बढ़ती उम्र के साथ शरीर में छिपे खतरों को पहचानें
जीवन की भागदौड़ और कामकाजी व्यस्तता के बीच अक्सर महिलाएं अपनी सेहत को सबसे आखिर में रखती हैं। जैसे-जैसे उम्र तीस के आंकड़े को पार करती है, शरीर की अंदरूनी कार्यप्रणाली में कई तरह के सूक्ष्म बदलाव आने शुरू हो जाते हैं। विडंबना यह है कि इनमें से अधिकांश परिवर्तन शुरुआती दौर में कोई स्पष्ट चेतावनी या लक्षण नहीं देते हैं। ब्लड शुगर के स्तर में उतार-चढ़ाव हो, कोलेस्ट्रॉल का बढ़ना हो या फिर हीमोग्लोबिन और थायरॉइड का असंतुलन, ये सभी बीमारियां शरीर के भीतर चुपचाप अपनी जड़ें जमाती रहती हैं। यही वजह है कि मेडिकल एक्सपर्ट्स अब इस बात पर जोर दे रहे हैं कि महिलाओं को केवल बीमार पड़ने पर डॉक्टर के पास जाने के बजाय नियमित अंतराल पर एहतियातन स्वास्थ्य जांच करवानी चाहिए।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि हर महिला के लिए एक जैसे टेस्ट कराना अनिवार्य नहीं होता। जांच का यह दायरा हर व्यक्ति की जीवनशैली, पारिवारिक मेडिकल हिस्ट्री, शारीरिक वजन, मासिक धर्म चक्र और गर्भधारण के इतिहास पर निर्भर करता है। हालांकि, कुछ बुनियादी स्वास्थ्य परीक्षण ऐसे हैं जिन्हें तीस साल की उम्र के बाद हर महिला को अपनी सालाना मेडिकल चेकलिस्ट में जरूर शामिल करना चाहिए। नोएडा स्थित फोर्टिस अस्पताल के वरिष्ठ एंडोक्रिनोलॉजिस्ट डॉ. राकेश कुमार प्रसाद ने महिलाओं के लिए ऐसे ही छह बेहद महत्वपूर्ण ब्लड टेस्ट के बारे में विस्तार से समझाया है, जो कई गंभीर बीमारियों को समय रहते रोकने में मददगार साबित हो सकते हैं।
संबंधित खबरें
डायबिटीज से बचाव के लिए ब्लड शुगर और HbA1c की जांच
आज के दौर में डायबिटीज एक बेहद आम लेकिन खतरनाक बीमारी बन चुकी है, जो शुरुआत में बिना किसी स्पष्ट लक्षण के शरीर को खोखला करती रहती है। सामान्य तौर पर फास्टिंग ब्लड शुगर उस समय खून में मौजूद ग्लूकोज की मात्रा बताता है, जबकि HbA1c टेस्ट पिछले दो से तीन महीनों के दौरान शरीर में औसत ब्लड शुगर के स्तर की सटीक जानकारी देता है। साल 2026 के अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन के तय मानकों के मुताबिक, सामान्य जोखिम वाली महिलाओं में भी डायबिटीज की नियमित स्क्रीनिंग 35 वर्ष की आयु से शुरू कर दी जानी चाहिए।
हालांकि, यदि किसी महिला का वजन ज्यादा है, परिवार में शुगर की बीमारी का पुराना इतिहास रहा है, पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम यानी PCOS की समस्या है, या फिर उच्च रक्तचाप की शिकायत है, तो उन्हें इस उम्र से पहले भी डॉक्टर की सलाह पर यह जांच करवा लेनी चाहिए। गर्भावस्था के दौरान जिन महिलाओं को शुगर की हल्की सी भी शिकायत रही हो, उनके लिए भी भविष्य में नियमित अंतराल पर ब्लड शुगर की जांच कराना बेहद जरूरी माना जाता है ताकि समय रहते उचित कदम उठाए जा सकें।
हार्ट हेल्थ के लिए लिपिड प्रोफाइल टेस्ट क्यों है जरूरी
दिल की सेहत का सीधा संबंध हमारे खून में मौजूद कोलेस्ट्रॉल की मात्रा से होता है। लिपिड प्रोफाइल टेस्ट के जरिए शरीर में एलडीएल यानी खराब कोलेस्ट्रॉल, एचडीएल यानी अच्छे कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड्स और कुल कोलेस्ट्रॉल के स्तर का आकलन किया जाता है। खून में बढ़ा हुआ एलडीएल कोलेस्ट्रॉल लंबे समय तक नसों और धमनियों की दीवारों पर प्लाक के रूप में जमा होता रहता है, जिससे आगे चलकर दिल का दौरा यानी हार्ट अटैक और ब्रेन स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ के आंकड़े बताते हैं कि बढ़ा हुआ खराब कोलेस्ट्रॉल दुनिया भर में लाखों मौतों का एक बड़ा और प्रत्यक्ष कारण बनता है। हैरानी की बात यह है कि शुरुआती चरणों में बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल किसी भी प्रकार के बाहरी लक्षण को जन्म नहीं देता है। इसलिए, तीस साल की उम्र पार कर चुकी हर महिला को अपने लिपिड प्रोफाइल की जांच सालाना आधार पर जरूर करवानी चाहिए ताकि हृदय संबंधी जोखिमों को पहले ही भांपकर खानपान और जीवनशैली में जरूरी बदलाव किए जा सकें।
