गांधी जयंती की छुट्टी ने बचाई भारतीय निवेशकों की नैया
सप्ताह के आखिरी कारोबारी सत्र में जब दुनिया भर के शेयर बाजारों में आर्थिक उथल-पुथल मची हुई थी, तब भारतीय निवेशकों ने चैन की सांस ली। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती यानी दो अक्टूबर के अवसर पर देश के प्रमुख शेयर बाजार पूरी तरह बंद रहे। इस साप्ताहिक अवकाश के चलते घरेलू बाजार वैश्विक स्तर पर दिख रहे भारी बिकवाली के दबाव और उथल-पुथल से सुरक्षित बच गए। हालांकि, बाजार बंद होने के बावजूद वित्तीय गलियारों और निवेशकों की निगाहें लगातार एशियाई और अमेरिकी बाजारों के उतार-चढ़ाव पर टिकी हुई थीं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारतीय बाजार इस दौरान खुले होते, तो वैश्विक मोर्चे पर मिल रहे सुस्त और नकारात्मक संकेतों का सीधा असर घरेलू बेंचमार्क इंडेक्स सेंसेक्स और निफ्टी पर देखने को मिल सकता था। अमेरिका और एशिया के कई बड़े बाजारों में निवेशकों ने भारी बिकवाली का रुख अपनाया, जिससे परिसंपत्तियों की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई। अब सबकी नजरें आगामी कारोबारी सत्र पर टिकी हैं, जहां यह देखना दिलचस्प होगा कि घरेलू बाजार वैश्विक दबावों को किस तरह से पचाते हैं और आगे की क्या चाल अपनाते हैं।
वैश्विक अर्थव्यवस्था में इस समय कई मोर्चों पर एक साथ दबाव बन रहा है। एक तरफ जहां अमेरिकी बॉन्ड मार्केट में भारी हलचल है, वहीं दूसरी तरफ कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी बनी हुई है। ऐसे में भारतीय बाजार के फिर से खुलने पर विदेशी संस्थागत निवेशकों की गतिविधियों और वैश्विक रुझानों का सीधा प्रभाव देखने को मिलेगा, जिसको लेकर बाजार के जानकार पहले से ही सतर्कता बरतने की सलाह दे रहे हैं।
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हांगकांग और जापान के बाजारों में मची खलबली
एशियाई शेयर बाजारों में शुक्रवार के कारोबार के दौरान मिला-जुला और बेहद दबाव वाला रुख देखने को मिला। हांगकांग का शेयर बाजार इस गिरावट के केंद्र में रहा, जहां निवेशकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। हांगकांग का प्रमुख बेंचमार्क हैंग सेंग इंडेक्स (HSI) करीब तीन प्रतिशत लुढ़ककर लगभग 23,900 अंकों के स्तर पर आ गया। यह पिछले 11 हफ्तों का सबसे निचला स्तर है। बाजार विश्लेषकों के मुताबिक, वैश्विक बॉन्ड यील्ड में तेजी और ऊर्जा संकट के चलते हांगकांग के टेक शेयरों में ताबड़तोड़ बिकवाली देखने को मिली, जिससे हैंग सेंग टेक इंडेक्स भी करीब ढाई फीसदी टूट गया।
जापानी शेयर बाजार का हाल भी कुछ ऐसा ही नजर आया। जापान का निक्केई 225 इंडेक्स करीब 0.9 फीसदी की गिरावट के साथ बंद हुआ, जबकि व्यापक टोपिक्स इंडेक्स में भी 1.1 प्रतिशत की कमजोरी दर्ज की गई। टोक्यो से आए ताजा महंगाई के आंकड़ों ने जापान के नीति-निर्माताओं और निवेशकों की चिंता को और बढ़ा दिया है। सितंबर महीने में टोक्यो का कोर कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) बढ़कर 2.7 फीसदी पर पहुंच गया, जो पिछले महीने के 1.8 फीसदी से काफी अधिक है। बाजार के शुरुआती अनुमानों में इसके 2.4 फीसदी रहने की उम्मीद जताई गई थी, लेकिन महंगाई के आंकड़े अनुमान से ज्यादा आने के बाद बैंक ऑफ जापान की मौद्रिक नीतियों को लेकर नए सिरे से कयास लगाए जाने लगे हैं।
"वैश्विक बाजारों में इस वक्त बॉन्ड यील्ड और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें मुख्य चिंता का विषय बनी हुई हैं। एशियाई बाजारों में दिख रही यह कमजोरी इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में केंद्रीय बैंकों को ब्याज दरों को लेकर और अधिक कड़े फैसले लेने पड़ सकते हैं।" — वरिष्ठ वित्तीय विश्लेषक, द फ्रीलांस
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में रिकॉर्ड उछाल और कर्ज की बढ़ती लागत
अमेरिकी बॉन्ड बाजार में जारी उथल-पुथल का असर केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर एशियाई और उभरते हुए बाजारों पर भी पड़ रहा है। अमेरिकी 10-इयर ट्रेजरी यील्ड में लगातार तेजी देखी जा रही है, जो पिछले कुछ दिनों में बढ़कर 5.34 फीसदी तक पहुंच गई थी। वित्तीय इतिहास के पन्नों को पलटें तो यह साल 2002 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। हालांकि एशियाई कारोबार के दौरान इसमें हल्की नरमी जरूर आई और यह 5.25 फीसदी के आसपास कारोबार करती नजर आई, लेकिन इसका दबाव दुनिया भर के वित्तीय तंत्र पर साफ महसूस किया जा रहा है।
