चुनाव से पहले ईवीएम की सुरक्षा और विश्वसनीयता पर बड़ा कदम
लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व यानी चुनावों को निष्पक्ष, पारदर्शी और पूरी तरह त्रुटिहीन बनाने के लिए भारतीय निर्वाचन आयोग ने अपनी तैयारियों को बेहद पुख्ता करना शुरू कर दिया है। मतदान प्रक्रिया की रीढ़ मानी जाने वाली इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम की विश्वसनीयता को लेकर आयोग हमेशा से बेहद गंभीर रहा है। इसी कड़ी में चुनाव की तारीखों के ऐलान से पहले और चुनावी राज्यों तथा जिलों में मशीनों की 'फर्स्ट लेवल चेकिंग' यानी एफएलसी (First Level Checking) की प्रक्रिया जोर-शोर से शुरू हो चुकी है। इस चरण के तहत जिला प्रशासन के पास पहले से मौजूद और नई आई सभी ईवीएम और वीवीपैट मशीनों की तकनीकी और भौतिक रूप से बारीकी से जांच की जा रही है।
जिला निर्वाचन कार्यालयों और स्थानीय प्रशासन द्वारा निर्वाचन गोदाम परिसरों में इसके लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं। देश के कई हिस्सों में शुरू हुई इस प्रक्रिया में तकनीकी विशेषज्ञों की टीमें पूरी मुस्तैदी के साथ जुटी हुई हैं। चुनाव आयोग की गाइडलाइंस के मुताबिक, किसी भी चुनाव से पहले यह सुनिश्चित करना बेहद जरूरी होता है कि मतदान में इस्तेमाल होने वाली हर एक मशीन पूरी तरह सुरक्षित, सटीक और किसी भी बाहरी हस्तक्षेप या तकनीकी खामी से मुक्त हो। एफएलसी इसी दिशा में उठाया जाने वाला सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम है, जिसके पूरा होने के बाद ही चुनाव की अगली रणनीतिक और मैदानी तैयारियां आगे बढ़ती हैं।
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विशेष इंजीनियरों की देखरेख में होती है मशीनों की तकनीकी जांच
ईवीएम की फर्स्ट लेवल चेकिंग कोई साधारण जांच नहीं है, बल्कि यह एक बेहद उच्च तकनीकी प्रक्रिया है। इसके लिए भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ECIL) जैसी अधिकृत निर्माण कंपनियों के विशेष प्रशिक्षित इंजीनियरों और मास्टर ट्रेनर को मैदान में उतारा जाता है। ये विशेषज्ञ इंजीनियर हर एक बैलेट यूनिट, कंट्रोल यूनिट और वीवीपैट मशीन को खोलकर उसके अंदरूनी कलपुर्जों, सॉफ्टवेयर, मदरबोर्ड और डिस्प्ले की गहराई से जांच करते हैं।
जांच के दौरान इंजीनियर यह सुनिश्चित करते हैं कि मशीन के सभी सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर घटक पूरी तरह सुरक्षित और मानक के अनुसार काम कर रहे हैं या नहीं। यदि जांच के दौरान किसी भी मशीन में जरा सी भी तकनीकी खराबी, बटन काम न करने की समस्या या डिस्प्ले में गड़बड़ी पाई जाती है, तो उसे तुरंत चिन्हित कर लिया जाता है। इन तकनीकी विशेषज्ञों की देखरेख में मशीनों की मॉक पोलिंग भी कराई जाती है ताकि यह परखा जा सके कि बटन दबाने पर सही और सटीक वोट दर्ज हो रहा है या नहीं।
दोषपूर्ण और खराब ईवीएम को चुनाव प्रक्रिया से किया जाता है बाहर
आम जनता के मन में अक्सर यह सवाल रहता है कि क्या चुनाव में पुरानी या खराब मशीनों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है? इसका जवाब निर्वाचन आयोग की बेहद सख्त नीतियों में छिपा है। एफएलसी प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य ही यही है कि तकनीकी रूप से जरा भी संदिग्ध या दोषपूर्ण पाई जाने वाली मशीनों को मुख्य चुनावी प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर कर दिया जाए। जांच के बाद जो मशीनें सभी मानकों पर शत-प्रतिशत खरी उतरती हैं, केवल उन्हीं को सील करके सुरक्षित स्ट्रांग रूम में रखा जाता है।