CBC और हीमोग्लोबिन से करें एनीमिया का समय पर इलाज
महिलाओं में खून की कमी यानी एनीमिया की समस्या बेहद आम है, लेकिन इसे अक्सर साधारण थकान मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। पीरियड्स के दौरान होने वाले अत्यधिक रक्तस्राव की वजह से कई महिलाओं के शरीर में आयरन का स्तर तेजी से गिरने लगता है। कंप्लीट ब्लड काउंट यानी सीबीसी टेस्ट के जरिए न सिर्फ हीमोग्लोबिन के स्तर की जानकारी मिलती है, बल्कि लाल और सफेद रक्त कोशिकाओं तथा प्लेटलेट्स की सेहत का भी पूरा हिसाब-किताब सामने आ जाता है।
यदि किसी महिला को लगातार अत्यधिक थकान महसूस होती है, हमेशा कमजोरी बनी रहती है, चक्कर आते हैं या फिर थोड़ा सा चलने पर सांस फूलने लगती है, तो उसे तुरंत अपनी सीबीसी जांच करवानी चाहिए। जिन महिलाओं में एनीमिया की पुष्टि हो जाती है, उन्हें डॉक्टर की सलाह पर फेरिटिन और आयरन प्रोफाइल की विस्तृत जांच भी करवानी चाहिए ताकि शरीर में आयरन के भंडार और उसकी उपयोगिता की सही स्थिति का पता चल सके और समय रहते उचित दवा या सप्लीमेंट्स शुरू किए जा सकें।
थायरॉइड असंतुलन से निपटने के लिए TSH टेस्ट
शरीर के मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित करने में थायरॉइड हार्मोन की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है। इसमें होने वाला थोड़ा सा भी उतार-चढ़ाव महिलाओं के वजन, मासिक धर्म के चक्र, शरीर की ऊर्जा, नींद के पैटर्न और प्रजनन स्वास्थ्य को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। हालांकि, सिर्फ उम्र बढ़ने के आधार पर हर महिला के लिए हर साल टीएसएच टेस्ट करवाना जरूरी नहीं माना जाता है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में डॉक्टर इसकी सख्त सलाह देते हैं।
यदि परिवार में किसी को थायरॉइड की बीमारी रही हो, मासिक धर्म अचानक अनियमित होने लगे, बिना किसी साफ वजह के वजन तेजी से घटने या बढ़ने लगे, बहुत ज्यादा सुस्ती या थकान महसूस हो, या फिर गर्भधारण की योजना हो, तो TSH की जांच अवश्य करवानी चाहिए। थायरॉइड की समय पर पहचान होने से हार्मोनल असंतुलन के कारण होने वाली कई अन्य शारीरिक परेशानियों से आसानी से बचा जा सकता है और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाए रखा जा सकता है।
किडनी और लिवर के स्वास्थ्य की निगरानी
किडनी हमारे शरीर का वह अहम फिल्टर है जो खून से गंदगी को बाहर निकालता है। किडनी फंक्शन टेस्ट के तहत क्रिएटिनिन और ईजीएफआर जैसी जांचें की जाती हैं, जिससे यह पता चलता है कि गुर्दे अपनी पूरी क्षमता से काम कर रहे हैं या नहीं। जिन महिलाओं को पहले से डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या किडनी की पुरानी बीमारी है, अथवा जो लंबे समय से किसी विशेष दवा का सेवन कर रही हैं, उनके लिए यह जांच बेहद आवश्यक है। प्रारंभिक चरण में किडनी की बीमारियां भी बिना किसी लक्षण के चुपचाप बढ़ती हैं, इसलिए समय पर जांच ही इसका सबसे बड़ा बचाव है।
इसके अलावा, लिवर फंक्शन टेस्ट यानी एलएफटी के जरिए लिवर की सेहत का प्राथमिक आकलन किया जाता है। इसमें एएलटी, एएसटी और बिलिरुबिन जैसे मापदंडों की जांच होती है। आज की जीवनशैली में मोटापा, अनियंत्रित डायबिटीज, शरीर में बढ़ा हुआ ट्राइग्लिसराइड, अत्यधिक शराब का सेवन या बिना डॉक्टर की सलाह के पेनकिलर जैसी दवाओं का लंबे समय तक इस्तेमाल लिवर पर भारी पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में समय रहते लिवर की जांच करवाकर किसी भी बड़े खतरे को टाला जा सकता है।
"उम्र के इस पड़ाव पर महिलाओं के शरीर में कई अंदरूनी बदलाव चुपचाप चल रहे होते हैं। समय रहते सही ब्लड टेस्ट करवाने से न केवल गंभीर बीमारियों की आशंका कम होती है, बल्कि एक स्वस्थ और सक्रिय जीवन जीने का मार्ग भी प्रशस्त होता है।" — डॉ. राकेश कुमार प्रसाद, सीनियर कंसल्टेंट, एंडोक्रिनोलॉजी, फोर्टिस, नोएडा








