नींद में अचानक चीखने-चिल्लाने वाले बच्चों की समस्या
छोटे बच्चों के माता-पिता के लिए यह अनुभव बेहद डरावना हो सकता है जब उनका प्यारा बच्चा अचानक आधी रात को गहरी नींद से उठकर तेज आवाज में रोने या चिल्लाने लगे। कई बार बच्चे बिस्तर पर उठकर बैठ जाते हैं, उनकी आंखें खुली होती हैं लेकिन वे पूरी तरह होश में नहीं लगते। माता-पिता लाख कोशिश करें, वे किसी भी सवाल का जवाब नहीं देते और न ही माता-पिता की आवाज पर कोई प्रतिक्रिया देते हैं। ऐसी स्थिति को देखकर घर के बड़े लोग अक्सर घबरा जाते हैं और तरह-तरह के अंदेशे लगाने लगते हैं। लेकिन मेडिकल साइंस की भाषा में इसे एक सामान्य लेकिन समझने योग्य स्थिति माना गया है, जिसे 'नाइट टेरर' कहा जाता है।
बच्चे के इस तरह अचानक डर जाने के पीछे कई अलग-अलग वजहें हो सकती हैं। कई बार बच्चा दिनभर की किसी बात को लेकर बहुत ज्यादा मानसिक तनाव में होता है, या फिर उसका स्लीप साइकिल यानी सोने का समय नियमित नहीं होता है। इसके अलावा, शरीर में अत्यधिक थकान, नींद की कमी, किसी तरह की शारीरिक अस्वस्थता या फिर दिनभर में बहुत ज्यादा उत्तेजक माहौल का सामना करना भी इसका कारण बन सकता है। जब बच्चे का नन्हा दिमाग इन सब चीजों को सोते समय प्रोसेस नहीं कर पाता, तो यह अजीब सी स्थिति पैदा हो जाती है।
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आखिर क्या होता है 'नाइट टेरर' और कब होती है इसकी शुरुआत?
बाल रोग विशेषज्ञों के अनुसार, नाइट टेरर की यह घटना आमतौर पर ढाई साल से लेकर आठ साल तक की उम्र के बच्चों में सबसे ज्यादा देखने को मिलती है। राहत की बात यह है कि जैसे-जैसे बच्चे की उम्र बढ़ती है और उसका नर्वस सिस्टम विकसित होता है, यह समस्या अपने आप ठीक हो जाती है। यह नींद के उस चक्र के दौरान होता है जिसे नॉन-REM स्लीप कहा जाता है। इस दौरान बच्चा शारीरिक रूप से तो थोड़ा बहुत सक्रिय हो सकता है, लेकिन उसका मस्तिष्क गहरी नींद की अवस्था में ही रहता है, जिसकी वजह से वह आसपास की दुनिया से पूरी तरह कट जाता है।
बहुत से लोग नाइट टेरर और सामान्य बुरे सपनों यानी नाइटमेयर को एक ही चीज मान लेते हैं, लेकिन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क होता है। बुरे सपने अमूमन सुबह के वक्त आते हैं और जागने के बाद बच्चों को वो सपने याद भी रहते हैं, जिससे वे डर जाते हैं। इसके विपरीत, नाइट टेरर हमेशा सोने के शुरुआती दो-तीन घंटों के भीतर होता है और अगली सुबह बच्चे को इस बात की बिल्कुल भी याद नहीं रहती कि रात में उनके साथ क्या हुआ था।
पेरेंट्स को कब और कैसे बरतना चाहिए संयम?
जब किसी बच्चे को अचानक नाइट टेरर का दौरा पड़ता है, तो माता-पिता का घबरा जाना बहुत स्वाभाविक है। लेकिन एक्सपर्ट्स की सलाह है कि इस स्थिति में जरा भी पैनिक नहीं करना चाहिए। सबसे बड़ी गलती जो पेरेंट्स कर बैठते हैं, वह यह है कि वे बच्चे को जोर-जोर से हिलाकर या झकझोर कर जगाने की कोशिश करने लगते हैं। ऐसा करने से बच्चा और ज्यादा डर सकता है या भ्रमित हो सकता है।
"बच्चे को जबरदस्ती जगाने या जोर से थपथपाने के बजाय शांत रहें और उसे प्यार से सहलाएं। साथ ही, यह समझने की कोशिश करें कि नाइट टेरर की वजह क्या हो सकती है। कारण समझ में आने और उसे दूर करने से समस्या कम हो सकती है।" — डॉ. संतोष यादव, बाल रोग विशेषज्ञ
डॉक्टरों का कहना है कि बच्चे के पास बैठकर बस उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि वह सोते समय बिस्तर से गिरकर खुद को चोट न पहुँचा ले। उसे प्यार से थपथपाना और धीमे स्वर में यह अहसास कराना काफी होता है कि वह सुरक्षित है। जब दौरा अपने आप शांत हो जाता है, तो बच्चा खुद-ब-खुद गहरी और शांत नींद में दोबारा चला जाता है।
समस्या से निपटने और भविष्य में बचाव के उपाय
इस तरह की घटनाओं को कम करने के लिए माता-पिता को अपने बच्चों की दिनचर्या और आदतों में कुछ सकारात्मक बदलाव करने की जरूरत होती है। सबसे पहले बच्चों के सोने और उठने का एक निश्चित समय तय करें। नींद का रूटीन जितना पक्का होगा, मस्तिष्क उतना ही संतुलित रहेगा। सोने से कम से कम एक घंटे पहले बच्चों को टीवी, मोबाइल या वीडियो गेम्स जैसी स्क्रीन से दूर रखें, क्योंकि डिजिटल स्क्रीन का अत्यधिक इस्तेमाल बच्चों के दिमाग को ओवरस्टिम्युलेट कर देता है।
इसके अलावा, दिनभर में बच्चे की शारीरिक गतिविधियों पर ध्यान दें ताकि उसकी ऊर्जा सही दिशा में लगे और उसे रात में सुकून भरी नींद आ सके। अगर बच्चे के खानपान और जीवनशैली में थोड़ा सा अनुशासन लाया जाए, तो इस तरह की नींद से जुड़ी परेशानियों को काफी हद तक टाला जा सकता है। यदि इसके बावजूद समस्या बहुत ज्यादा गंभीर लगे या बार-बार हो, तो किसी अच्छे पीडियाट्रिशियन से सलाह जरूर लेनी चाहिए।








