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इराक़ से अमेरिकी सैनिकों की विदाई: क्या दो दशक बाद फिर सिर उठाएगा इस्लामिक स्टेट?

दो दशकों के लंबे सैन्य हस्तक्षेप के बाद अमेरिकी सैनिकों की इराक़ से अंतिम विदाई हो रही है। इस सामरिक बदलाव के बीच क्या आईएसआईएस एक बार फिर मध्य पूर्व की राख से उठ खड़ा होगा? द फ्रीलान्स की विशेष ग्राउंड रिपोर्ट।
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नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•2 अक्टूबर 2026 • अपडेटेड•35
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इराक़ से अमेरिकी सैनिकों की विदाई: क्या दो दशक बाद फिर सिर उठाएगा इस्लामिक स्टेट?
📷 इराक़ से अमेरिकी सैनिकों की विदाई: क्या दो दशक बाद फिर सिर उठाएगा इस्लामिक स्टेट? — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • दो दशकों के लंबे सैन्य हस्तक्षेप के बाद अमेरिकी सैनिकों की इराक़ से अंतिम विदाई हो रही है। इस सामरिक बदलाव के बीच क्या आईएसआईएस एक बार फिर मध्य पूर्व की राख से उठ खड़ा होगा? द फ्रीलान्स की विशेष ग्राउंड रिपोर्ट।
  • इस खबर से जुड़े सभी पहलुओं की जांच और निगरानी संबंधित विभागों द्वारा की जा रही है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार इस घटनाक्रम का आम जनता पर सीधा असर पड़ सकता है।

बगदाद की सर्द हवाओं के बीच अमेरिकी सैन्य छावनियों से बख्तरबंद गाड़ियों की आवाजाही अब थमने लगी है। दो दशक पहले जिस इराक़ में अमेरिका ने 'ऑपरेशन इराकी फ्रीडम' के तहत अपने कदम रखे थे, अब वहां से उसके सैनिकों की पूर्ण विदाई का वक्त आ चुका है। 'द फ्रीलान्स' के रक्षा और कूटनीति डेस्क से मिली जमीनी रिपोर्ट्स बताती हैं कि यह सिर्फ एक सैन्य वापसी नहीं है, बल्कि मध्य पूर्व की भू-राजनीति में एक बहुत बड़े शून्य का पैदा होना है। सवाल यह है कि क्या यह शून्य क्षेत्र को एक बार फिर चरमपंथ की आग में झोंक देगा?

दो दशक का सैन्य चक्र और बदलता मध्य पूर्व

साल 2003 में सद्दाम हुसैन के पतन से शुरू हुई अमेरिकी उपस्थिति ने इराक़ को निरंतर संघर्ष की भट्टी में झोंक दिया। अल-कायदा के साए से लेकर 'इस्लामिक स्टेट' (आईएसआईएस) के खूंखार उदय तक, इराक़ी जमीन पर हिंसा का एक अंतहीन दौर चला। आज जब पेंटागन अपने सैनिकों को वापस बुला रहा है, तो इराक़ी सुरक्षा बलों (ISF) के सामने सबसे बड़ी चुनौती देश की आंतरिक सुरक्षा और सीमाओं की संप्रभुता को अकेले संभालने की है। स्थानीय सैन्य कमांडरों का मानना है कि इराक़ी सेना ने आतंकवाद के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी है, लेकिन खुफिया साझाकरण और आधुनिक हथियारों के मामले में अभी भी विदेशी मदद की दरकार है।

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क्या फिर से सिर उठा रहा है इस्लामिक स्टेट?

खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, आईएसआईएस ने अपनी पारंपरिक युद्ध शैली छोड़कर अब छिपकर हमले करने (Guerrilla Warfare) और स्लीपर सेल मजबूत करने की रणनीति अपना ली है। सुदूर रेगिस्तानी इलाकों और सीरियाई सीमा के पास सक्रिय इन जिहादी समूहों की नजरें इराक़ की राजनीतिक अस्थिरता पर टिकी हैं। हाल के महीनों में बियाबान इलाकों में सुरक्षा बलों पर हुए हमलों ने इस बात की तस्दीक कर दी है कि आईएसआईएस पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, बल्कि वह अमेरिकी सेना के जाने का इंतजार कर रहा था ताकि अपनी खोई हुई जमीन वापस पा सके।

वैश्विक उथल-पुथल और अन्य सुलगते भू-राजनीतिक मुद्दे

जब हम वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालते हैं, तो दुनिया के विभिन्न हिस्सों में तनाव अपने चरम पर है। चाहे वह दशकों पुराना इजरायल-फिलीस्तीन संघर्ष हो जो गाजा से लेकर पश्चिम एशिया तक बारूद बिछाए हुए है, या फिर अमेरिका की न्याय प्रणाली में सज़ा-ए-मौत के विवादास्पद मामलों (जैसे हाल ही में जहरीले इंजेक्शन के बावजूद कैदी के जीवित बचने की घटना) पर मानवाधिकारों की बहस - हर तरफ व्यवस्था और न्याय प्रणाली की विफलताएं उजागर हो रही हैं। घरेलू मोर्चे पर भारत में जहां कोलकाता के भीषण रेप-मर्डर केस पर राजनीतिक बयानबाजी (राहुल गांधी की प्रतिक्रिया) और उद्धव ठाकरे द्वारा '40 सिर वाले रावण' जैसी तीखी राजनीतिक टिप्पणियों से आंतरिक राजनीति गरमाई हुई है, वहीं वैश्विक मंच पर इराक़ का भविष्य एक बड़ी अनिश्चितता बना हुआ है।

भविष्य का संकट या कूटनीतिक कशमकश

इराक़ से अमेरिकी वापसी को राष्ट्रपति जो बाइडेन प्रशासन के 'विदेशों में अंतहीन युद्धों को खत्म करने' के वादे के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन, इतिहास गवाह है कि वैक्यूम (शून्यता) हमेशा चरमपंथी ताकतों के लिए मुफीद साबित हुआ है। यदि इराक़ी सरकार विभिन्न राजनीतिक और धार्मिक गुटों (शिया, सुन्नी और कुर्दिश) को साथ लेकर एक समावेशी शासन देने में नाकाम रहती है, तो इस्लामिक स्टेट के पास फिर से उभरने का सुनहरा मौका होगा।

"अमेरिकी बूटों के हटने का मतलब यह नहीं है कि आतंकवाद का खतरा टल गया है। असली परीक्षा अब शुरू होगी जब इराक़ी नेतृत्व को अपनी सुरक्षा खुद सुनिश्चित करनी होगी।" - एक वरिष्ठ पश्चिमी राजनयिक (नाम न छापने की शर्त पर)

निष्कर्ष और आगे की राह

द फ्रीलान्स की पड़ताल स्पष्ट करती है कि अमेरिकी सैनिकों की विदाई के बाद इराक़ एक बेहद संवेदनशील दोराहे पर खड़ा है। कूटनीतिक संवाद और मजबूत आर्थिक-सैन्य सहायता के बिना, यह क्षेत्र एक बार फिर बड़े विध्वंस की चपेट में आ सकता है। दुनिया की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि बगदाद की हुकूमत आने वाले दिनों में इस आंतरिक और बाहरी खतरे से कैसे निपटती है।

द फ्रीलांस पत्रकारिता नीति (Editorial Commitment):हम निष्पक्ष, सटीक और तथ्यात्मक पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह समाचार रिपोर्ट विभिन्न प्रमाणित समाचार एजेंसियों, आधिकारिक बयानों और स्थानीय संवाददाताओं से प्राप्त इनपुट के आधार पर तैयार की गई है।
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द फ्रीलांस की राष्ट्रीय संपादकीय डेस्क देश की राजनीति, संसद, नीतिगत फैसलों, केंद्रीय योजनाओं और जनसरोकार से जुड़े बड़े मुद्दों पर 24/7 निष्पक्ष, तथ्यपरक और खोजी रिपोर्टिंग करती है। यह टीम दोहरे तथ्य-सत्यापन के कठोर सिद्धांतों का पालन करती है।

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