टाटा संस को शेयर बाजार से दूर रखने के लिए नोएल टाटा का मास्टर प्लान
भारतीय उद्योग जगत के सबसे बड़े समूहों में शुमार टाटा ग्रुप में अंदरूनी रणनीतिक बदलावों का दौर तेजी से चल रहा है। टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड (TSPL) को शेयर बाजार में लिस्ट होने से बचाने के लिए टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने एक बेहद आक्रामक और रणनीतिक दांव चला है। ग्रुप की सर्वोच्च कमान संभाल रहे टाटा ट्रस्ट्स ने टाटा संस के बोर्ड को एक नया पुनर्गठन प्रस्ताव सौंपा है। इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य कंपनी को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के कड़े नियमों के दायरे से पूरी तरह बाहर निकालना है, ताकि कंपनी का आईपीओ लाने की अनिवार्यता को समाप्त किया जा सके।
इस पूरी रणनीति के तहत टाटा समूह की दो प्रमुख अनलिस्टेड ऑपरेटिंग कंपनियों—टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स सॉल्यूशंस (TESS) और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स (TCE)—का सीधे टाटा संस के साथ विलय (Merger) किया जाना है। यदि इस प्रस्ताव को अमलीजामा पहनाया जाता है, तो टाटा संस एक बार फिर से केवल एक वित्तीय निवेश कंपनी न रहकर, खुद सेवाएं और सामान बनाने वाली एक सक्रिय ऑपरेटिंग-कम-होल्डिंग कंपनी बन जाएगी।
टाटा ट्रस्ट्स का हमेशा से यह स्पष्ट मानना रहा है कि टाटा संस को एक प्राइवेट होल्डिंग कंपनी के रूप में ही काम करना चाहिए, ताकि समूह की मूल भावना और नियंत्रण पर बाहरी निवेशकों या बाजार का अत्यधिक दबाव न आए। रिजर्व बैंक के हालिया नियमों और निर्देशों के बाद यह कदम समूह के भविष्य के ढांचे को सुरक्षित रखने के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है.
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आरबीआई के कड़े नियमों और एनबीएफसी के दायरे से बचने की कवायद
भारतीय रिजर्व बैंक के 'अपर-लेयर एनबीएफसी' (NBFC-UL) और 'कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी' (CIC) के सख्त नियमों के मुताबिक, यदि किसी कंपनी की कुल संपत्तियों और कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा वित्तीय लेनदेन या निवेश जैसे कामों से आता है, तो उसे विशेष श्रेणी में रखा जाता है। इसके अलावा, कोर इन्वेस्टिंग कंपनी का दर्जा पाने के लिए कंपनी के कुल एसेट्स का कम से कम 90 प्रतिशत हिस्सा अपनी ही ग्रुप कंपनियों में लगा होना कानूनी रूप से अनिवार्य होता है।
इस कैटेगरी में आने वाली दिग्गज कंपनियों के लिए शेयर बाजार में लिस्ट होना अनिवार्य कर दिया जाता है। टाटा संस का विशाल एसेट बेस और वित्तीय संरचना इन सभी शर्तों को पूरा करती थी, जिसकी वजह से केंद्रीय बैंक की ओर से उस पर शेयर बाजार में आईपीओ लाने का भारी कानूनी दबाव बन रहा था। पिछले दिनों आरबीआई ने टाटा संस की उस अर्जी को भी खारिज कर दिया था जिसमें उसने कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के दर्जे से छूट मांगी थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन कड़े विनियामक दबावों से पार पाने के लिए ही टाटा ट्रस्ट्स ने यह रणनीतिक रास्ता चुना है। विलय के बाद कंपनी की वित्तीय संरचना इस प्रकार बदल जाएगी कि वह इन नियमों के दायरे से बाहर हो जाएगी, जिससे लिस्टिंग की तलवार स्वतः ही हट जाएगी।
अपने 80 साल पुराने क्लासिक बिजनेस मॉडल पर लौटेगा टाटा समूह
