बचपन का वो खौफनाक दिन और एक मासूम बच्ची की कभी न भरने वाली खालीपन
जिंदगी में कुछ ऐसे हादसे होते हैं जो इंसान के वजूद को अंदर तक झकझोर कर रख देते हैं। बॉलीवुड की जानी-मानी अभिनेत्री निम्रत कौर ने हाल ही में अपने जीवन के सबसे काले और डरावने अध्याय से पर्दा उठाया है। जब वह महज 11 साल की थीं, तब उनके परिवार पर दुखों का ऐसा पहाड़ टूटा जिससे उबरने में दशकों बीत गए, लेकिन वह दर्द आज भी ताजा है। उनके पिता, मेजर भूपेंद्र सिंह भारतीय सेना में सेवारत थे और उन दिनों कश्मीर में तैनात थे। आतंकवादियों द्वारा उनके अपहरण और निर्मम हत्या की दास्तां आज भी सुनने वालों की रूह कंपा देती है।
हाल ही में दिए गए एक साक्षात्कार में निम्रत ने उस सुबह को याद किया जब उनके पिता घर से ड्यूटी के लिए निकले थे। एक आम दिन की तरह शुरू हुई वह सुबह उनके परिवार के लिए जिंदगी का आखिरी खुशहाल पल साबित हुई। किसी को इस बात का दूर-दूर तक अंदाजा नहीं था कि कुछ ही घंटों में उनके हंसते-खेलते परिवार की दुनिया हमेशा के लिए उजड़ जाएगी।
निमरत ने साझा किया कि उस नुकसान का असर आज भी उनके पूरे परिवार पर साफ दिखाई देता है। भले ही समय बीत चुका हो और कैलेंडर के पन्ने आगे बढ़ गए हों, लेकिन दिल के जख्म कभी नहीं भरते। उनकी मां, बहन और खुद उनके लिए वह खालीपन ऐसा है जिसे दुनिया की कोई भी ताकत या सफलता कभी नहीं भर सकती।
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सेना की वर्दी में छिपे थे भेड़िए, ड्यूटी से लौटते वक्त हुआ था अपहरण
घटना के विवरण को साझा करते हुए निम्रत कौर ने बताया कि उनके पिता अपनी तयशुदा सरकारी ड्यूटी पर गए हुए थे। जब वे अपना काम पूरा करके लौट रहे थे, तभी रास्ते में उनके साथ खौफनाक धोखा हुआ। जिन लोगों ने उन्हें रोका और अपने साथ ले गए, उन्होंने भारतीय सेना की वर्दी पहन रखी थी। विश्वासघात का यह नंगा नाच इतना भयानक था कि देश के रक्षक को ही रक्षकों के भेष में आए दुश्मनों ने अपनी गिरफ्त में ले लिया।
उस दौर में कश्मीर के हालात बेहद संवेदनशील और तनावपूर्ण थे। निम्रत और उनका पूरा परिवार उस वक्त वहीं मौजूद था। पहले उन्हें वेरिनैग में रखा गया था, लेकिन जैसे-जैसे खतरे के बादल गहराने लगे और सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ने लगीं, उन्हें सुरक्षित रूप से श्रीनगर शिफ्ट कर दिया गया। लेकिन अनहोनी को कुछ और ही मंजूर था।
"मैंने उस सुबह अपने पिता को काम पर जाते देखा था। मुझे बस उनका जाना याद है और उसके बाद, अगली बार मैंने उन्हें ताबूत में देखा। इसलिए, इस मामले में कोई क्लोजर यानी मन को तसल्ली देने वाला अंत कभी नहीं मिल पाया।" — निम्रत कौर, अभिनेत्री
सात दिन तक चली भयानक अनिश्चितता और अजीबोगरीब मांगें
मेजर भूपेंद्र सिंह के अपहरण के बाद के सात दिन उनके परिवार और देश की सुरक्षा एजेंसियों के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थे। आतंकवादियों ने उन्हें बंधक बनाकर रखा और लगातार अपनी शर्तें रखनी शुरू कर दीं। निम्रत के अनुसार, उन अपहरणकर्ताओं की मांगें काफी अजीब और बेतुकी थीं, जिनमें भारत की जेलों में बंद कुछ कैदियों की रिहाई की बात भी शामिल थी।
पूरा परिवार एक अज्ञात और डरावने दौर से गुजर रहा था। हर गुजरते दिन के साथ उम्मीदें टूटती जा रही थीं और दिल की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं। देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले एक जांबाज अफसर को इस तरह से बंधक बनाकर रखना और टॉर्चर करना मानवता के माथे पर एक बड़ा कलंक था। सातवें दिन वह मनहूस खबर आ ही गई जिसका डर हर पल परिवार को सता रहा था।
अंतिम पलों में भी सिर्फ परिवार को याद कर रहे थे शहीद मेजर
जब सातवें दिन मेजर भूपेंद्र सिंह की शहादत की पुष्टि हुई, तो पूरा देश गमगीन हो गया। हालांकि उस दुखद घड़ी के बाद परिवार को जो बातें पता चलीं, उन्होंने सबका सीना गर्व से चौड़ा करने के साथ-साथ आंखें भी नम कर दीं। अपनों से दूर, आतंकवादियों की कैद में रहते हुए भी मेजर साहब के दिल और दिमाग में सिर्फ अपने परिवार की ही फिक्र थी।
निम्रत ने बताया कि बाद में उन्हें इस बात की जानकारी मिली कि जब वे बंधक बनाए गए थे, तब भी वे अपने परिजनों के बारे में ही बात कर रहे थे। उन्होंने अपने अपहरणकर्ताओं से कहा था, 'मेरा एक परिवार है, मेरी दो बेटियां हैं।' उनके ये शब्द साबित करते हैं कि एक सैनिक देश के लिए जितना समर्पित होता है, उतना ही वह अपने परिवार की प्रेम की डोर से भी बंधा होता है। उनकी आखिरी सांसों और विचारों में भी उनकी दोनों बेटियां और उनकी पत्नी ही थीं।
शौर्य चक्र से सम्मानित वीरता और मां का संघर्षपूर्ण सफर
देश के लिए दिए गए इस सर्वोच्च बलिदान के लिए मेजर भूपेंद्र सिंह को मरणोपरांत देश के प्रतिष्ठित वीरता पुरस्कार 'शौर्य चक्र' से सम्मानित किया गया। उनकी बहादुरी को पूरा देश आज भी नमन करता है। लेकिन इस खौफनाक हादसे के बाद घर की स्थिति पूरी तरह बदल गई। एक तरफ पति को खोने का असहनीय गम और दूसरी तरफ दो मासूम बच्चियों की परवरिश की बड़ी जिम्मेदारी।
निम्रत कौर और उनकी बहन को अकेले दम पर पालने और उन्हें एक बेहतर इंसान बनाने में उनकी मां की भूमिका किसी चमत्कार से कम नहीं थी। मां ने खुद के आंसुओं को छुपाकर अपनी बेटियों की ढाल बनने का फैसला किया। आज निम्रत जो कुछ भी हैं, उसके पीछे उनकी मां का वही संघर्ष और अटूट साहस है, जिसने उजड़े हुए आशियाने को फिर से सजाया। यह कहानी सिर्फ एक अभिनेत्री के अतीत की नहीं है, बल्कि उस हर फौजी परिवार के त्याग की कहानी है जो देश की हिफाजत के लिए अपनी हंसती-खेलती जिंदगी दांव पर लगा देते हैं।