बॉन्ड यील्ड में इस तरह की भारी बढ़ोतरी का मतलब साफ है कि वैश्विक स्तर पर कर्ज लेने की लागत में इजाफा हो रहा है। जब सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिकी बॉन्ड पर निवेशकों को बेहतर रिटर्न मिलता है, तो वे जोखिम भरे इक्विटी बाजारों से अपना पैसा निकालकर बॉन्ड मार्केट की ओर रुख करने लगते हैं। यही कारण है कि ऊंचे वैल्यूएशन वाली टेक कंपनियों और वैश्विक इक्विटी बाजारों पर लगातार बिकवाली का दबाव बना हुआ है। इसके अलावा, अमेरिकी रोजगार के मोर्च आने वाले आंकड़े भी निवेशकों को फूंक-फूंक कर कदम रखने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व के नीतिगत रुख और महंगाई के आंकड़ों पर दुनियाभर की निगाहें टिकी हैं। हाल ही में जारी किए गए पर्सनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर (PCE) के आंकड़ों ने हालांकि कुछ हद तक राहत दी है, लेकिन इसके बावजूद निवेशकों में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। अमेरिकी शेयर बाजार भी अपने ऊपरी स्तरों से फिसलते हुए नजर आए, जिससे यह साफ जाहिर होता है कि निवेशकों का जोखिम उठाने का माद्दा फिलहाल कम हुआ है।
कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और भू-राजनीतिक तनाव का साया
शेयर बाजारों की इस उथल-पुथल के बीच ऊर्जा बाजार में बनी स्थिति ने आग में घी डालने का काम किया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल लगातार 102 डॉलर प्रति बैरल के महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक स्तर से ऊपर ट्रेड कर रहा है। तेल की कीमतें इतनी ऊंचे स्तर पर बनी रहने से दुनिया भर के देशों में आयात बिल बढ़ने और महंगाई दर बेकाबू होने का खतरा मंडराने लगा है। तेल उत्पादक देशों के फैसलों और वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरणों के कारण कच्चे तेल के दामों में नरमी के कोई स्पष्ट संकेत फिलहाल दिखाई नहीं दे रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में अमेरिका अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने की रणनीतिक योजना पर काम कर रहा है, जिससे क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंकाओं को बल मिला है। दूसरी तरफ, दुनिया के बड़े आर्थिक खिलाड़ी चीन ने अपने घरेलू स्तर पर ऊर्जा सुरक्षा और स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ऑयल प्रोडक्ट्स के निर्यात पर कड़ी रोक लगा दी है। इन तमाम अंतरराष्ट्रीय घटनाओं ने मिलकर ग्लोबल एनर्जी मार्केट को संवदेनशील बना दिया है, जिसका सीधा असर एशियाई आयातकों और शेयर बाजारों के सेंटिमेंट पर पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि यदि क्रूड ऑयल की कीमतें इसी तरह ऊंचे पायदान पर टिकी रहीं, तो आगामी महीनों में विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंकों के लिए ब्याज दरों में कटौती करना बेहद मुश्किल हो जाएगा। एशियाई अर्थव्यवस्थाएं, जो ऊर्जा आयातों के मामले में काफी हद तक बाहरी दुनिया पर निर्भर हैं, उनके लिए यह स्थिति अतिरिक्त आर्थिक चुनौतियां लेकर आ रही है।
चीनी बाजारों के बंद रहने से ठहराव और भविष्य का आउटलुक
एशियाई बाजारों की इस व्यापक तस्वीर में चीन का रुख एक अलग ही स्थिति बयां कर रहा है। चीन के मुख्य भूमि (मेनलैंड) के शेयर बाजार अपने राष्ट्रीय पर्व 'गोल्डन वीक' के मौके पर जारी साप्ताहिक छुट्टियों के कारण पूरी तरह बंद रहे। चीनी बाजारों के बंद होने से वहां से कोई नया ट्रेडिंग संकेत नहीं मिल सका, जिससे एशियाई क्षेत्र में कारोबार का दायरा कुछ सीमित जरूर हुआ। चीनी बाजार अब अपनी इन छुट्टियों के बाद आगामी सप्ताह में दोबारा खुलेंगे, जिसके बाद वहां से आने वाले आर्थिक आंकड़े और नीतियां वैश्विक बाजार की अगली दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगी।
दूसरी ओर, दक्षिण कोरिया का कोस्पी इंडेक्स शुरुआती कारोबार के उतार-चढ़ाव को पार करते हुए मामूली बढ़त यानी करीब 0.12 फीसदी की तेजी के साथ बंद होने में कामयाब रहा। थाईलैंड के सेती इंडेक्स में भी लगभग 0.5 प्रतिशत की मजबूती दर्ज की गई। इसके विपरीत, सिंगापुर के स्ट्रेट्स टाइम्स इंडेक्स में कमजोरी का रुख रहा और यह 0.3 फीसदी की गिरावट के साथ बंद हुआ। इस तरह एशियाई क्षेत्र के भीतर ही बाजारों का प्रदर्शन काफी मिला-जुला रहा, जो इस बात की तस्दीक करता है कि वैश्विक कारकों के बीच हर देश की अपनी आर्थिक सेहत और स्थानीय नीतियां भी बाजार को प्रभावित कर रही हैं।
संक्षेप में कहें तो, भारतीय शेयर बाजार भले ही छुट्टी के दिन वैश्विक आंधियों से बचे रहे हों, लेकिन आने वाले कारोबारी दिनों में निवेशकों को बेहद सतर्क और फूक-फूक कर कदम रखने की जरूरत है। बॉन्ड यील्ड की चाल, कच्चे तेल के बदलते तेवर और विदेशी निवेशकों का रुख ही यह तय करेगा कि भारतीय बाजार आने वाले समय में वैश्विक दबावों का मुकाबला किस मजबूती के साथ कर पाते हैं।