टाटा संस के इतिहास पर नजर डालें तो यह कोई नया प्रयोग नहीं है, बल्कि समूह अपने पुराने और आजमाए हुए बिजनेस मॉडल की तरफ वापस लौट रहा है। अपने 100 साल से अधिक के सफर में टाटा संस ने लगभग 80 साल तक इसी तरह खुद का बिजनेस चलाया था और सामान या सेवाएं उत्पादित करती रही थी। कॉर्पोरेट इतिहास के जानकारों के अनुसार, साल 2004 में टीसीएस (TCS) को अलग करने से पहले, इसका पूरा बिजनेस सीधे तौर पर टाटा संस के अंतर्गत ही संचालित होता था।
टीसीएस के एक स्वतंत्र कंपनी के रूप में अलग होने के बाद ही टाटा संस पूरी तरह से एक कोर इनवेस्टमेंट कंपनी के रूप में तब्दील हुई थी। टाटा ट्रस्ट्स के सलाहकारों और कंपनी के पुराने दौर के अधिकारियों का भी यही कहना है कि इतिहास के पन्नों को पलटकर उसी पुराने ऑपरेटिंग मॉडल को अपनाना वर्तमान कानूनी चुनौतियों का सबसे पुख्ता और व्यावहारिक समाधान है।
"यह कोई नया प्रयोग नहीं है, बल्कि टाटा संस के उस पुराने बिजनेस मॉडल में वापसी है जिसके तहत समूह ने दशकों तक सफलतापूर्वक कारोबार का संचालन किया था। इससे होल्डिंग कंपनी का आंतरिक संतुलन और नियंत्रण दोनों सुरक्षित रहेंगे।"— कॉर्पोरेट विश्लेषक एवं विशेषज्ञ
विलय के बाद वित्तीय आंकड़ों में क्या होगा बड़ा बदलाव?
प्रस्तावित पुनर्गठन योजना के तहत यदि टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स का विलय टाटा संस में होता है, तो कंपनी की बैलेंस शीट और वित्तीय अनुपात पूरी तरह बदल जाएंगे। नए आंकड़ों के अनुसार, इस संयुक्त इकाई का ऑपरेटिंग रेवेन्यू बढ़कर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक हो जाएगा, जो कि कंपनी की कुल आय का लगभग 64 प्रतिशत हिस्सा होगा।
इसके विपरीत, विशुद्ध रूप से वित्तीय संपत्तियों से होने वाली आय का अनुपात काफी कम रह जाएगा। साथ ही, समूह की कंपनियों में कुल निवेश घटकर लगभग 88.5 प्रतिशत के आसपास आ जाएगा, जो कि कोर इन्वेस्टिंग कंपनी के लिए निर्धारित 90 प्रतिशत के थ्रेशोल्ड नियम से नीचे है। यही वह मुख्य तकनीकी बिंदु है जो टाटा संस को आरबीआई के अनिवार्य लिस्टिंग दायरे से पूरी तरह मुक्त कर देगा।
इस पूरी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए अब भारतीय रिजर्व बैंक के नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज- वॉलंटरी अमालगमेशन डायरेक्शंस के तहत औपचारिक एनओसी और विनियामक मंजूरियां लेनी होंगी, जिन पर आने वाले समय में बाजार की पैनी नजर बनी रहेगी।
बोर्डरूम की खींचतान और भविष्य की राह
टाटा संस की शेयर बाजार में लिस्टिंग और आईपीओ लाने की प्रक्रिया को लेकर पिछले कुछ महीनों से आंतरिक बैठकों में लगातार चर्चा और खींचतान देखने को मिली है। सितंबर में हुई बोर्ड बैठक में जहाँ एक तरफ आईपीओ की दिशा में आगे बढ़ने और नेतृत्व को विस्तार देने के प्रस्तावों पर मुहर लगी थी, वहीं टाटा ट्रस्ट्स के स्तर पर इसके विरोध के स्वर भी स्पष्ट रूप से सामने आए थे।
नोएल टाटा के नेतृत्व में टाटा ट्रस्ट्स ने स्पष्ट कर दिया है कि वे समूह की मूल संरचना और पारिवारिक व परोपकारी नियंत्रण से कोई समझौता नहीं करना चाहते हैं। इस नए विलय प्रस्ताव के जरिए समूह ने यह साबित कर दिया है कि वे कॉर्पोरेट और विनियामक बाधाओं से निपटने के लिए बेहद मजबूत और दूरदर्शी कानूनी रास्ते तलाशने में पूरी तरह सक्षम हैं।
आने वाले हफ्तों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि नियामक इस पुनर्गठन प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाते हैं, लेकिन इतना तय है कि टाटा समूह ने अपनी वित्तीय स्वायत्तता और अनलिस्टेड स्वरूप को बचाए रखने के लिए एक बड़ा और ऐतिहासिक पासा चल दिया है।









