गुजरात सरकार का बड़ा प्रशासनिक फेरबदल और 'ऑपरेशन गंगाजल' की शुरुआत
देश भर में प्रशासनिक व्यवस्था को पारदर्शी और जनता के प्रति जवाबदेह बनाने की दिशा में कई बार बड़े कदम उठाए जाते हैं। इसी कड़ी में गुजरात सरकार ने एक बेहद कड़ा और सख्त रुख अपनाते हुए भ्रष्टाचार में लिप्त नौकरशाहों के खिलाफ बड़ा अभियान छेड़ दिया है। इस विशेष अभियान को 'ऑपरेशन गंगाजल' नाम दिया गया है, जिसका मुख्य उद्देश्य शासन प्रणाली से दागदार और भ्रष्ट तत्वों को बाहर का रास्ता दिखाना है। राज्य के प्रशासनिक गलियारों में इस ताबड़तोड़ कार्रवाई की चर्चा जोरों पर है और इसे नौकरशाही के लिए एक कड़े संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
इस ताजा और बहुचर्चित अभियान के दायरे में वे सभी अधिकारी आ रहे हैं जिनके ऊपर लंबे समय से भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप चल रहे हैं, जिनके खिलाफ विभागीय जांच पेंडिंग हैं या जिन्होंने अपने आधिकारिक पद का दुरुपयोग किया है। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि लोक कल्याणकारी योजनाओं को धरातल पर उतारने वाले महकमे में यदि कोई अधिकारी अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल करता है, तो उसके खिलाफ कानून के दायरे में रहकर सबसे कठोर सजा सुनिश्चित की जाएगी। इसी नीति के तहत हाल ही में दो प्रमुख आईएएस अधिकारियों की सेवाएं बीच में ही समाप्त कर दी गईं।
सामान्य तौर पर भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों का कार्यकाल लंबा होता है और वे अपनी तय उम्र तक देश की सेवा करते हैं, परंतु जब नियमों और नैतिकता की धज्जियां उड़ाई जाती हैं, तो सरकारें मौलिक सेवा नियमों का सहारा लेकर ऐसे कदम उठाने को मजबूर होती हैं। इस कार्रवाई ने एक बार फिर से इस बात पर मुहर लगा दी है कि वर्दी और रुतबे की आड़ में गैरकानूनी गतिविधियां चलाने वालों को अंततः कानून के लंबे हाथों का सामना करना ही पड़ता है।
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कब्जे और रिश्वतखोरी के आरोपों से घिरे 2011 बैच के आईएएस के. राजेश की विदाई
अनिवार्य सेवानिवृत्ति पाने वाले अधिकारियों में सबसे प्रमुख नाम 2011 बैच के आईएएस अधिकारी के. राजेश का है। वह पहले से ही केंद्रीय जांच एजेंसियों की रडार पर थे और विभिन्न मामलों में सस्पेंड चल रहे थे। उनके खिलाफ रिश्वतखोरी, जमीन के अवैध आवंटन और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे संगीन अपराधों की आपराधिक जांच चल रही थी। इन गंभीर मामलों के मद्देनजर सरकार ने उनके भविष्य की प्रशासनिक उपयोगिता को शून्य मानते हुए उन्हें समय से पहले ही घर बैठाने का निर्णय लिया।
के. राजेश के भ्रष्टाचार के कारनामों का खुलासा तब हुआ जब उन्होंने सुरेंद्रनगर जिले में कलेक्टर के रूप में अपनी सेवाएं दी थीं। उनके कार्यकाल के दौरान हथियारों के लाइसेंस जारी करने के नाम पर भारी घूस लेने और सरकारी जमीनों के बंदरबांट के संगीन आरोप सामने आए थे। साल 2022 में देश की प्रमुख जांच एजेंसी केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई ने उन्हें धर दबोचा था। इसके बाद प्रवर्तन निदेशालय ने भी प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत मामला दर्ज कर उनके खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाए और अदालत में प्रॉसिक्यूशन शिकायत दाखिल की।
शैक्षणिक रूप से बेहद प्रतिभाशाली माने जाने वाले राजेश ने पांडिचेरी यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में बीटेक की डिग्री हासिल की थी और संघ लोक सेवा आयोग की कठिन परीक्षा पास कर सिविल सेवा में कदम रखा था। सुरेंद्रनगर से पहले उन्होंने जूनागढ़ और सूरत में भी विभिन्न प्रशासनिक पदों पर कार्य किया था। हालांकि, उनकी योग्यता उनके अहंकार और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई, जिसके परिणामस्वरूप आज उनकी पूरी सेवा अवधि पर विराम लग गया है।
गौरव दहिया पर भी गिरा गाज, नेशनल हेल्थ मिशन और व्यक्तिगत विवादों से जुड़ा रहा है नाता
इस उच्च स्तरीय प्रशासनिक कार्रवाई के दूसरे शिकार 2010 बैच के आईएएस अधिकारी गौरव दहिया बने हैं। कार्रवाई के वक्त वह गांधीनगर में अतिरिक्त विकास आयुक्त के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे। सरकार द्वारा जारी आदेशों के अनुसार, उनके खिलाफ भी विभिन्न प्रकार के विवादों, अनुशासनात्मक कार्यवाहियों और गंभीर कदाचार की लंबी सूची थी, जिसके आधार पर उन्हें अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त कर दिया गया।
