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देशपढ़ने में समय: 3 मिनट

शिवसेना सिंबल विवाद: सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के फैसले पर तीखी बहस, जानिए क्या दिए गए तर्क

सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न (तीर-कमान) विवाद पर सुनवाई जारी है। चुनाव आयोग के फैसले का समर्थन करते हुए वरिष्ठ वकीलों ने पार्टी के संविधान और आंतरिक लोकतंत्र से जुड़े कई अहम कानूनी पहलू रखे।
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नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•7 अक्टूबर 2026 • अपडेटेड•41
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शिवसेना सिंबल विवाद: सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के फैसले पर तीखी बहस, जानिए क्या दिए गए तर्क
📷 शिवसेना सिंबल विवाद: सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के फैसले पर तीखी बहस, जानिए क्या दिए गए तर्क — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना के तीर-कमान सिंबल विवाद पर सुनवाई कल दोपहर 2 बजे तक के लिए टली।
  • वरिष्ठ वकील एन.के. कौल ने चुनाव आयोग के फैसले के पक्ष में दीं मजबूत कानूनी दलीलें।
  • पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र और 2011-2018 के संविधान संशोधनों पर कोर्ट में हुई चर्चा।

देश की सियासत में भूचाल लाने वाले शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न (तीर-कमान) विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। इस हाई-प्रोफाइल मामले में चुनाव आयोग के फैसले का बचाव करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एन.के. कौल ने अदालत के सामने कई महत्वपूर्ण कानूनी और संवैधानिक बिंदु रखे। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सुनवाई कल दोपहर 2 बजे तक के लिए स्थगित कर दी है।

पार्टी का संविधान और आंतरिक लोकतंत्र का मुद्दा

सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट एन.के. कौल ने 'अर्जुन सिंह' मामले के फैसले का हवाला देते हुए राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र की अनिवार्यता पर जोर दिया। उन्होंने दलील दी कि 1990 के दशक से ही चुनाव आयोग का यह नियम और अभ्यास रहा है कि वह सभी दलों से यह सुनिश्चित करने को कहता है कि उनका पार्टी संविधान लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुकूल हो।

कौल ने कोर्ट को बताया कि साल 2011 में शिवसेना ने खुद लोकतांत्रिक सिद्धांतों के तहत अपने संविधान में बदलाव किए थे। इसके बाद 2018 में भी संशोधन किए गए, लेकिन चुनाव आयोग के आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक, पार्टी ने 2018 के संशोधित संविधान की प्रति कभी आयोग को सौंपी ही नहीं थी। इस बात का कोई सबूत नहीं है कि 2011 के बाद का कोई दस्तावेज विधिवत रूप से जमा कराया गया हो।

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चुनाव आयोग की निष्पक्षता और अदालत का रुख

याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब देते हुए वरिष्ठ वकील ने कहा कि चुनाव आयोग पूरी तरह से निष्पक्ष और वैध संवैधानिक प्राधिकरण है, जिस पर देश की जनता का अटूट भरोसा है। उन्होंने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया कि आयोग का फैसला किसी पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू किया गया है।

बेंच के जस्टिस जे. बागची ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा कि कई पुराने फैसले 10वीं अनुसूची (एंटी-डिफेक्शन लॉ) के संशोधन से पहले के हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह सीधे तौर पर चुनाव आयोग के फैसले के 'गुण-दोष' पर दखल नहीं दे सकती, लेकिन फैसले तक पहुंचने की प्रक्रिया और समीक्षा की कानूनी वैधता को जरूर परखा जाएगा।

डिस्क्लेमर एवं साभार

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और आधिकारिक अदालत की कार्यवाही से जुड़े इस विवाद की खबरों की 'The Freelance' स्वतंत्र रूप से प्रस्तुत करता है। यह मामला देश की राजनीति में व्यापक चर्चा का विषय बना हुआ है।

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