जो मशीनें तकनीकी जांच में असफल साबित होती हैं या जिनके किसी घटक में कोई भी खराबी निकलती है, उन्हें तुरंत लाल सील के साथ अलग कर दिया जाता है। इन दोषपूर्ण मशीनों को नियमों के अनुसार सुरक्षित गोदामों में अलग रखा जाता है और इनका उपयोग किसी भी मतदान केंद्र पर नहीं किया जाता है। इसके बाद निर्माता कंपनियों के इंजीनियर इन मशीनों को सुधारने के लिए कारखाने वापस भेजते हैं या फिर आयोग के नियमों के तहत उनका सुरक्षित निपटान किया जाता है, ताकि मतदान की निष्पक्षता पर किसी भी प्रकार का आंच न आए।
राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी और पारदर्शी वीडियोग्राफी
चुनाव प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष बनाए रखने के लिए निर्वाचन आयोग यह सुनिश्चित करता है कि एफएलसी की पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बरती जाए। इस पूरी कार्रवाई को न केवल प्रशासनिक अधिकारियों की पैनी नजर में किया जाता है, बल्कि इसकी हर गतिविधि की हाई-डेफिनिशन वीडियोग्राफी भी कराई जाती है। इसके अलावा, जिला निर्वाचन अधिकारियों द्वारा सभी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के अधिकृत प्रतिनिधियों को पहले से ही इस प्रक्रिया की लिखित सूचना दी जाती है।
राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि निर्वाचन गोदाम परिसर में स्वयं बैठकर इस पूरी जांच प्रक्रिया का मुआयना करते हैं। वे अपनी आंखों से देखते हैं कि कैसे इंजीनियर मशीनों की जांच कर रहे हैं और सीलिंग की जा रही है। इस दौरान पूरी पारदर्शिता के साथ मशीनों के सीरियल नंबर और अन्य विवरण दर्ज किए जाते हैं, जिन्हें निर्वाचन आयोग के आधिकारिक पोर्टल पर भी अपलोड किया जाता है। सभी दलों के प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर के बाद ही मशीनों को अगले चरण के लिए अधिकृत माना जाता है।
"निर्वाचन आयोग के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के तहत समय-समय पर ईवीएम की फर्स्ट लेवल चेकिंग की प्रक्रिया पूरी की जाती है। इस दौरान मशीनों की तकनीकी दक्षता को परखा जाता है और सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में पूरी पारदर्शिता बरती जाती है ताकि चुनाव प्रक्रिया पर आम जनता का विश्वास और अधिक मजबूत हो सके।" — जिला निर्वाचन अधिकारी एवं प्रशासनिक प्रवक्ता
फर्स्ट लेवल चेकिंग के बाद आगे की चुनावी प्रक्रिया का रोडमैप
ईवीएम की फर्स्ट लेवल चेकिंग सफलतापूर्वक पूरी हो जाने के बाद, उपयोग के योग्य पाई गई सभी मशीनों को सुरक्षित तरीके से सील कर दिया जाता है। इसके बाद चुनावी प्रक्रिया का अगला चरण शुरू होता है, जिसमें राजनीतिक दलों की उपस्थिति में मशीनों का पहला रैंडमइजेशन किया जाता है। इस रैंडमइजेशन के जरिए यह तय किया जाता है कि कौन सी ईवीएम किस विधानसभा क्षेत्र और किस मतदान केंद्र पर भेजी जाएगी।
प्रशासन की इन पुख्ता तैयारियों से यह साफ हो जाता है कि आने वाले विधानसभा चुनावों को शांतिपूर्ण, पारदर्शी और निष्पक्ष ढंग से संपन्न कराने के लिए निर्वाचन आयोग पूरी तरह मुस्तैद है। आम नागरिकों के लिए भी यह जानना जरूरी है कि उनकी एक-एक वोट कीमती है और जिस मशीन के जरिए वे मतदान करते हैं, वह कई स्तर की कड़ी तकनीकी जांच और सुरक्षा घेरे से गुजरकर उनके सामने आती है।





