सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां द्वारा मतदाता सूची के SIR (Special Intensive Revision) को लेकर दिए गए बयान के बाद देश के पूर्व जजों और कानूनी दिग्गजों के बीच तीखी बहस छिड़ गई है। इस संवेदनशील मुद्दे पर न्यायपालिका के पूर्व चेहरे दो स्पष्ट खेमों में बंटते नजर आ रहे हैं। एक तरफ जहां इसे न्यायिक मर्यादा का उल्लंघन माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा से जुड़ा अहम बयान बताया जा रहा है।
नाल्सार यूनिवर्सिटी के भाषण से शुरू हुआ विवाद
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब जस्टिस उज्जल भुइयां ने हैदराबाद की नाल्सार यूनिवर्सिटी में एक कार्यक्रम को संबोधित किया था। अपने भाषण के दौरान उन्होंने कहा था कि लाखों भारतीय नागरिकों को वोट के अधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया मनमानी है और संविधान नागरिकों को दो वर्गों में नहीं बांटता है। चूंकि SIR का मामला इस समय खुद सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, इसलिए इस पर सार्वजनिक मंच से टिप्पणी किए जाने को लेकर कानूनी गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
पूर्व सीजेआई बीआर गवई और 42 पूर्व जजों की कड़ी आपत्ति
बयान की आलोचना करने वाले न्यायविदों का मुख्य तर्क यह है कि किसी विचाराधीन मामले पर सार्वजनिक बयान देना 'जुडिशियल प्रोप्राइटी' (Judicial Propriety) यानी न्यायिक मर्यादा के खिलाफ है। भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश रह चुके जस्टिस बीआर गवई ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते ہوئے कहा कि न्यायिक मर्यादा किसी भी सिटिंग जज को ऐसे मामले पर सार्वजनिक टिप्पणी करने की अनुमति नहीं देती, जो अदालत में लंबित हो।
इसके साथ ही, दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस एस. एन. ढींगरा और जस्टिस आर. एस. सोढ़ी ने भी इस बयान की परिपक्वता पर सवाल उठाए। इस बीच, 42 पूर्व जजों ने एक खुला पत्र जारी कर चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का समर्थन किया है। सीनियर एडवोकेट हरीश साल्वे ने भी कहा कि जजों को सिर्फ अपने फैसलों के माध्यम से बोलना चाहिए, न कि समसामयिक या विचाराधीन मामलों पर सार्वजनिक रूप से।
जस्टिस अभय एस ओक और अन्य ने किया समर्थन
दूसरी तरफ, जस्टिस भुइयां के समर्थन में भी कई बड़े नाम सामने आए हैं। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय एस. ओक खुलकर उनके बचाव में आए हैं। उनका कहना है कि बड़े पैमाने पर वोटरों के मताधिकार छिनने के खिलाफ आवाज उठाने में कुछ भी गलत नहीं है। जस्टिस ओका के मुताबिक, हालांकि किसी लंबित मामले के गुण-दोष पर टिप्पणी करना गलत हो सकता है, लेकिन जस्टिस भुइयां के भाषण में ऐसा कुछ नहीं था और उन्होंने कोई न्यायिक अनुचित काम नहीं किया है।
पूर्व कानून मंत्री और सीनियर एडवोकेट डॉ. अश्वनी कुमार ने भी इस टिप्पणी की सराहना करते हुए इसे देश की अंतरात्मा की आवाज बताया। वहीं, राज्यसभा सांसद और सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने जस्टिस भुइयां को न्यायपालिका के सबसे सम्मानित और बेबाक व्यक्तियों में से एक करार दिया है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और रिपोर्टों के आधार पर तैयार इस खबर के दावों की सत्यता की 'The Freelance' स्वतंत्र रूप से पुष्टि करता है। यह मामला वर्तमान में कानूनी और सार्वजनिक चर्चा का विषय बना हुआ है।
नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
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