गौरव दहिया का करियर कई बड़े विवादों से घिरा रहा है। उनके खिलाफ यह एक्शन मुख्य रूप से उनके उस कार्यकाल की जांच के बाद लिया गया जो उन्होंने नेशनल हेल्थ मिशन में मिशन डायरेक्टर के रूप में बिताया था। इसके अलावा स्वास्थ्य और पर्यावरण जैसे अहम विभागों में रहते हुए उनके प्रशासनिक आचरण पर कई प्रकार के सवाल खड़े हुए थे। बनासकांठा और पाटन जैसे जिलों में डिस्ट्रिक्ट डेवलपमेंट ऑफिसर के रूप में काम करते हुए भी उनकी कार्यप्रणाली को लेकर कई शिकायतें शासन तक पहुंची थीं।
उनकी निजी जिंदगी से जुड़े विवाद भी एक समय राष्ट्रीय सुर्खियों का हिस्सा बन गए थे। दिल्ली की एक महिला ने उनके खिलाफ दो शादियां करने और पेशेवर जीवन में गलत आचरण बरतने के गंभीर आरोप लगाए थे। राज्य सरकार द्वारा गठित एक उच्च स्तरीय जांच समिति ने उन शिकायतों को प्रथम दृष्टया सही पाया था, जिसके बाद अगस्त 2019 में उन्हें निलंबित कर दिया गया था और उनके खिलाफ औपचारिक विभागीय जांच शुरू की गई थी। हालांकि उन्होंने खुद को हनी-ट्रैप और ब्लैकमेलिंग का शिकार बताया था, लेकिन प्रशासनिक भ्रष्टाचार और आचरणहीनता के अन्य मामलों से वह बच नहीं सके।
अखिल भारतीय सेवाओं के नियमों के तहत सरकार का बड़ा कानूनी हथियार
आम नागरिकों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या सरकार किसी आईएएस अधिकारी को उसकी तय रिटायरमेंट उम्र से पहले जबरन नौकरी से हटा सकती है? इसका उत्तर अखिल भारतीय सेवाओं के सेवा नियमों में निहित है। मौलिक नियमों और अखिल भारतीय सेवा (मृत्यु-सह-सेवानिवृत्ति लाभ) नियमों के तहत सरकार के पास यह अधिकार सुरक्षित होता है कि वह लोकहित में किसी भी अधिकारी की कार्यक्षमता और सत्यनिष्ठा की समीक्षा करे।
जब कोई अधिकारी सेवा के दौरान भ्रष्टाचार, गंभीर अनुशासनहीनता या आपराधिक गतिविधियों में लिप्त पाया जाता है, तो सरकार को विशेष समितियों के माध्यम से उसके पूरे सर्विस रिकॉर्ड का मूल्यांकन करने की छूट मिलती है। यदि रिकॉर्ड संतोषजनक नहीं पाया जाता है और अधिकारी की छवि विभाग के लिए कलंक साबित होने लगती है, तो सरकार उसे अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे सकती है। इस प्रक्रिया में अधिकारी को तीन महीने का वेतन और भत्ते देकर सेवामुक्त कर दिया जाता है। गुजरात सरकार ने के. राजेश और गौरव दहिया के मामलों में इसी कानूनी और संवैधानिक प्रावधान का पूरी सटीकता के साथ उपयोग किया है।
राजनीतिक और प्रशासनिक विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार के सख्त कदम उठाना बेहद जरूरी है ताकि बाकी अधिकारियों के बीच एक साफ संदेश जाए। जब तक भ्रष्ट और मनमाने आचरण वाले अधिकारियों के खिलाफ समय पर मिसाल कायम करने वाली कार्रवाई नहीं होगी, तब तक सरकारी तंत्र में सुचिता बनाए रखना असंभव है।
सुशासन और जनता के भरोसे की बहाली की दिशा में मील का पत्थर
किसी भी राज्य के विकास का पहिया वहां की नौकरशाही की ईमानदारी और सक्रियता पर टिका होता है। यदि शीर्ष पदों पर बैठे आईएएस और आईपीएस अधिकारी ही भ्रष्टाचार और घूसखोरी के दलदल में धंस जाएं, तो आम आदमी का शासन व्यवस्था से भरोसा उठने लगता है। गुजरात सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम स्पष्ट करता है कि राज्य में सुशासन और जीरो टॉलरेंस की नीति सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि जरूरत पड़ने पर धरातल पर कठोर परिणाम भी दिए जाते हैं।
"लोक सेवा में जनता का विश्वास सबसे बड़ा पूंजी है। जो अधिकारी इस भरोसे को तोड़ते हैं और भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाते हैं, उनके लिए प्रशासनिक तंत्र में कोई जगह नहीं हो सकती। सरकार की यह कार्रवाई भ्रष्टाचार के खिलाफ हमारी जीरो टॉलरेंस नीति का स्पष्ट प्रमाण है।" — वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, गुजरात सरकार
आने वाले दिनों में इस तरह की और भी कार्यवाहियां देखने को मिल सकती हैं क्योंकि केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर अकार्यक्षम और दागी अधिकारियों की छंटनी का अभियान तेज कर दिया गया है। जनता और जागरूक नागरिकों ने भी सरकार के इस कदम की सराहना की है। अब देखना यह होगा कि अदालती लड़ाइयों और कानूनी दांव-पेच के बीच इन पूर्व आईएएस अधिकारियों के मामलों में आगे क्या नया मोड़ आता है, लेकिन फिलहाल इस सख्त प्रशासनिक फैसले ने पूरे देश की नौकरशाही में एक बड़ी हलचल जरूर पैदा कर दी है।







