आने लगी है। हाल ही में यह बात सामने आई है कि आयोग के अंदर महत्वपूर्ण फैसलों पर सभी की राय एक जैसी नहीं होती है। अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग ने इसे 'फैसला लेने की प्रक्रिया का हिस्सा' बताया है। हालांकि, आयोग ने उन मामलों पर सीधी बात नहीं की है जहां दो चुनाव आयुक्तों ने फैसलों पर गंभीर सवाल उठाए थे। इन अंदरूनी मतभेदों के बीच आयोग की कार्यप्रणाली पर राजनीति और चर्चाएं तेज हो गई हैं। आम जनता के मन में भी यह सवाल उठ रहा है कि क्या देश के सबसे बड़े चुनाव निकाय में सब कुछ ठीक चल रहा है।
दूसरी तरफ, चुनाव आयोग ने हाल ही में एसआईआर आदेश को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सर्वसम्मति से मंजूर किए जाने का दावा किया है। सरकारी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस आदेश के तहत अब बूथ लेवल ऑफिसर यानी बीएलओ सीधे मतदाताओं के घर जाएंगे। बीएलओ घर-घर जाकर जरूरी दस्तावेज जमा करेंगे और वोटर लिस्ट की कमियों को दूर करेंगे। यह कदम आगामी चुनावों को पूरी तरह पारदर्शी और साफ-सुथरा बनाने के लिए उठाया गया है। लेकिन जमीनी स्तर पर इस नए अभियान को लेकर लोगों में तरह-तरह की चर्चाएं हैं। कई जगहों पर समय की कमी और दस्तावेजों की जांच को लेकर लोगों को थोड़ी परेशानी का सामना भी करना पड़ रहा है।
आगामी विधानसभा चुनावों की सरगर्मी और राजनीतिक विरोध
आने वाले दिनों में देश के कई राज्यों में चुनाव होने हैं, जिससे राजनीतिक पारा अचानक बहुत चढ़ गया है। एबीपी देशम की रिपोर्ट के मुताबिक, केरल, असम और पुडुचेरी में विधानसभा चुनावों की तैयारियां जोरों पर चल रही हैं। सभी राजनीतिक दल अपनी ताकत झोंक रहे हैं और रैलियों व बैठकों का दौर शुरू हो चुका है। इन राज्यों में चुनावी समीकरण बहुत दिलचस्प हो गए हैं क्योंकि क्षेत्रीय दलों और राष्ट्रीय पार्टियों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल रहा है। चुनाव आयोग की नजर इन सभी गतिविधियों पर बनी हुई है ताकि आचार संहिता का कड़ाई से पालन कराया जा सके। सुरक्षा एजेंसियों को भी पूरी तरह मुस्तैद कर दिया गया है ताकि मतदान शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो सके।
चुनावी माहौल के बीच विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक सरगर्मी पर प्रशासन की कड़ी नजर है। दिल्ली और अन्य इलाकों में हाल ही में हुए कुछ प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की सख्त कार्रवाई देखने को मिली है। सोशल मीडिया और स्थानीय खबरों के अनुसार, सीजेपी के बैनर तले होने वाले कुछ विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए पुलिस ने पहले ही कड़े कदम उठाए। निदर्शन शुरू होने से पहले ही कई जगहों पर लोगों को हिरासत में लिया गया ताकि कानून-व्यवस्था की स्थिति न बिगड़े। चुनाव से ठीक पहले इस तरह की प्रशासनिक सख्ती से यह साफ है कि सरकार और चुनाव आयोग किसी भी तरह की ढील देने के मूड में नहीं हैं।
स्थानीय निकायों और क्षेत्रीय चुनावों में भी बढ़ी हलचल
सिर्फ बड़े विधानसभा चुनाव ही नहीं, बल्कि छोटे स्तर के संगठनों और यूनियनों के चुनावों में भी गहमागहमी चरम पर है। तेलुगु360 की रिपोर्ट के अनुसार, आंध्र प्रदेश में एपीएसआरटीसी यूनियन के चुनाव होने जा रहे हैं। इन चुनावों में कुल 12 अलग-अलग संघ आमने-सामने हैं और जीत हासिल करने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं। राज्यभर के कर्मचारियों में इन चुनावों को लेकर भारी उत्साह देखा जा रहा है। एक तरफ जहां बड़े राजनीतिक दल अपनी रणनीति बना रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कर्मचारी यूनियनों के ये चुनाव यह तय करेंगे कि श्रमिकों के बीच किसकी पकड़ ज्यादा मजबूत है।
इन सभी घटनाओं से यह साफ हो जाता है कि देश का चुनावी तंत्र इस समय बेहद व्यस्त दौर से गुजर रहा है। चाहे वह केंद्रीय चुनाव आयोग के अंदरूनी फैसले हों, घर-घर जाकर दस्तावेजों की जांच का काम हो, या फिर राज्यों में होने वाले चुनाव, हर मोर्चे पर हलचल तेज है। आम नागरिक से लेकर राजनीतिक दलों तक सभी की निगाहें चुनाव आयोग के अगले कदमों पर टिकी हुई हैं। 'द फ्रीलान्स' की टीम इन सभी गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए हुए है और जमीनी सच आप तक पहुंचाती रहेगी, ताकि चुनावी प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता बनी रहे।



