भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार और विदेशी निवेशकों के बीच क्यों टूट रहा है पुराना नाता?
देश की अर्थव्यवस्था इस समय दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है। इसके बावजूद, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) का रुख भारतीय शेयर बाजार के प्रति ठंडा पड़ता जा रहा है। वित्तीय बाजारों के जानकारों और ग्लोबल ब्रोकरेज फर्मों के आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं कि जीडीपी (GDP) के मजबूत आंकड़े अब विदेशी पूंजी को आकर्षित करने की गारंटी नहीं रह गए हैं। पिछले दो वर्षों के दौरान भारतीय शेयर बाजारों से लगभग 40 अरब डॉलर यानी करीब ₹3.84 लाख करोड़ की भारी-भरकम पूंजी बाहर निकाली जा चुकी है। इस निकासी ने नीति निर्माताओं और बाजार विश्लेषकों के सामने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर विकास के रथ पर सवार देश से विदेशी निवेशक इतनी बड़ी मात्रा में पैसे क्यों खींच रहे हैं?
ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन रिसर्च की हालिया रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि भारत में निवेश लाने वाले पुराने और पारंपरिक कारक अब उतने असरदार नहीं रहे हैं। साल 2007 तक यह समीकरण बिल्कुल साफ हुआ करता था कि जब-जब देश की आर्थिक वृद्धि तेज होती थी, विदेशी निवेशकों का तांता लग जाता था। लेकिन वक्त के साथ यह रिश्ता कमजोर पड़ता चला गया। हाल के वर्षों में स्थिति यह हो गई है कि देश की रियल जीडीपी ग्रोथ कई तिमाहियों में आठ प्रतिशत के आसपास रहने के बावजूद विदेशी निवेशकों की जेब से बड़ा निवेश बाहर नहीं आया, बल्कि वे बिकवाल की भूमिका में नजर आए।
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विदेशी फंडों का कुल प्रवाह: आया कम और बाहर गया बहुत ज्यादा
विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी FIIs की गतिविधियों का विश्लेषण करें तो तस्वीर काफी दिलचस्प और चौंकाने वाली नजर आती है। बर्नस्टीन के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 24 महीनों के भीतर FII का कुल आउटफ्लो (बाहर जाने वाला पैसा) लगभग 56.3 अरब डॉलर दर्ज किया गया। इसके मुकाबले इसी अवधि में महज 38.6 अरब डॉलर का इनफ्लो (आने वाला पैसा) ही बाजार में देखा गया। यानी साफ है कि जितना विदेशी धन बाजार के भीतर आया, उससे कहीं अधिक मात्रा में पूंजी को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
अगर इस रुझान को पिछले दस सालों के लंबे कैनवास पर देखें, तो स्थिति और भी स्पष्ट हो जाती है। पिछले एक दशक में भारतीय शेयरों में FII का शुद्ध निवेश (Net Investment) केवल करीब 4 अरब डॉलर तक ही सिमट कर रह गया है। इसके विपरीत, घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने इस दौरान भारतीय बाजार में करीब 300 अरब डॉलर झोंक दिए हैं। इस आंकड़े से यह बात आईने की तरह साफ हो जाती है कि आज के समय में भारतीय शेयर बाजार को संभालने और आगे बढ़ाने में घरेलू निवेशकों की भूमिका सबसे अहम हो चुकी है, जबकि विदेशी निवेशकों का पुराना दबदबा काफी हद तक कमजोर पड़ चुका है।
ब्याज दरों के समीकरण से आगे निकलकर अब रुपये की चाल पर टिकी निवेशकों की नजर
एक वक्त था जब भारत और अमेरिका की ब्याज दरों के बीच का अंतर विदेशी निवेशकों के फैसले तय करता था। साल 2012 से 2018 के बीच यह देखा गया था कि जब भी दोनों देशों की ब्याज दरों में अंतर होता था, FII का रुख उसी हिसाब से बदलता था। हालांकि, पिछले चार-पांच वर्षों में इस रिश्ते में भी ढील आई है। अब वैश्विक फंड मैनेजर्स का पूरा फोकस ब्याज दरों की तुलना में डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये के प्रदर्शन पर टिका हुआ है।
बर्नस्टीन की रिपोर्ट बताती है कि हालिया दौर में FII इनफ्लो और रुपये की चाल के बीच का संबंध बढ़कर लगभग 72.9 फीसदी तक पहुंच चुका है। इसका सीधा मतलब यह है कि विदेशी निवेशक अपना पैसा तो भारतीय मुद्रा यानी रुपये में लगाते हैं, लेकिन उनका मुनाफा डॉलर के संदर्भ में आंका जाता है। यदि शेयर बाजार में थोड़ा बहुत फायदा हो भी जाए, लेकिन डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर पड़ जाए, तो विदेशी निवेशक का वास्तविक रिटर्न घट जाता है। यही कारण है कि रुपये की कमजोरी उन्हें भारतीय बाजार से दूर रहने पर मजबूर कर रही है।
क्या भविष्य में होगी विदेशी निवेशकों की वापसी या केवल 'ट्रेडिंग' तक सीमित रहेगा रिश्ता?
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में विदेशी निवेशकों की वापसी तो हो सकती है, लेकिन वह पहले जैसी लंबी अवधि की रणनीतिक साझेदारी नहीं होगी। रिपोर्ट के मुताबिक, आगामी समय में FII का इनफ्लो सपाट या फिर बेहद मामूली रूप से सकारात्मक रह सकता है। विदेशी निवेशक अब भारतीय बाजारों में लंबी अवधि के लिए दांव लगाने के बजाय केवल अल्पकालिक कारोबार यानी 'ट्रेडिंग' के मकसद से ही लौटते हुए दिखाई देंगे।
"भारत की मजबूत आर्थिक वृद्धि अपनी जगह कायम है, लेकिन वैश्विक अनिश्चितताएं और करेंसी के उतार-चढ़ाव ने विदेशी निवेशकों के नजरिए को पूरी तरह बदल दिया है। अब वे केवल मैक्रो इकोनॉमिक आंकड़ों के भरोसे बड़ा निवेश करने से बच रहे हैं और हर एक कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं।" — वित्तीय बाजार विशेषज्ञ
इसके अलावा, सितंबर महीने के शुरुआती आंकड़ों पर गौर करें तो विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय पूंजी बाजार से भारी बिकवाली करते हुए शुद्ध निकासी दर्ज की है। हालांकि इससे पहले के कुछ महीनों में बाजार में कुछ खरीदारी जरूर देखने को मिली थी, लेकिन कुल मिलाकर पूरे साल का रुख अभी भी सतर्कता और बिकवाली की ओर ही झुका हुआ है। ऐसे में भारतीय बाजार की असली ताकत अब विदेशी पूंजी के बजाय घरेलू निवेशकों के भरोसे ही मजबूती से आगे बढ़ रही है।








