मूसलाधार बारिश के बाद जलभराव पर जनप्रतिनिधियों में ठनी
हाल ही में हुई भारी बारिश ने शहर के कई इलाकों को जलमग्न कर दिया, जिससे आम जनजीवन पूरी तरह पटरी से उतर गया। इस प्राकृतिक आपदा और उसके बाद उपजे कुप्रबंधन ने राजनीतिक पारा भी चढ़ा दिया है। जलभराव की गंभीर समस्या और जनता की परेशानियों को लेकर जनप्रतिनिधि आमने-सामने आ गए हैं। हालात इतने बिगड़ गए कि एक स्थानीय पार्षद और लोकप्रिय सांसद के बीच टेलीफोन पर हुई तीखी बातचीत का ऑडियो अब सार्वजनिक चर्चा का मुख्य केंद्र बन चुका है।
बारिश के थमने के बाद जब लोग अपने घरों और दुकानों में भरा पानी निकालने में जुटे थे, तब राजनीतिक स्तर पर जवाबदेही तय करने का दौर शुरू हो गया। शहर के कई हिस्सों में पानी की निकासी न होने के कारण लोगों का गुस्सा फूट पड़ा था। इस बीच, जनप्रतिनिधियों की खामोशी या उनकी गैरमौजूदगी को लेकर भी जनता के भीतर नाराजगी देखने को मिल रही थी। इसी पृष्ठभूमि में स्थानीय जनप्रतिनिधियों के बीच संवादहीनता और असंतोष खुलकर सामने आ गया।
बाढ़ और जलभराव जैसी आपात स्थिति में जहां प्रशासनिक मशीनरी को मुस्तैद होना चाहिए था, वहीं राजनीतिक बयानबाजी और आपसी तकरार ने इस संकट को एक नया मोड़ दे दिया है। लोग सोशल मीडिया पर अपने वीडियो साझा कर रहे थे, तो दूसरी ओर नेतागण आपस में ही उलझते नजर आए। इस पूरी घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि प्राकृतिक आपदाओं के समय हमारे जनप्रतिनिधि कितनी जिम्मेदारी से मैदान में उतरते हैं।
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पार्षद और सांसद के बीच फोन पर तीखी नोंकझोंक
बेतियाहाता वार्ड के पार्षद विश्वजीत त्रिपाठी ने शहर के बदहाल हालातों से निपटने के लिए सीधे तौर पर सांसद रवि किशन से फोन पर संपर्क साधा। बातचीत की शुरुआत भले ही शहर की समस्याओं से हुई हो, लेकिन पलभर में ही यह बहस में तब्दील हो गई। पार्षद का कहना था कि इस विकट परिस्थिति में जनप्रतिनिधियों को जमीन पर उतरकर लोगों का हालचाल जानना चाहिए और राहत कार्यों की निगरानी करनी चाहिए, लेकिन मौके पर कोई नजर नहीं आ रहा था।
पार्षद की ओर से पूछे गए तीखे सवालों से सांसद असहज नजर आए। बातचीत के दौरान दोनों नेताओं के बीच शब्दों के तीर चलने लगे। पार्षद ने जब जनता के भारी आर्थिक नुकसान और शहर की दुर्दशा का जिक्र किया, तो माहौल और गर्मा गया। जनता के बीच हो रही फजीहत और विपक्षी तर्कों का हवाला देते हुए सांसद ने भी अपनी बात रखी, जिससे फोन पर ही जुबानी जंग छिड़ गई।
यह बातचीत इतनी तल्ख हो गई कि शहर के राजनीतिक हलकों में इसकी गूंज सुनाई देने लगी। आम जनता भी इस बात से हैरान थी कि जब पूरा शहर पानी में डूबा हुआ है और लोग मदद की गुहार लगा रहे हैं, तब उनके चुने हुए नुमाइंदे आपस में ही बहस करने में व्यस्त हैं। इस टेलीफोनिक बातचीत के अंश बाद में शहर के चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गए।
राजनीतिक रंग और दलों की खींचतान पर गरमाई सियासत
