राजनीतिक गलियारों में जब अति आत्मविश्वास बन गया हार की वजह
चुनावी माहौल में जीत का दावा करना और अपने समर्थकों में जोश भरना नेताओं की पुरानी आदत है। लेकिन कई बार यह अति आत्मविश्वास किसी बड़े झटके में बदल जाता है। कुछ ऐसा ही नजारा तब देखने को मिला जब मतगणना के शुरुआती दौर में कुछ प्रत्याशियों ने अपनी जीत को लेकर इस हद तक आश्वस्त मान लिया कि उन्होंने नतीजे आने से पहले ही जश्न की तमाम तैयारियां मुकम्मल कर ली थीं। राजनीतिक मंचों से लेकर चुनावी कार्यालयों तक बस जीत के औपचारिक ऐलान का इंतजार बाकी था।
गणेश चतुर्थी का पावन पर्व होने के कारण इस बार चुनावी परिणामों के साथ-साथ त्योहार का डबल उत्साह देखने की उम्मीद थी। यही वजह थी कि बाजारों में विशेष तौर पर मोदक और तरह-तरह की मिठाइयों की भारी डिमांड बनी हुई थी। कई प्रत्याशियों ने तो पहले से ही प्रतिष्ठित हलवाइयों के यहां भारी-भरकम एडवांस बुकिंग करा रखी थी ताकि नतीजों के आते ही समर्थकों का मुंह मीठा कराया जा सके। आतिशबाजी के लिए बड़े पैमाने पर पटाखों के ऑर्डर भी बुक किए जा चुके थे।
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राउंड-दर-राउंड बदलते आंकड़ों ने पलटी पूरी बाजी
सुबह जब ठीक आठ बजे वोटों की गिनती शुरू हुई, तो शुरुआती रुझानों ने कुछ देर के लिए शुरुआती बढ़त पाने वाले प्रत्याशियों की उम्मीदों को पंख लगा दिए। इन शुरुआती आंकड़ों को देखकर ऐसा लगा मानो मुकाबला एकतरफा हो चुका है और जीत की औपचारिकता भर बाकी है। इसी असमंजस और जल्दबाजी में जश्न का सामान जुटाने की होड़ शुरू हो गई। समर्थकों ने ढोल-नगाड़े और फूल-मालाओं का इंतजाम भी अपने स्तर पर करना शुरू कर दिया था।
लेकिन लोकतंत्र की यह खासियत रही है कि यहां अंतिम ईवीएम खुलने तक कुछ भी पक्का नहीं होता। जैसे-जैसे मतगणना के अगले राउंड आगे बढ़े, चुनावी समीकरण तेजी से बदलने लगे। जो प्रत्याशी शुरुआती बढ़त के आधार पर जीत के प्रति पूरी तरह आश्वस्त थे, वे अचानक पिछड़ने लगे। कुछ सीटों पर तो फासला इतना उलट-फेर भरा था कि मजबूत माने जा रहे उम्मीदवार लगातार नीचे खिसकते चले गए और उनके प्रतिद्वंद्वी बढ़त बनाते गए।
अचानक बंद हो गए ढोल-नगाड़े और रद्द हुए मिठाइयों के ऑर्डर
जैसे-जैसे दिन ढलता गया और तस्वीर साफ होने लगी, मतगणना केंद्रों के बाहर खड़े समर्थकों और खुद प्रत्याशियों के चेहरों के रंग उड़ने लगे। जिन चेहरों पर सुबह मुस्कान और उत्साह था, वहां अब मायूसियां छाने लगी थीं। हार की आहट मिलते ही सबसे पहले उस तामझाम को रोकने की कवायद शुरू हुई, जो जीत के जश्न के लिए जुटाया गया था। आनन-फानन में प्रत्याशियों के सहयोगियों ने हलवाइयों को फोन घुमाने शुरू किए और बड़े ऑर्डर रद्द कराने पड़े।
कई हलवाइयों के यहां मिठाइयां बनाने की तैयारी शुरू हो चुकी थी और कच्चा माल भी आ गया था, लेकिन अचानक आए इस यू-टर्न ने सब कुछ रोक दिया। जिन डिब्बों में जीत की मिठास जानी थी, वे कारीगरों की दुकानों पर ही धरे के धरे रह गए। पटाखा कारोबारियों से भी माल वापस लेने की मिन्नतें की जाने लगीं, क्योंकि अब जश्न के बजाय हार के सन्नाटे से निपटने की चिंता सताने लगी थी।
खामोशी से मतगणना स्थल छोड़कर निकले कई दिग्गज
चुनावी मैदान में हार-जीत सियासी सफर का हिस्सा होती है, लेकिन इस तरह की परिस्थितियां प्रत्याशियों के लिए मानसिक रूप से बेहद कठिन साबित होती हैं। जब यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि बाजी हाथ से निकल चुकी है, तो कई दिग्गजों ने मीडिया से दूरी बनाते हुए बिना किसी शोर-शराबे के मतगणना स्थल छोड़ना ही बेहतर समझा। उनके साथ आए गिने-चुने समर्थक भी सिर झुकाए खामोशी से गाड़ी में बैठकर रवाना हो गए।
विशेषज्ञों का मानना है कि राजनीति में कभी भी अति उत्साह घातक साबित हो सकता है। मतगणना के दौरान अंतिम परिणाम आने तक संयम बरतना ही असली राजनीतिक परिपक्वता की पहचान है। जिन लोगों ने पहले से जश्न की तैयारियां कर रखी थीं, उन्हें इस घटना से एक कड़ा सबक जरूर मिला होगा कि राजनीति में पल-पल में पासा पलट सकता है।
"राजनीति अनिश्चितताओं का खेल है, जहां आखिरी वोट की गिनती पूरी होने तक किसी भी नतीजे को अंतिम नहीं माना जा सकता। अति आत्मविश्वास अक्सर बड़ी निराशा का कारण बनता है।" — वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक
यह पूरा वाकया इस बात का जीवंत उदाहरण है कि चुनावी जंग में मैदान पर उतरने वाले योद्धाओं को हमेशा हरसंभव परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए। चाहे जीत का कितना भी भरोसा क्यों न हो, जब तक आधिकारिक परिणाम घोषित न हो जाएं, तब तक संयम और धैर्य ही सबसे बड़ा हथियार साबित होता है।