फोन पर हुई इस बातचीत के दौरान मामला तब और दिलचस्प हो गया जब राजनीतिक दलों की विचारधारा और बयानों पर चर्चा शुरू हो गई। सूत्रों के अनुसार, सांसद ने बातचीत के दौरान पार्षद के तेवर को देखते हुए कथित तौर पर सवाल किया कि वह किसी विपक्षी दल के नेता की तरह क्यों बात कर रहे हैं। इस पर पार्षद ने भी पलटवार करते हुए तीखा सवाल दाग दिया, जिससे मामला और उलझ गया।
पार्षद का तर्क था कि संकट के इस समय में राजनीति को किनारे रखकर केवल जनता की भलाई और राहत कार्यों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बाढ़ और जलभराव किसी पार्टी विशेष को देखकर नहीं आते हैं, इसलिए इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देना पूरी तरह गलत है। जनता की समस्याओं को उठाने वाले हर व्यक्ति को विरोधी दल का चश्मे से देखना उचित नहीं है।
"शहर में पानी भरने से हजारों लोगों का भारी नुकसान हुआ है। इस आपात स्थिति में राजनीति करने का समय नहीं है, बल्कि जनता को राहत पहुंचाने की जरूरत है। मैंने सिर्फ जनप्रतिनिधि होने के नाते अपनी जिम्मेदारी निभाई और सवाल पूछे।" — विश्वजीत त्रिपाठी, पार्षद, बेतियाहाता वार्ड
यह पूरी घटना इस बात का प्रतीक है कि किस प्रकार जमीनी मुद्दों पर भी राजनीतिक बयानबाजी हावी हो जाती है। जब जनता जलभराव की मार झेल रही थी, तब इस तरह की आपसी तकरार ने प्रशासनिक विफलताओं से ध्यान भटकाने का काम किया। स्थानीय लोगों का मानना है कि नेताओं को एक-दूसरे पर छींटाकशी करने के बजाय जल निकासी की व्यवस्था को दुरुस्त करने पर जोर देना चाहिए था।
चौदह साल का रिकॉर्ड और पंप-रेगुलेटर संचालन पर सवाल
बातचीत के दौरान पार्षद विश्वजीत त्रिपाठी ने दावा किया कि उन्होंने पिछले 14 वर्षों में शहर में ऐसा भयावह जलभराव कभी नहीं देखा था। उनका कहना था कि शहर के ड्रेनेज सिस्टम की पोल इस बारिश ने पूरी तरह खोल दी है। उन्होंने तत्काल प्रभाव से सभी वाटर पंप और ड्रेन रेगुलेटर चालू करने की मांग की, ताकि तेजी से पानी की निकासी हो सके और लोगों को राहत मिल सके।
दूसरी ओर, सांसद रवि किशन ने इन दावों का जवाब देते हुए स्पष्ट किया कि प्रशासन और संबंधित विभाग पूरी मुस्तैदी से काम कर रहे हैं। उनके अनुसार, सभी रेगुलेटर और पंप समय पर चलाए जा रहे हैं ताकि जल स्तर को जल्द से जल्द नियंत्रित किया जा सके। हालांकि, इस स्पष्टीकरण के बाद भी तकरार पूरी तरह शांत नहीं हुई और सांसद ने व्यस्तता का हवाला देते हुए फोन काट दिया।
इस पूरी वाकये ने गोरखपुर में जल निकासी के स्थायी समाधान को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हर साल मानसून या भारी बारिश के दौरान शहर के कई हिस्सों का पानी में डूब जाना एक आम समस्या बनती जा रही है। शहरवासी अब केवल जुबानी बहसों से ऊब चुके हैं और वे स्थायी और प्रभावी इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग कर रहे हैं ताकि उन्हें हर बार इस प्रकार की आपदा का सामना न करना पड़े।







